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पारिस्थितिकी किसे कहते हैं? पारिस्थितिकी एवं समाज में संबंध स्पष्ट कीजिए।यापारिस्थितिकी क्या है? पारिस्थितिकीय अवक्रमण के प्रमुख कारण बताइए।

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पारिस्थितिकी का अर्थ
पारिस्थितिकी (Ecology) को प्रत्येक समाज का आधार माना जाता है। इससे अभिप्राय किसी समुदाय के निर्जीव पर्यावरण तथा उसमें पाए जाने वाले जीवधारियों की समग्र व्यवस्था का अध्ययन करने वाले विज्ञान से है। इस प्रकार, पारिस्थितिकी का अर्थ एक ऐसे जाल से है जहाँ भौतिक और जैविक व्यवस्थाएँ तथा प्रकियाएँ गठित होती है और मनुष्य भी इसका एक अंग होता है। पर्वत, नदियाँ, मैदान, सागर और जीव-जंतु सभी पारिस्थितिकी के अंग हैं।

संतुलित पर्यावरण को पारिस्थितिकतंत्र (Ecosystem) कहा जाता है। इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम ए० जी० टेन्सले नामक वैज्ञानिक ने 1935 ई० में किया था पर्यावरण के जैविक एवं अजैविक, सभी कारकों के परस्पर संबंधों को पारिस्थितिक तंत्र कहा जाता है। जब इसमें मानवीय प्रयासों के परिणामस्वरूप अवक्रमण होता है तो उसे पारिस्थितिकीय अवक्रमण कहा जाता है।

पारिस्थितिकी एवं समाज का संबंध 
पारिस्थितिकी एवं समाज में गहरा संबंध पाया जाता है। किसी स्थान की पारिस्थितिकी पर वहाँ के भूगोल तथा जलमंडल की अंत:क्रियाओं का प्रभाव पड़ता है। उदाहरणार्थ-मरुस्थलीय प्रदेशों में रहने वाले जीव-जंतु अपने आप को न्यून वर्षा, पथरीली अथवा रेतीली मिट्टी तथा अत्यधिक तापमान के अनुसार अपने आप को ढाल लेते हैं। इसीलिए यह कहा जाता है कि पारिस्थितिकीय कारक यह भी निर्धारित करते हैं कि किसी स्थान विशेष पर लोग कैसे रहेंगे। मरुस्थलीय प्रदेशों, पहाड़ी प्रदेशों, समुद्रतटीय क्षेत्रों, मैदानी प्रदेशों, बर्फीले प्रदेशों आदि में इसीलिए मानवीय जीवन में अंतर देखा जा सकता है। यह अंतर न केवल रहन-सहन, खान-पान एवं पहनावे में ही देखा जा सकता है बल्कि परंपराओं में भी भिन्नताएँ विकसित हो जाती हैं। मनुष्य की क्रियाओं द्वारा पारिस्थितिकी में होने वाले परिवर्तन से मानव समाज में भी परिवर्तन होना प्रारंभ हो जाता है। इसका अर्थ यह है कि जैवभौतिक पारिस्थितिकी सामाजिक पर्यावरण पर गहरा प्रभाव डालती है। एक तरफ प्रकृति समाज को आकार देती है दूसरी ओर समाज भी प्रकृति को आकार देता है।

पारिस्थितिकीय अवक्रमण के कारण
संपूर्ण विश्व में आर्थिक विकास की जो कीमत चुकानी पड़ी है उसमें विस्थापन के अलावा पारिस्थितिकीय अवक्रमण (जिसे निम्नीकरण भी कहा जा सकता है) की समस्या भी प्रमुख मानी जाती है। पारिस्थितिकीय अवक्रमण वन क्षेत्र में होने वाली कमी, पानी की सतह नीची होने तथा भूमि कटाव के रूप में देखा जा सकता है। प्राकृतिक साधनों का अवक्रमण एक विश्व स्तर की समस्या बन गई है। तीव्र औद्योगीकरण व नगरीकरण, गहन कृषि, जनसंख्या विस्फोट, खनन तथा अन्य मानवीय क्रियाओं के परिणामस्वरूप भूमि तथा पानी के स्रोतों का अवक्रमण हुआ है।

भारत का अधिकतर भौगोलिक क्षेत्र किसी-न-किसी प्रकार के पारिस्थितिकीय अवक्रमण से प्रभावित हुआ है। वनों का बड़ी तेजी से विनाश हुआ है तथा पानी के स्रोत (नदियों, झीलों तथा जमीन के नीचे पानी) सूखते जा रहे हैं तथा पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती जा रही है। प्राकृतिक साधनों का अवक्रमण आर्थिक विकास का परिणाम तो है ही यह भारत जैसे विकासशील देश में सामाजिक-आर्थिक विकास तथा विश्व पर्यावरण के लिए खतरा भी बनता जा रहा है। पारिस्थितिकीय अवक्रमण के निम्नलिखित कारण हैं –

1. वनों का विनाश – वनों की लकड़ी व्यवसाय में उपयोग करने तथा जड़ी-बूटियों हेतु किए जाने वाले वनों के कटाव के परिणामस्वरूप भारत में वन क्षेत्र बड़ी तेजी से घटता जा रहा है। जितने पेड़ लगाए जाते हैं उससे कहीं अधिक संख्या में काटे जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि भारत में । वन गाँवों से दूर होते जा रहे हैं। अनेक बार तो निजी स्वार्थों हेतु बड़े पैमाने पर वनों में आग लगा दी जाती है। गर्मियों में ग्रामवासी वनों में आग इसलिए भी लगा देते हैं कि बरसात के बाद अच्छी घास उपलब्ध हो पाएगी। अनेक बार तो विभागीय स्तर पर भी वन के कुछ हिस्से में। आग इसलिए लगा दी जाती है ताकि उसे कृषि योग्य बनाया जा सके और आग के पूरे वन क्षेत्र में फैलने से बचा जा सके। इससे मूल्यवान पेड़ नष्ट हो जाते हैं। विकास के नाम पर बनाए जाने वाले बड़े-बड़े बाँध भी पारिस्थितिकीय अवक्रमण विकसित करते हैं।
2. भूमि या मृदा कटाव – भूमि एक मूल्यवान भौतिक संपदा मानी जाती है। जब तक पारिस्थितिक तन्त्र में कोई छेड़-छाड़ नहीं की जाती या बहुत कम की जाती है जो आवश्यक होती है तब भूमि का निरंतर परिष्करण एवं संपन्नीकरण होता रहता है। जब इस पर, पेड़-पौधों का प्राकृतिक आवरण कम हो जाती है तो भूमि कटाव प्रांरभ हो जाती है। भू-स्खलन (Landslides) एवं गाद भरने (Siltation) के परिणामस्वरूप भी भूमि कटाव से पारिस्थितिकीय अवक्रमण की स्थिति पैदा हो जाती है।
3. जल स्रोतों की कमी – पानी जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक तत्त्व है। भारत में जल स्रोतों की भी निरंतर कमी होती जा रही है तथा भूमि के नीचे पानी का स्तर और नीचा होता जा रहा है। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि अगर यही स्थिति रही तो कुछ ही दशकों में पानी की अत्यधिक कमी हो जाएगी। कृषि उत्पादन बढ़ाने हेतु खादों के प्रयोग से पानी प्रदूषित होता जा रहा है तथा कम वर्षा के परिणामस्वरूप नदियों में पानी का स्तर घटता जा रहा है। मरुस्थल का निंरतर विस्तार होता जा रहा है। यह पारिस्थितिकीय अवक्रमण का ही द्योतक है।
4. खतरनाक उद्योग – अनेक बार औद्योगिक विकास के परिणामस्वरूप भी पारिस्थितिकीय संकट पैदा हो जाता है। उदाहरणार्थ-दून घाटी में चूने के उद्योग के परिणामस्वरूप पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचा है। इससे पानी का स्तर काफी नीचे पहुँच गया है, पेड़ धूल से भरे हुए रहते हैं तथा चूने की भट्टियों से हानिकारक गैसों का स्राव होता रहता है। इसी प्रकार, टिहरी बाँध के परिणामस्वरूप भी उपजाऊ भूमि के बहुत बड़े भाग को नष्ट कर दिया गया है।

सरकार ने भारत में बढ़ते हुए पारिस्थितिकीय अवक्रमण को देखते हुए आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण की दीर्घकालिक नीति बनाई है। इसके अंतर्गत पारिस्थितिकीय अवक्रमण को रोकने एवं प्रदूषण नियंत्रण हेतु चरणबद्ध ढंग से अनेक कार्यक्रम लागू किए गए हैं। अनेक गैर-सरकारी संगठनों को भी इस कार्य में सहयोग देने हेतु आर्थिक सहायता दी जा रही है।

2002 ई० में ‘नवीन राष्ट्रीय जल नीति‘ को स्वीकृति प्रदान की गई। इस योजना के अंतर्गत देश के जल संसाधनों के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया जा रही है। राष्ट्रीय जल बोर्ड, राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद्, केंद्रीय भूमिगत जल प्राधिकरण तथा संबंधित जल संसाधन विकास योजना द्वारा इस दिशा में अनेक कदम उठाए गए हैं जिनसे थोड़ी सफलता ही मिल पाई है। पर्यावरणीय शिक्षा एवं सामान्य जागरूकता द्वारा जन-जागृति आने पर मिलने वाला नागरिकों का सहयोग ही इस समस्या के समाधान में सार्थक सिद्ध हो सकता है।



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