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फादर बुल्के ने संन्यासी की परंपरागत छवि से अलग एक नई छवि प्रस्तुत की है, कैसे?

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फादर बुल्के भारतीय संन्यासी प्रवृत्ति के आधार पर खरे संन्यासी नहीं थे। लेखक के अनुसार वे केवल संकल्प के संन्यासी थे, मन से नहीं। सामान्यतः संन्यासी समाज से कटकर अकेले ही अपने संसार को रचते है, उनमें समाज के प्रति आत्मीयता या लगाव नहीं होता। वे कर्म नहीं करते अपितु भिक्षा मांगकर जीवन-यापन करते हैं।

फादर बुल्के कर्मनिष्ठ संन्यासी थे। समाज के प्रति उनके मन में करुणा, वात्सल्य प्रेम की भावना थी। वे समाज में रहकर लोगों के पारिवारिक उत्सवों में शामिल होते, उन्हें आशीर्वाद देते । संकट के समय में उन्हें ढाढस देते । इस तरह से फादर बुल्के की छवि परम्परागत संन्यासी से अलग हटकर थी।



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