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प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त का वर्णन कीजिए तथा प्लेटों की प्रक्रिया पर प्रकाश डालिए।

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प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त
महाद्वीपीय विस्थापन एवं सागरीय तल विस्तार अवधारणा के पश्चात् महाद्वीप, महासागर एवं पर्वतों का निर्माण तथा वितरण सम्बन्धी समस्याओं के समाधान हेतु सन् 1967 में मैकेन्जी (Mekenzie), पारकर (Parker) और मोरगन (Morgan) ने स्वतन्त्र रूप से उपलब्ध विचारों को समन्वित कर प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त को प्रस्तुत किया है। यह सिद्धान्त भूगर्भ एवं भूपटल से सम्बन्धित विभिन्न जटिल प्रश्नों; जैसे—भूकम्प आने का क्या कारण है, ज्वालामुखी विस्फोट क्यों होते हैं महाद्वीप एवं महासागरों की उत्पत्ति कैसे हुई, इनके वितरण का क्या आधार है? आदि का समुचित समाधान करने में अभी तक की सबसे अधिक मान्य एवं वैज्ञानिक व्याख्या है।

एक विवर्तनिक प्लेट (जिसे स्थलमण्डल प्लेट भी कहा जाता है) ठोस चट्टान का विशाल व अनियमित आकार का खण्ड है। अतएव स्थलमण्डल अनेक प्लेटों में विभक्त है। प्रत्येक प्लेट स्वतन्त्र रूप से दुर्बलतामण्डल से संचलन करती रहती है महाद्वीप एवं महासागरों की सतह को संचलने इन प्लेटों के माध्यम से ही होता है। स्थलमण्डल की ये 7 बड़ी एवं छोटी कठोर प्लेटें हैं। इन भू-प्लूटों पर स्थलाकृतियों का निर्माण, भ्रंशन तथा विस्थापन क्रियाओं द्वारा होता है जिन्हें विवर्तनिकी कहते हैं।

प्लेट विवर्तनिकी प्रक्रिया
संवहनीय धाराओं के आधार पर भू-प्लेटों की प्रक्रिया, विस्तार एवं क्षेत्र निम्नलिखित प्रकार से सम्पन्न होता है–

1. अपसारी क्षेत्र (प्लेट)-जब दो प्लेट एक-दूसरे से विपरीत दिशा में अलग हटती हैं और नई पर्पटी का निर्माण होता है, उन्हें अपसारी प्लेट कहते हैं। वह स्थान जहाँ से प्लेट एक-दूसरे से दूर हटती हैं, प्रसारी स्थान (Spreading Site) या अपसारी क्षेत्र कहलाता है।
2. अभिसारी क्षेत्र (प्लेट)-जब एक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे धंसती है और जहाँ भूपर्पटी नष्ट होती है, वह अभिसरण क्षेत्र या सीमा कहलाता है। इस प्रक्रिया में जब दो भिन्न दिशाओं में प्लेटें एक-दूसरे के ऊपर चढ़ जाती हैं तो संपीडन के कारण पर्वत, खाइयाँ आदि स्थल-रूप निर्मित होते हैं।
3. रूपान्तर क्षेत्र (प्लेट)-इन किनारों पर न तो नये पदार्थ का निर्माण होता है और न विनाश होता है। ऐसी स्थिति महासागरीय कटक के पास होती है।



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