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पंडित अलोपीदीन के चरित्र पर प्रकाश डालिए ।

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पंडित अलोपीदीन जमींदार, धनवान और दातागंज के निवासी हैं । उनके यहाँ अंग्रेज भी शिकार खेलने के लिए आते हैं । लाखों का कारोबार चलता है । ऐसा कोई नहीं है, जो उनका ऋणी न हो, व्यापार भी लंबा-चौड़ा था । बारहों महीने उनका सदाव्रत चलता रहता था । पंडित अलोपीदीन नमक की कालाबाजारी भी करते हैं । अपने धन के बल पर सभी अफसरों को गुलाम बना के रखा है ।

अपने धन के बल पर ही ये कोर्ट में वकीलों की सेना खड़ी कर देते हैं । वकील धन के कारण ही सत्य को झूठ साबित कर देते हैं और न्यायालय से मुक्त हो जाते हैं । कहानी के अंत में पंडित अलोपीदीन मुंशी वंशीधर की ईमानदारी से प्रभावित होकर अपनी निजी संपत्ति का मैनेजर बना देते हैं, जो उनकी ईमानदारी के सम्मान को उजागर कर देता है । परंतु कहानी के माध्यम से देख्खें तो पंडित अलोपीदीन भ्रष्ट, धनी, शोषक और अनैतिक चरित्र ही उभरकर सामने आते है ।



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