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पर्यावरण की परिभाषा दीजिए भौगोलिक पर्यावरण से मानव-जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का मूल्यांकन कीजिएयापर्यावरण क्या है? इसके दो प्रकार भी बताइए मानव-व्यवहारों पर प्राकृतिक पर्यावरण के प्रभावों का मूल्यांकन कीजिएयाभौगोलिक पर्यावरण क्या है तथा इसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है ? विवेचना कीजिएयाभौगोलिक पर्यावरण क्या है ? यह सामाजिक जीवन को किस प्रकार से प्रभावित करता है ? यासामाजिक जीवन पर भौगोलिक पर्यावरण के प्रभावों को व्यक्त कीजिएयामनुष्य के जीवन में पर्यावरणीय प्रदूषण के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभावों का वर्णन कीजिए  यासम्पूर्ण पर्यावरण की अवधारणा स्पष्ट कीजिए [2011]यापर्यावरण को परिभाषित कीजिए याप्राकृतिक पर्यावरण एवं मानव समाज में सम्बन्ध बताइए यापर्यावरण से आप क्या अर्थ लगाते हैं ? भौगोलिक पर्यावरण के अप्रत्यक्ष प्रभावों का उल्लेख कीजिएयापर्यावरण क्या है? भौगोलिक पर्यावरण का मनुष्य के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?याभौगोलिक पर्यावरण के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभावों का उल्लेख कीजिए 

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पर्यावरण का अर्थ

पर्यावरण ‘परि + आवरण’ दो शब्दों के मेल से बना है ‘परि’ का अर्थ है ‘चारों ओर’ तथा ‘आवरण’ का अर्थ है ‘घेरा इस प्रकार पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ हुआ चारों ओर का घेरा जीव के चारों ओर जो प्राकृतिक और सांस्कृतिक शक्तियाँ और परिस्थितियाँ विद्यमान हैं उनके प्रभावी रूप को ही पर्यावरण कहा जाता है पर्यावरण का क्षेत्र अत्यन्त विशद् है पर्यावरण उन समस्त शक्तियों, वस्तुओं और दशाओं का योग है जो मानव को चारों ओर से आवृत्त किये हुए हैं मानव से लेकर वनस्पति तथा सूक्ष्म जीव तक सभी पर्यावरण के अभिन्न अंग हैं पर्यावरण उन सभी बाह्य दशाओं एवं प्रभावों का योग है जो जीव के कार्यों एवं प्रगति पर अपना गहरा प्रभाव डालता है पर्यावरण को मानव-जीवन से पृथक् करना उतना ही असम्भव है जैसे शरीर से आत्मा को मैकाइवर एवं पेज ने तो कहा भी है कि “जीवन और परिस्थिति आपस में सम्बन्ध रखती हैं वास्तव में, जल, वायु, आकाश, पृथ्वी, परम्पराओं, धर्म और संस्कृति को समग्र रूप में पर्यावरण ही कहा जा सकता है
पर्यावरण की परिभाषा
पर्यावरण का ठीक-ठीक अर्थ समझने के लिए हमें इसकी परिभाषाओं को अनुशीलन करना होगा विभिन्न विद्वानों ने पर्यावरण को निम्नवत् परिभाषित किया है

ई० ए० रॉस के अनुसार, “पर्यावरण हमें प्रभावित करने वाली कोई भी बाहरी शक्ति है’

जिसबर्ट के अनुसार, “पर्यावरण वह सब कुछ है जो किसी वस्तु को चारों ओर से घेरे हुए है तथा उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है”

टी० डी० इलियट के अनुसार, चेतन पदार्थ की इकाई के प्रभावकारी उद्दीपन और अन्त:क्रिया के क्षेत्र को पर्यावरण कहते हैं”

हर्सकोविट्स ने पर्यावरण को इस प्रकार परिभाषित किया है, “यह सभी बाह्य दशाओं और प्रभावों का योग है जो जीवों के कार्यों एवं विकास को प्रभावित करता है”
पर्यावरण का वर्गीकरण
अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से स्थूल रूप में पर्यावरण को निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है

1. प्राकृतिक पर्यावरण – इस पर्यावरण के अन्तर्गत सभी प्राकृतिक और भौगोलिक शक्तियों का समावेश होता है पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, वनस्पति और जीव-जन्तु प्राकृतिक पर्यावरण के अंग हैं प्राकृतिक पर्यावरण का प्रभाव मानव-जीवन पर सर्वाधिक पड़ता है

2. सामाजिक पर्यावरण – सम्पूर्ण सामाजिक ढाँचा सामाजिक पर्यावरण कहलाता है इसे सामाजिक सम्बन्धों को पर्यावरण भी कहा जा सकता है परिवार, पड़ोस, सम्बन्धी, खेल के साथी और विद्यालय सामाजिक पर्यावरण के अंग हैं

3. सांस्कृतिक पर्यावरण – मनुष्य द्वारा निर्मित वस्तुओं का समग्र रूप का परिवेश सांस्कृतिक पर्यावरण कहलाता है सांस्कृतिक पर्यावरण भौतिक और अभौतिक दो प्रकार का होता – है—आवास, विद्यालय, टेलीविजन, कुर्सी, मशीनें, भौतिक पर्यावरण तथा धर्म, संस्कृति, भाषा, लिपि, रूढ़ियाँ, कानून और प्रथा अभौतिक पर्यावरण हैं
उपर्युक्त तीनों पर्यावरणों को समग्र रूप में सम्पूर्ण पर्यावरण (Total Environment) कहा जाता है मनुष्य पर सम्पूर्ण पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है

भौगोलिक (प्राकृतिक) पर्यावरण का अर्थ एवं परिभाषा

भौगोलिक पर्यावरण या प्राकृतिक पर्यावरण प्रकृति द्वारा निर्मित पर्यावरण है मनुष्य पर जिन प्राकृतिक शक्तियों को चारों ओर से प्रभाव पड़ता है, उसे भौगोलिक पर्यावरण कहा जाता है ये सभी शक्तियाँ स्वतन्त्र रहकर मानव को प्रभावित करती हैं पर्वत, सरिता, वन, पवन, आकाश, पृथ्वी तथा जीव-जगत् सभी भौगोलिक पर्यावरण के अंग हैं प्रमुख विद्वानों ने इसे निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है
मैकाइवर एवं पेज के अनुसार, “भौगोलिक पर्यावरण उन दशाओं से मिलकर बनता है जो प्रकृति मनुष्य को प्रदान करती है इसे पर्यावरण में इन्होंने पृथ्वी का धरातल एवं उसकी सभी प्राकृतिक दशाओं, प्राकृतिक साधनों, भूमि और पानी, पर्वतों व मैदानों, खनिज पदार्थों, पौधों, पशुओं, जलवायु की शक्ति, गुरुत्वाकर्षण, विद्युत एवं विकिरण शक्तियाँ, जो पृथ्वी पर क्रियाशील हैं, को सम्मिलित किया है इन सबका मानव-जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है

सोरोकिन के अनुसार, “भौगोलिक पर्यावरण को सम्बन्ध ऐसी भौगोलिक दशाओं से है जिनका अस्तित्व मानवीय क्रियाओं से स्वतन्त्र है और जो मानव के अस्तित्व तथा कार्यों की छाप पड़े बगैर अपनी प्रकृति के अनुसार बदलती हैं इस परिभाषा से यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य द्वारा सभी अनियन्त्रित शक्तियों को भौगोलिक पर्यावरण के अन्तर्गत रखा जा सकता है

डॉ० डेविस के अनुसार, “मनुष्य के सम्बन्ध में भौगोलिक पर्यावरण से अभिप्राय भूमि या मानव के चारों ओर फैले उन सभी भौतिक स्वरूपों से है जिनमें वह रहता है, जिनका उसकी आदतों और क्रियाओं पर प्रभाव पड़ता है”

भौगोलिक पर्यावरण का मानव-जीवन पर प्रभाव

भौगोलिक पर्यावरण बहुत अधिक प्रभावी और शक्तिमान होता है जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य इसके प्रभाव में रहता है मनुष्य का रंग, रूप, आकार, स्वभाव से लेकर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिवेश सब कुछ भौगोलिक पर्यावरण की ही देन हैं भौगोलिक पर्यावरण के मानव-जीवन पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं

भौगोलिक पर्यावरण के प्रत्यक्ष प्रभाव

भौगोलिक पर्यावरण से मानव के जीवन पर निम्नलिखित प्रत्यक्ष प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं

1. जनसंख्या पर प्रभाव – किसी देश की जनसंख्या कितनी होगी, यह वहाँ की अनुकूल या भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है यदि भौगोलिक परिस्थितियाँ प्रतिकूल होंगी, अर्थात् भूमि कम उपजाऊ है, रेगिस्तान, बंजर, पर्वत इत्यादि अधिक हैं तो वहाँ जनसंख्या कम होगी इसके विपरीत, यदि भूमि समतल है, उपजाऊ है और सिंचाई के अच्छे साधन हैं तो जनसंख्या अधिक होगी इस प्रकार भौगोलिक परिस्थितियाँ जनसंख्या के घनत्व को प्रभावित करती हैं गंगा, सतलुज और ब्रह्मपुत्र के मैदान में अनुकूल पर्यावरण होने के कारण ही जनसंख्या सघन है, जब कि थार का मरुस्थल कठोर पर्यावरणीय दशाओं के कारण विरल जनसंख्या वाला क्षेत्र है
आलोचनात्मक मूल्यांकन – यह सत्य है कि भौगोलिक पर्यावरण का ‘मानव जनसंख्या पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है, किन्तु अन्य कारकों को भी जनसंख्या एवं जनसंख्या के घनत्व पर प्रभाव पड़ता है उदाहरणार्थ-अनेक स्थान ऐसे हैं जहाँ भौगोलिक पर्यावरण में कोई अन्तर न होने पर भी वहाँ की जनसंख्या में निरन्तर अत्यधिक वृद्धि हो रही है; जैसे–1901ई० से लेकर अब तक दिल्ली, कोलकाता आदि की जनसंख्या में कई गुना वृद्धि हो गयी है, जब कि वहाँ की भौगोलिक दशाओं में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ

2. आवास पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण मनुष्य के निवास हेतु प्रयुक्त मकानों तथा इनकी सामग्री को भी प्रभावित करता है उदाहरणार्थ-पर्वतीय क्षेत्रों में पत्थरों और लकड़ियों का प्रयोग मकानों में अधिक होता है इनकी छतें ढलावदार होती हैं, जिससे वर्षा का पानी न रुके इसके विपरीत, मैदानी इलाकों में ईंटों या मिट्टी इत्यादि का अधिक प्रयोग होता है जापान में भूचाल से बचने के लिए लकड़ी के मकान बनाये जाते हैं न्यूयॉर्क में कठोर धरातल होने के कारण गगनचुम्बी भवन बनाये जाते हैं इस प्रकार मकानों की बनावट तथा इसमें प्रयुक्त सामग्री भौगोलिक पर्यावरण द्वारा प्रभावित होती है
आलोचनात्मक मूल्यांकन – इसमें सन्देह नहीं कि भौगोलिक पर्यावरण ‘मानव निवास’ की सम्पूर्ण व्यवस्था में सहायता करता है, परन्तु उस पर अन्य कारकों का भी प्रभाव रहता है उदाहरणार्थ-महल और झोंपड़ी एक ही भौगोलिक पर्यावरण में सामाजिक पर्यावरण की दुहाई देते रहते हैं

3. वेश-भूषा पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण का लोगों की वेश-भूषा पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है गर्म जलवायु वाले देशों में लोग बारीक व ढीले वस्त्र पहनते हैं, जब कि ठण्डे देशों में गर्म व चुस्त कपड़ों का अधिक इस्तेमाल होता है अनेक ठण्डे प्रदेशों में जानवरों की खाल से भी कोट इत्यादि बनाकर पहने जाते हैं टुण्ड्रा प्रदेश में लोग समूरधारी पशुओं की खाल के वस्त्र पहनते हैं
आलोचनात्मक मूल्यांकन – यह सत्य है कि ‘वस्त्रों’ पर भौगोलिक पर्यावरण का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है, तथापि मानव वस्त्र केवल भौगोलिक पर्यावरण पर ही आधारित नहीं होते, इस पर संस्कृति (Culture) का भी विशेष प्रभाव पड़ता है उदाहरणार्थ-गरीबों और अमीरों की वेश-भूषा भी अलग-अलग होती है, जब कि वे एक ही भौगोलिक पर्यावरण में निवास करते हैं

4. खान-पान पर प्रभाव – भोजन की सामग्री भी भौगोलिक पर्यावरण से प्रभावित होती है जिस क्षेत्र में जो खाद्य पदार्थ अधिक होते हैं उनको प्रचलने वहीं पर अधिक होता है बंगाल व चेन्नई में चावल अधिक खाये जाते हैं, जब कि उत्तर भारत में गेहूं का अधिक प्रयोग होता है ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्ति मांसाहारी अधिक होते हैं, जब कि गर्म क्षेत्रों में रहने वाले शाकाहारी अधिक होते हैं यदि आसपास कोई नदी आदि है तो मछली इत्यादि का प्रयोग अधिक होता है पंजाब के निवासी दाल-रोटी खाते हैं, जब कि बंगाली चावल और मछली का भोजन करते हैं

आलोचनात्मक मूल्यांकन – भौगोलिक पर्यावरण तथा खान-पान में इतना सम्बन्ध होते हुए भी भौगोलिक निर्धारणवाद का सिद्धान्त ठीक नहीं उतरता वास्तव में, मानव-जीवन का सम्बन्ध संस्कृति और आर्थिक स्थिति से अधिक होता है, पर्यावरण से कम एक ही स्थान पर रहने वाले कुछ व्यक्ति शाकाहारी भी होते हैं और मांसाहारी भी इस प्रकार एक ही क्षेत्र में रहने वाले निर्धन और धनवान का भोजन भी एक-दूसरे से अलग होता है

5. पशु-जीवन पर प्रभाव – पशुओं को भी एक विशेष पर्यावरण की आवश्यकता होती है, क्योंकि इनमें मनुष्य की तरह अनुकूलन की शक्ति नहीं होती; जैसे–शेर के लिए जंगल में तथा ऊँट के लिए रेगिस्तान में भौगोलिक परिस्थितियाँ उपलब्ध हैं और ये यहीं अधिक प्रसन्न रहते हैं इसी प्रकार मछली भी समुद्र में ही प्रसन्न रहती है
आलोचनात्मक मूल्यांकन – यह सत्य है कि पशुओं को प्राकृतिक पर्यावरण की ही आवश्यकता होती है और वे इसमें ही प्रसन्न रहते हैं, परन्तु आजकल बड़े-बड़े चिड़ियाघरों में कृत्रिम पर्यावरण उत्पन्न करके देश-विदेश के विभिन्न पशु-पक्षियों को रखा जाता है
भौगोलिक पर्यावरण के अप्रत्यक्ष प्रभाव
भौगोलिक पर्यावरण अप्रत्यक्ष रूप से भी मानव की सामाजिक दशाओं को निम्नलिखित प्रकार से प्रभावित करता है

1. सामाजिक संगठन पर प्रभाव-भौगोलिक पर्यावरण अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक संगठन को प्रभावित करता है लीप्ले का कथन है कि “ऐसे पहाड़ी व पठारी देशों में जहाँ खाद्यान्न की कमी होती है, वहाँ जनसंख्या की वृद्धि अभिशाप मानी जाती है और ऐसी विवाह संस्थाएँ स्थापित की जाती हैं जिनसे जनसंख्या में वृद्धि न हो जौनसार बाबर में खस जनजाति में सभी भाइयों की एक ही पत्नी होती है इससे जनसंख्या-वृद्धि रुक जाती है विवाह की आयु, परिवार का आकार तथा प्रकार भी अप्रत्यक्ष रूप से भौगोलिक परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं मानसूनी प्रदेश घनी जनसंख्या के अभिशाप से ग्रसित हैं
आलोचना – परन्तु यह सदैव ठीक नहीं है और अनेक एकसमान क्षेत्रों में परिवार व विवाह की भिन्न-भिन्न प्रथाएँ देखी गयी हैं

2. आर्थिक संरचना पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण उद्योगों के विकास की गति निर्धारित करता है यदि खनिज पदार्थों की प्रचुरता है तो आर्थिक विकास अधिक होगा और लोगों का जीवन-स्तर उच्च होगा यदि प्राकृतिक साधनों की कमी है तो आर्थिक विकास प्रभावित होगा और लोगों का रहन-सहन व जीवन-स्तर अपेक्षाकृत निम्न कोटि का होगा व्यावसायिक संरचना भी इससे प्रभावित होती है इस प्रकार भौगोलिक पर्यावरण आर्थिक संरचना को प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है भूमध्यरेखीय प्रदेश में कच्चे मालों की प्रचुरता होते हुए भी तकनीक एवं विज्ञान का विकास न हो पाने के कारण उद्योग-धन्धों की स्थापना नहीं हो पायी है
आलोचना – आर्थिक संरचना पर भौगोलिक पर्यावरण के प्रभाव के विपक्ष में समीक्षकों द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि एकसमान जलवायु में समान उद्योग-धन्धों का विकास नहीं हो पाता है

3. राजनीतिक संगठन पर प्रभाव – राज्य तथा राजनीतिक संस्थाएँ भी भौगोलिक परिस्थितियों द्वारा प्रभावित होती हैं प्रतिकूल पर्यावरण में लोगों का जीवन घुमन्तू होता है और स्थायी संगठनों का विकास नहीं हो पाता अनुकूल पर्यावरण आर्थिक विकास में सहायता प्रदान करता है, राजनीति को स्थायी रूप प्रदान करता है और समानता पर आधारित प्रजातन्त्र या साम्यवाद जैसी राजनीतिक व्यवस्थाएँ विकसित होती हैं अत्यधिक आर्थिक समानता कुलीनतन्त्र का विकास करती है इस प्रकार सरकार के स्वरूप तथा राज्य के संगठन पर भी भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव देखा गया है
आलोचना – इस प्रभाव की भी आलोचना इस आधार पर की गयी है कि एकसमान भौगोलिक परिस्थितियों वाले देशों में एकसमान राजनीतिक संगठन व सरकारें नहीं हैं एक ही देश में समयसमय पर होने वाली राजनीतिक उथल-पुथल और सरकारों के स्वरूप में होने वाले हेर-फेर भी इसके प्रतीक हैं कि राजनीतिक संस्थाएँ भौगोलिक पर्यावरण द्वारा प्रभावित नहीं होतीं

4. धार्मिक जीवन पर प्रभाव – धर्म प्रत्येक समाज का एक महत्त्वपूर्ण अंग है भौगोलिक निश्चयवादी इस बात पर बल देते हैं कि भौगोलिक पर्यावरण अथवा प्राकृतिक शक्तियाँ धर्म के विकास को प्रभावित करती हैं मैक्समूलर ने धर्म की उत्पत्ति का सिद्धान्त ही प्राकृतिक शक्तियों के भय से उनकी पूजा करने के रूप में प्रतिपादित किया है जिन देशों में प्राकृतिक प्रकोप अधिक हैं, वहाँ पर धर्म का विकास तथा धर्म पर आस्था रखने वाले लोगों की संख्या अधिक होती है एशिया की मानसूनी जलवायु के कारण ही यहाँ के लोग भाग्यवादी बने हैं कृषिप्रधान देशों में इन्द्र की पूजा होना सामान्य बात है वृक्ष, गंगा और गाय भारतीयों के लिए उपयोगी हैं अतः ये सब पूजनीय हैं
आलोचना – भौगोलिकवादियों के इस तर्क को कि “प्राकृतिक शक्तियाँ ही धर्म के विकास को निर्धारित करती हैं स्वीकार नहीं किया जा सकता एकसमान भौगोलिक परिस्थितियों अथवा प्राकृतिक शक्तियों वाले देशों में धर्म का विकास एकसमान रूप से नहीं हुआ है समाज-विशेष की सामाजिक आवश्यकताओं तथा सामाजिक मूल्यों से धर्म अधिक प्रभावित होता है

5. साहित्य पर प्रभाव – साहित्य पर भी भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है भौगोलिक पर्यावरण जितना सुन्दर व अनुकूल होता है उतनी ही सृजनता अधिक होती है और साहित्य भी उतना ही सजीव और सुन्दर बन जाता है भारत में साहित्य के विकास को भौगोलिक व प्राकृतिक शक्तियों से पृथक् करके नहीं समझा जा सकता है यूनान ने सुकरात जैसे दार्शनिक और साहित्यकार दिये, यह सब वहाँ के भौगोलिक पर्यावरण की ही देन थी
आलोचना – यद्यपि साहित्य कुछ सीमा तक अप्रत्यक्ष रूप से भौगोलिक पर्यावरण से प्रभावित होता है, तथापि समान परिस्थितियों वाले समाजों में साहित्य का विकास समान नहीं हुआ है साहित्य के विकास में समाज की सामाजिक-आर्थिक दशाओं का गहरा प्रभाव पड़ता है

6. कला पर प्रभाव – साहित्य के साथ वास्तुकला, चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, नृत्य तथा नाटकों पर भी भौगोलिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है सुन्दर प्राकृतिक पर्यावरण में चित्रकारी और कृत्रिम पर्यावरण में होने वाली चित्रकारी का केन्द्रबिन्दु अलग-अलग होता है चित्रकार, संगीतकार, नर्तक इत्यादि प्राकृतिक पर्यावरण से अलग होकर अपनी कलाओं का विकास नहीं कर सकते हैं यूनान और रोम में ललित कलाओं का विकास वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ही हुआ था

आलोचना – आज कला का विकास भौगोलिक परिस्थितियों से प्रभावित नहीं है, क्योंकि यातायात व संचार साधनों के विकास से इसमें अन्तर्राष्ट्रीय आयाम जुड़ गया है तथा यह किसी एक देश की सम्पत्ति नहीं रहा है साथ ही इसके विकास में समाज की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि मानव का सामाजिक जीवन पूरी तरह भौगोलिक पर्यावरण पर टिका है भौगोलिक पर्यावरण उसके सामाजिक जीवन को पग-पग पर दिग्दर्शन करता है



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