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Answer» प्रयोगात्मक विधि(Experimental Method) आधुनिक मनोविज्ञान की मुख्य अध्ययन विधि प्रयोगात्मक विधि (Experimental Method) है। अब प्रयोगात्मक विधि को मनोविज्ञान की सर्वाधिक उपयोगी, महत्त्वपूर्ण तथा सर्वोत्तम अध्ययन विधि माना जाता है। प्रयोगात्मक विधि प्रयोगशाला में आयोजित प्रयोग के माध्यम से कार्य करती है। प्रयोगात्मक विधि अन्तर्दर्शन तथा निरीक्षण विधि से अधिक विकसित तथा वैज्ञानिक है। प्रयोग के समय प्रयोगकर्ता का दशाओं या घटनाओं पर नियन्त्रण रहता है, जबकि निरीक्षण के अन्तर्गत ऐसा नहीं होता है। उन्नीसवीं शताब्दी में वुण्ट नामक मनोवैज्ञानिक द्वारा मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला की स्थापना के साथ प्रयोग विधि का श्रीगणेश हुआ था। प्रयोग का अर्थ-वुडवर्थ के अनुसार प्रयोग का पहला अर्थ है- प्रकृति से प्रश्न करना। इसका अभिप्राय यह है कि प्रयोग करने वाले व्यक्ति के सामने एक स्पष्ट प्रश्न या समस्या होती है, जिसका उचित उत्तर पाने के लिए वह प्रकृति के सामने प्रयोग का आयोजन करता है। यह प्रश्न या समस्या किसी युक्ति से निकली उपकल्पना (सम्भावित उत्तर) पर आधारित होती है। इस उपकल्पना को प्रयोग के माध्यम से सिद्ध अथवा असिद्ध करना होता है। प्रयोग करते समय वस्तुओं को एक निश्चित क्रम में व्यवस्थित किया जाता है जिससे प्राप्त परिणाम उस प्रश्न का उत्तर देते हैं जिसे प्रकृति से पूछा गया था। अपने दूसरे अर्थ में प्रयोग नियन्त्रित वातावरण में किया गया निरीक्षण है। प्रयोग की आवश्यक शर्त के अनुसार नियन्त्रित एवं उपयुक्त परिस्थितियों में प्राणी की मानसिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है तथा परिणाम निकाले जाते हैं। इस प्रक्रिया को बार-बार दोहराने पर भी प्रयोग के परिणाम पहले के समान ही प्राप्त होते हैं। इस प्रकार नियन्त्रित निरीक्षण ही प्रयोग कहलाता है। प्रयोग की परिभाषा – प्रयोग को निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है – ⦁ गैरेट के मतानुसार, “प्रकृति से पूछा गया प्रश्न प्रयोग है।” ⦁ जहोदा के अनुसार, “प्रयोग परिकल्पना के परीक्षण की एक विधि है।” ⦁ जे० सी० टाउनशैण्ड के अनुसार, “नियन्त्रित दशाओं में किये गये निरीक्षण को प्रयोग कहा जाता है।” ⦁ फेस्टिगर के मतानुसार, “प्रयोग का मूल आधार स्वतन्त्र चर में परिवर्तन करने से परतन्त्र चर पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना है।” प्रयोगात्मक विधि के चरण(Steps of Experimental Method) प्रयोगात्मक विधि अपने आप में एक व्यवस्थित अध्ययन विधि है। इस विधि के कुछ निश्चित चरण हैं जो निम्नलिखित हैं (1) समस्या का निर्धारण – प्रयोगात्मक विधि का प्रथम चरण अध्ययन की समस्या का निर्धारण है। प्रयोग आरम्भ करने से पहले प्रयोगकर्ता समस्या का निर्धारण करता है। इसके लिए वह किसी उपयुक्त मनोवैज्ञानिक समस्या का चुनाव करता है। उदाहरण के लिए, समाज में नशे का व्यसन । बुरा समझा जाता है। प्रायः देखने में आता है कि अधिकांश ट्रक-ड्राइवर नशाखोरी करते हैं। माना जाता है कि नशा न करने वाले ड्राइवर, नशा करने वाले ड्राइवरों से सन्तुलित, विश्वसनीय एवं अच्छी गाड़ी चलाते हैं अथवा नशा करने से चरित्र पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कुछ लोगों का कहना है कि नशा करने से ध्यान एकाग्र होता है और इससे गाड़ी चलाने में मदद मिलती है। जो लोग न तो नशाखोरी के पक्ष में हैं और न ही विपक्ष में, उनके अनुसार असन्तुलित एवं अविश्वसनीय गाड़ी चलाने का कारण नशे की आदत न होकर ड्राइवर का व्यक्तित्व है। उच्च जीवन-स्तर यापन करने वाले बहुत-से लोग नशा करते हैं। ये सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित हैं, चरित्रवान समझे जाते हैं और आर्थिक रूप से भी सम्पन्न हैं। इस तर्क-वितर्क से इस समस्या का जन्म होता है कि शारीरिक या मानसिक क्षमता पर नशाखोरी का क्या प्रभाव पड़ता है। (2) परिकल्पनाका निर्माण – समस्या का निर्धारण करने के उपरान्त प्रयोगकर्ता परिकल्पना (Hypothesis) का निर्माण करता है। परिकल्पना चुनी गयी समस्या का सम्भावित समाधान होता है, जिसकी रचना से प्रयोग को कार्य निश्चित और नियन्त्रित दशाओं में होता है। उपर्युक्त प्रस्तुत किये गये उदाहरण में, शारीरिक तथा मानसिक क्षमता पर नशाखोरी के प्रभाव की समस्या को परिकल्पना के रूप में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है-“नशा (अफीम का सेवन) करने से शारीरिक तथा मानसिक क्षमता का ह्रास होता है।” इस परिकल्पना को प्रयोगों के आधार पर सिद्ध या असिद्ध किया जाएगा। (3) स्वतन्त्र तथा आश्रित चरों को पृथक करना – किसी प्रयोग में दो या उससे अधिक ‘चर’ या परिवर्त्य (Variables) हो सकते हैं। ये चर दो प्रकार से वर्णित हैं—स्वतन्त्र चर तथा आश्रित चर। स्वतन्त्र चर (Independent Variable) को सामान्यत: ‘उद्दीपन कहा जाता है और आश्रित चर (Dependent Variable) को प्रतिक्रियाएँ कहा जाता है। स्वतन्त्र चर को प्रयोगकर्ता नियन्त्रित करके प्रस्तुत करता है। इन्हें बिना किसी अन्य चर पर प्रभाव डाले घटाया-बढ़ाया जा सकता है। आश्रित चर स्वतन्त्र ज्वरों के बदले जाने पर बदल जाते हैं और प्रयोगात्मक परिस्थितियों पर आश्रित होते हैं। उपर्युक्त उदाहरण में, नशाखोरी स्वतन्त्र चर है, क्योंकि प्रयाग में नशा करने और न करने के प्रभाव की परीक्षा की जाती है। शारीरिक और मानसिक क्षमता आश्रित चर है क्योंकि यह नशाखोरी की उपस्थिति या अनुपस्थिति के अनुसार परिवर्तित होगा। (4) परिस्थितियों पर नियन्त्रण – मनोवैज्ञानिक प्रयोग में परिस्थितियों (दशाओं) पर नियन्त्रण एक आवश्यक तत्त्व है। इसके लिए प्रयोगकर्ता को सभी सम्भावित चरों का ज्ञान होना चाहिए। उसे उन अवांछित चरों या उद्दीपनों पर नियन्त्रण रखना पड़ता है जो वातावरण में उत्पन्न हो जाते हैं। और जिनकी प्रयोगकर्ता को आवश्यकता नहीं होती है। प्रस्तुत उदाहरण में सम्भव है कि प्रयोग का पात्र व्यक्ति यह सिद्ध करने की चेष्टा करे कि नशा करने से उसकी शारीरिक-मानसिक क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता। यह एक अवांछित सम्भावना है जिसे निर्मूल करने के लिए प्रयोग में परिस्थिति पर नियन्त्रण रखना आवश्यक है। (5) प्रयोगफल का विश्लेषण – प्रयोग द्वारा प्राप्त परिणामों का विश्लेषण प्रयोगात्मक विधि का पाँचवाँ एवं महत्त्वपूर्ण चरण है। विश्लेषण के लिए सांख्यिकीय प्रविधियों का प्रयोग किया जा सकता है। प्रयोग के दौरान अधिक पात्र होने पर उन्हें दो समूहों में विभाजित किया जा सकता है(i) प्रायोगिक समूह (Experimental Group) तथा (ii) नियन्त्रित समूह (Controlled Group)। अक्सर स्वतन्त्र चर, प्रायोगिक समूह कहलाता है और आश्रित चर, नियन्त्रित समूह। इस प्रयोग में नशे की वस्तु (माना अफीम) स्वतन्त्र चर है जिसके प्रयोग से प्राप्त परिणामों की तुलना अफीमरहित परिणामों के साथ की जाएगी। (6) परिकल्पना की जाँच – प्रयोग के परिणाम यदि निर्माण की गयी परिकल्पना के पक्ष में होते हैं तो परिकल्पना सिद्ध मान ली जाती है, किन्तु विपरीत परिणामों की स्थिति में परिकल्पना को रद्द या अस्वीकृत घोषित कर दिया जाता है तब नयी परिकल्पना का निर्माण किया जाता है। प्रस्तुत प्रयोग के परिणाम यदि परिकल्पना अर्थात् “नशा (अफीम का सेवन करने से शारीरिक तथा मानसिक क्षमता का ह्रास होता है”–के पक्ष में जाते हैं तो हमारी परिकल्पना सिद्ध मानी जाएगी। स्पष्टत: इस दशा में अफीम का सेवन ड्राइवरों की शारीरिक-मानसिक क्षमता में ह्रास लाएगा। यदि परिणामों से यह ज्ञात हो कि अफीम के सेवन से ड्राइवरों की शारीरिक-मानसिक क्षमता पर धनात्मक (अच्छा) प्रभाव पड़ा तो हमारी परिकल्पना रद्द समझी जाएगी। (7) सामान्यीकरण – एकसमान परिस्थितियों में तथा निरन्तर प्रयोगों के माध्यम से स्वतन्त्र चर का आश्रित चर पर प्रभाव देखकर जो परिणाम प्राप्त होते हैं उनके विश्लेषण एवं व्याख्या के आधार पर सामान्य नियम निकाले जाते हैं। यही सामान्यीकरण है जो प्रयोगात्मक विधि का अन्तिम चरण है। प्रयोगात्मक विधि के गुण या लाभ (महत्त्व)(Merits of Experimental Method) प्रयोगात्मक विधि एक वैज्ञानिक विधि है जिसके द्वारा सुचारु रूप से अध्ययन किये जा सकते हैं। और निश्चित पेरिणामों तक पहुँचा जा सकता है। ये परिणाम अधिक शुद्ध और विश्वसनीय होते हैं। इसके अन्य गुणों (विशेषताएँ) या लाभ निम्नलिखित हैं –(1) परिस्थिति सम्बन्धी आत्म-निर्भरता – प्रयोगात्मक विधि में, निरीक्षण विधि की तरह, प्रयोगकर्ता प्राकृतिक परिस्थितियों पर आश्रित नहीं रहता। वह आवश्यकतानुसार कृत्रिम परिस्थितियों का निर्माण कर प्रयोग कर लेता है जिससे समय और शक्ति की बचत होती है। (2) पूर्ण वैज्ञानिक विधि – यह एक पूर्ण वैज्ञानिक विधि है जिसके अन्तर्गत नियन्त्रित परिस्थितियों में प्रयोग के माध्यम से वांछित परिणाम एवं निष्कर्ष निकाले जाते हैं। अन्य विधियों की तुलना में इस विधि के निष्कर्ष अधिक शुद्ध एवं विश्वसनीय होते हैं। (3) नियन्त्रित परिस्थितियाँ – इस विधि का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसमें प्रयोग की परिस्थितियाँ (दशाएँ) पूरी तरह प्रयोगकर्ता के नियन्त्रण में रहती हैं। प्रयोगशाला में परिस्थितियों पर नियन्त्रण रखकर ही सही निष्कर्ष प्राप्त किये जा सकते हैं। (4) दोहराना – प्रयाग की एक विशेषता यह है कि इसको सुविधानुसार दोहराया जा सकता है। प्रयोगकर्ता अपनी आवश्यकतानुसार पूरी घटना को दोहरा सकता है या घटना के किसी एक पक्ष की पुनरावृत्ति भी कर सकता है। (5) उद्देश्यानुसार एवं समुचित प्रयोग योजना – प्रयोगात्मक विधि में प्रयोगकर्ता निर्धारित उद्देश्य के अनुसार आसान प्रयोग योजना तैयार कर सकता है। वह उसमें वांछित परिवर्तन भी कर सकता है। इसके अतिरिक्त, समुचित प्रयोग योजना के माध्यम से मानव स्वभाव के विविध पक्षों का अध्ययन सम्भव है। (6) पशुओं पर प्रयोग सम्भव – सभी प्रकार के प्रयोगों को मानव-स्वभाव पर लागू करके निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते। पशुओं पर मनोवैज्ञानिक प्रयोग करने में प्रयोग विधि हमारी अत्यधिक सहायता करती है। इससे प्राप्त परिणामों को लागू करने से पूर्व इनकी मानव-स्वभाव से तुलना करके देखा जाता है। (7) कार्य-कारण सम्बन्धों का अध्ययन – प्रयोग विधि के माध्यम से कार्य और कारण सम्बन्धों का शुद्धतापूर्वक अध्ययन किया जा सकता है। इसके अन्तर्गत समस्या से सम्बन्धित विभिन्न कारकों के प्रभाव को पृथक् से भी जाना जा सकता है। प्रयोग में हम जिस कारक के प्रभाव की जाँच करना चाहते हैं, उसके अतिरिक्त अन्य कारकों को नियन्त्रित रखकर प्रभाव का स्पष्ट एवं शुद्ध ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। (8) वस्तुनिष्ठ, विश्वसनीय एवं सम्पूर्ण विधि – प्रयोगात्मक विधि से प्राप्त निष्कर्ष वस्तुनिष्ठ, विश्वसनीय, वैध तथा सार्वभौमिक होते हैं। एक ओर जहाँ अन्तर्दर्शन विधि केवल आन्तरिक दशाओं का अध्ययन करती है और निरीक्षण विधि व्यवहार की बाह्य दशाओं का, वहीं दूसरी ओर प्रयोग विधि प्राणी के आन्तरिक एवं बाह्य दोनों पक्षों का अध्ययन करती है। इस प्रकार यह मनोवैज्ञानिक अध्ययन की एक सम्पूर्ण विधि है। प्रयोगात्मक विधि के दोष अथवा कठिनाइयाँ (कमियाँ)(Demerits of Experimental Method) भले ही प्रयोगात्मक विधि को मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए सर्वोत्तम विधि माना जाता है, परन्तु अन्य विधियों के ही समान इस विधि में भी कुछ दोष या कमियाँ हैं, जिनका सामान्य विवरण निम्नवत् है – (1) प्रयोगशाला की कृत्रिम परिस्थिति – प्रयोग किसी विशेष अध्ययन के लिए प्रयोगशाला की विशिष्ट परिस्थितियों में आयोजित किये जाते हैं। ये विशिष्ट परिस्थितियाँ प्राकृतिक परिस्थितियों के समान न होकर कृत्रिम होती हैं और कृत्रिम व्यवहार से शुद्ध परिणाम प्राप्त करना कठिन है। नियन्त्रित एवं बनावटी परिस्थितियों में कोई भी प्रयोज्य (Subject) या व्यक्ति स्वाभाविक व्यवहार प्रदर्शित नहीं कर सकता। इससे प्रयोग के मध्य त्रुटियाँ उत्पन्न होने लगती हैं। (2) विषय-पान्न की रुचियों पर नियन्त्रण कठिन – मानव की मन:स्थिति तथा उसकी रुचियाँ परिवर्तनशील होती हैं जिन पर नियन्त्रण यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। प्रयोग के दौरान ज्यादातर विषय-पात्र अपनी-अपनी मन:स्थिति या रुचियों से प्रेरित होकर ही व्यवहार करते हैं। इससे प्रयोग के परिणाम पक्षपातपूर्ण एवं भ्रामक प्राप्त होते हैं। (3) विषय-पात्र के सहयोग की समस्या – प्रयोगात्मक पद्धति में विषय-पात्र जब तक प्रयोगकर्ता को अपना पूर्ण सहयोग प्रदान नहीं करता, तब तक प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाती। असहयोग की अवस्था में न केवल अवरोध उत्पन्न होता है, वरन् प्रयोग ही व्यर्थ हो जाता है। यदि किसी प्रयोग में व्यक्ति के व्यक्तित्व का अध्ययन किया जा रहा है तो वह व्यक्ति कभी-कभी ऐसा व्यवहार प्रदर्शित करने लगता है कि उसके व्यक्तित्व का नितान्त त्रुटिपूर्ण स्वरूप प्रस्तुत हो जाता है। कभी-कभी प्रयोगकर्ता पात्र की प्रक्रियाओं की प्रतीक्षा ही करता रह जाता है। इससे समय और शक्ति की हानि होती है। (4) संदिग्ध परिणाम – यदि प्रयोगकर्ता प्रशिक्षित नहीं है तो वह प्रयोग सम्बन्धी प्रक्रिया में वस्तुनिष्ठता नहीं ला सकता जिससे परिणाम की शुद्धता संदिग्ध हो जाती है। (5) सामाजिक घटनाओं सम्बन्धी समस्या – समाज का स्वरूप अत्यन्त व्यापक है; अत: सामाजिक घटनाओं को अध्ययन हेतु किसी प्रयोगशाला में उपस्थित नहीं किया जा सकता। वस्तुतः सामाजिक घटनाओं के मनोवैज्ञानिक प्रभाव का अध्ययन करने के लिए प्रयोगकर्ता को समाज की वास्तविक परिस्थितियों में रहकर काम करना होगा। इन परिस्थितियों में प्रयोगशाला एवं उसके उपकरण व्यर्थ ही सिद्ध होते हैं। (6) सीमित क्षेत्र की कठिनाई – प्रयोगात्मक विधि का कार्य-क्षेत्र अत्यन्त सीमित है। इस विधि का प्रयोग हम उन सभी दशाओं में नहीं कर सकते जिनमें हम करना चाहते हैं। अनेक मनोवैज्ञानिक अध्ययन प्रयोग द्वारा नहीं किये जा सकते। उदाहरण के लिए-स्मृति पर शराब के प्रभाव को समझने के लिए बालकों, स्त्रियों या दूसरे पात्रों को शराब नहीं पिलायी जा सकती है। इसी प्रकार प्रेम, घृणा तथा यौन क्रियाओं सम्बन्धी क्रियाकलापों पर न तो नियन्त्रण रखा जा सकता है और न ही इन्हें प्रयोगशाला में समुचित रूप में आयोजित किया जा सकता है। मूल्यांकन – वस्तुत: प्रयोगात्मक विधि की उपर्युक्त सीमाओं के ज्ञान से उसके महत्त्व को कम नहीं आँका जा सकता। टी० जी० एण्ड्यू ज का कथन है, “प्रयोग ही मनोविज्ञान का केन्द्रीय आधार है। इस पद्धति की वैज्ञानिकता के परिणामस्वरूप ही मनोविज्ञान एक शुद्ध विज्ञान बन सका है। प्रयोगों की सफलता एवं उपयोगिता ने आधुनिक मनोविज्ञान को ‘परीक्षणशाला मनोविज्ञान का नाम प्रदान कर दिया।
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