|
Answer» राज्य के कार्य प्रत्येक युग के विचारकों का ध्यान राज्य की प्रकृति तथा उसके कार्यक्षेत्र पर अवश्य गया है। सभी ने अपने समय की परिस्थितियों एवं ज्ञान के आधार पर राज्य के कार्यों का वर्णन किया है। देशकाल की परिस्थितियों के अनुसार राज्य के कार्य परिवर्तित होते रहते हैं। प्रारम्भिक समय में राज्य द्वारा केवल वे ही कार्य किए जाते थे, जिनको करना राज्य के अस्तित्व हेतु नितान्त आवश्यक था। लेकिन वर्तमान काल में राज्य द्वारा किए जाने वाले कार्यों में अत्यधिक वृद्धि हो गई है। उसके कार्यों को एक सीमा में बाँधकर उनकी सूची तैयार करना असम्भव है। फिर भी राज्य द्वारा वर्तमान में जो कार्य किए जाते हैं उन्हें दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- (अ) राज्य के आवश्यक अथवा अनिवार्य कार्य तथा (ब) राज्य के ऐच्छिक अथवा सामाजिक कार्य। (अ) राज्य के आवश्यक अथवा अनिवार्य कार्य अनिवार्य कार्यों का तात्पर्य ऐसे कार्यों से है जिनका सम्पादन करना प्रत्येक राज्य के लिए नितान्त आवश्यक है। इन कार्यों को रोकने से अथवा इन कार्यों के सम्पादन में असफल होने पर राज्य का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। राज्य के आवश्यक कार्य निम्नलिखित हैं- 1. बाहरी आक्रमणों से देश की सुरक्षा करना – देश की सुरक्षा करना प्रत्येक राज्य का अनिवार्य कार्य है। यदि राज्य इस कार्य को नहीं करे तो उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। इस कार्य के लिए राज्य को जल, नभ तथा स्थल सेना रखनी पड़ती है। इसके साथ-साथ उसको अन्य राज्यों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाने का प्रयास करना पड़ता है, जिससे आपातकाल | में आवश्यकता पड़ने पर उनसे सहायता प्राप्त की जा सके। 2. आन्तरिक शक्ति एवं सुव्यवस्था की स्थापना करना – राज्य का प्रमुख कार्य अपने क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत शान्ति एवं सुव्यवस्था की स्थापना, नागरिकों के जीवन तथा सम्पत्ति की रक्षा, आन्तरिक उपद्रवों का दमन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की रक्षा करना है। मैकाइवर के शब्दों में राज्य केवल शान्ति एवं व्यवस्था का प्रबन्ध ही नहीं करता है। राज्य का कर्तव्य है कि वह सर्वसाधारण की सुरक्षा एवं उनके व्यक्तित्व के पूर्ण विकास में सहयोग दे।” इसके लिए राज्य को अपराध निश्चित करने तथा दण्ड देने की व्यवस्था करनी पड़ती है। 3. न्याय का समुचित प्रबन्ध करना – देश में शान्ति की स्थापना पुलिस तथा सेना के बल पर ही नहीं हो सकती, बल्कि इसके लिए राज्य को कानून का उल्लंघन करने वालों को उचित दण्ड देने के लिए एक कुशल एवं स्वतन्त्र न्यायपालिका की व्यवस्था भी करनी पड़ती है। 4. अधिकार तथा कर्तव्यों का निर्धारण करना – नागरिक के अधिकार तथा कर्तव्यों की सीमा का निर्धारण करना और उन्हें विभिन्न प्रकार की राजनीतिक सुविधाएँ प्रदान करना भी राज्य का अनिवार्य कार्य है। वर्तमान लोकतन्त्रीय युग में नागरिकों के अधिकार तथा कर्तव्यों का अत्यधिक महत्त्व है। 5. परिवार में कानूनी सम्बन्ध स्थापित करना – राज्य का यह भी कर्तव्य है कि वह कानून का निर्माण कर पारिवारिक जीवन को सुखी तथा सामुदायिक जीवन को सुसंगठित करे। अतः पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चों के बीच कानूनी सम्बन्ध स्थापित करना भी उसका अनिवार्य कार्य है। इसके अन्तर्गत सम्पत्ति के क्रय-विक्रय और ऋण के लेन-देन इत्यादि के कानून सम्मिलित हैं। 6. मुद्रा की व्यवस्था करना – राज्य का एक आवश्यक कार्य मुद्रा की व्यवस्था करना है। किसी देश की अर्थव्यवस्था वहाँ की मुद्रा-व्यवस्था पर विशेष रूप से आधारित होती है। मुद्रा के बिना राज्य का कार्य नहीं चल सकता। वर्तमान प्रत्येक देश में धन का अधिकांश लेन-देन बैंकों द्वारा किया जाता है और बैंकों पर सरकार का कठोर नियन्त्रण है। 7. कर संग्रह करना – राज्य के कार्यों को सम्पादित करने के लिए प्रचुर धनराशि की आवश्यकता | होती है। धन के अभाव में राज्य एक क्षण भी नहीं चल सकता है। धन-प्राप्ति के लिए राज्य अनेक प्रकार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर लगाता है। इस प्रकार कर लगाना और वसूल करना राज्य का एक अनिवार्य कार्य है। (ब) राज्य के ऐच्छिक अथवा सामाजिक कार्य राज्य के वे कार्य ऐच्छिक कहलाते हैं जिनको राज्य यदि सम्पादित न भी करे तो राज्य का अस्तित्व समाप्त नहीं होगा, लेकिन व्यक्तियों के नैतिक, सामाजिक, मानसिक एवं आर्थिक कल्याण की वृद्धि हेतु ऐसे कार्य आवश्यक होते हैं। मानव जीवन को सुखी, सुन्दर एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए राज्य निम्नलिखित ऐच्छिक अथवा सामाजिक कार्य करता है- 1. शिक्षा की व्यवस्था – मानवीय व्यक्तित्व के विकास में शिक्षा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके अभाव में व्यक्ति के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास असम्भव है। अतः वर्तमान में शिक्षा का प्रबन्ध करना राज्य का महत्त्वपूर्ण कार्य समझा जाता है। इसी कारण राज्य प्रारम्भिक शिक्षा का संचालन करते हैं। राज्यों द्वारा नि:शुल्क तथा अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षा की व्यवस्था भी की जाती है। नागरिकों की मानसिक चेतना के विकास के लिए राज्य पुस्तकालयों तथा प्रयोगशालाओं इत्यादि की स्थापना करता है। 2. सफाई एवं स्वास्थ्य रक्षा का प्रबन्ध – सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुव्यवस्था, सफाई एवं चिकित्सा इत्यादि का प्रबन्ध राज्य ही करता है। संक्रामक रोग एवं महामारियों को रोकने के लिए राज्य कानून बनाता है तथा नगरों एवं ग्रामों की सफाई का प्रबन्ध करता है। राज्य नागरिकों की चिकित्सा हेतु अस्पतालों की स्थापना करता है जहाँ नि:शुल्क अथवा उचित मूल्य पर चिकित्सा का प्रबन्ध रहता है। 3. सामाजिक सुधार – समाज सुधार हेतु प्रयास करना राज्य का एक नैतिक कर्तव्य है। प्रत्येक देश के सामाजिक जीवन में कुछ ऐसी कुरीतियाँ एवं रूढ़ियाँ प्रचलित रहती हैं जो सामाजिक जीवन के विकास का मार्ग अवरुद्ध करती हैं। उदाहरणार्थ, भारत में कुछ समय पहले बालविवाह, छुआछूत, साम्प्रदायिकता इत्यादि का बोलबाला था लेकिन सरकार ने इन सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने की दिशा में कठोर प्रयास किए हैं। इसके फलस्वरूप बाल-विवाह एवं छुआछूत को समाप्त करने में तो भारत सरकार कुछ सीमा तक सफल रही है लेकिन साम्प्रदायिकता एवं जातीयता का जहर अभी तक समाज में व्याप्त है। 4. बेकारी का उल्मूलन – बेकारी चोरी, लूट तथा अन्य असामाजिक प्रवृत्तियों को जन्म देती है। अत: प्रत्येक राज्य का यह कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों को रोजगार दे। इसके लिए राज्य नए कल-कारखानों एवं उद्योगों की स्थापना करता है। 5. निर्धन, वृद्ध एवं अपाहिजों की सुरक्षा – राज्य में कुछ ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जो वृद्ध, रोगी, अपाहिज अथवा असहाय होने के कारण स्वयं अपनी आजीविका नहीं कमा सकते। राज्य का यह कर्तव्य है कि वह ऐसे लोगों की सहायता करे। इसी उद्देश्य को पूरा करने हेतु राज्य निर्धन-गृह, अन्धाश्रम, मानसिक चिकित्सालय, अनाथालय इत्यादि का प्रबन्ध करता है। राज्यों द्वारा वृद्ध तथा असहायों को उनकी जीवन रक्षा हेतु आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। 6. उद्योग-धन्धों का विकास – देश की आर्थिक स्थिति को मजबूती प्रदान करने के लिए आवश्यक है कि अधिकाधिक उद्योग-धन्धों का विकास हो। इस बारे में राज्य का यह कर्तव्य है कि बड़े उद्योगों का वह स्वयं अधिग्रहण करके तथा छोटे एवं कुटीर उद्योगों को आर्थिक सहायता प्रदान करके प्रोत्साहित करे। इसके लिए राज्य को वित्तीय सहायता, औद्योगिक अन्वेषण केन्द्रों की सहायता तथा वैज्ञानिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। 7. कृषि का विकास-कृषि – प्रधान देशों की उन्नति तब तक नहीं हो सकती जब तक कि कृषि का विकास ने हो। अतः राज्य को कृषि की उन्नति की ओर भी ध्यान देना पड़ता है। इसके लिए सिंचाई का प्रबन्ध, श्रेष्ठ बीज, उत्तम खाद, कृषि सम्बन्धी नवीन तकनीक एवं उपकरणों की व्यवस्था तथा आपातकाल में किसानों की आर्थिक सहायता इत्यादि की व्यवस्था राज्य ही करता है। 8. श्रमिकों का कल्याण – श्रमिकों के हितों की रक्षा करना राज्य का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। पूँजीपति वर्ग श्रमिकों का शोषण न कर सके इसके लिए कारखाना कानून तथा श्रम कानूनों द्वारा सरकार पूँजीपतियों पर नियन्त्रण रखती है। काम के अधिकतम घण्टे, न्यूनतम पारिश्रमिक, श्रमिकों की दशा में सुधार तथा प्रबन्धक एवं श्रमिकों के मध्य होने वाले विवादों के निष्पादन हेतु राज्य नियमों की रचना करता है। 9. यातायात एवं संचार – साधनों का विकास – यातायात तथा संचार-साधनों के अभाव में कोई भी देश आर्थिक प्रगति नहीं कर सकता। यही कारण है कि प्रत्येक राज्य रेल, डाक एवं तार, टेलीफोन, रेडियो, दूरदर्शन इत्यादि साधनों का अधिकतम विकास करता है। 10. ललित कला, साहित्य एवं विज्ञान को प्रोत्साहन – राष्ट्र के निर्माण में ललित कला, साहित्य एवं विज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अतः प्रत्येक राज्य उन्हें प्रोत्साहित करता है। 11. मनोरंजन का प्रबन्ध – यह कहा जाता है कि श्रम के पश्चात् आराम एवं मनोरंजन जीवन को दीर्घायु बनाते हैं। मनोरंजन से जहाँ एक ओर शिथिल अंगों में स्फूर्ति का संचार होता है। वहीं दूसरी ओर शरीर को आवश्यक कार्य करने हेतु ऊर्जा प्राप्त होती है। अतः राज्य नागरिकों के मनोरंजन के लिए समुचित व्यवस्था करता है। वर्तमान में नागरिकों के स्वस्थ मनोरंजन हेतु राज्य पार्क, सार्वजनिक स्थल, सिनेमा, चिड़ियाघर, साहित्य परिषद् एवं खेल के मैदान इत्यादि की व्यवस्था करता है। 12. मादक पदार्थों पर नियन्त्रण – मादक पदार्थों, जैसे—शराब, गाँजा, भाँग, तम्बाकू, सिगरेट इत्यादि पर रोक लगाना भी राज्य का आवश्यक कर्तव्य हैं। जो राज्य इनकी उपेक्षा करते हैं, वहाँ के नागरिकों के स्वास्थ्य एवं चरित्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और राज्य पतन की ओर उन्मुख हो जाता है। अतः राज्य को नागरिकों के कल्याणार्थ मादक पदार्थों की बिक्री पर पूर्ण नियन्त्रण रखना चाहिए। 13. राष्ट्रीय विकास योजनाओं का निर्माण – वर्तमान में राज्य का एक महत्त्वपूर्ण ऐच्छिक कार्य राष्ट्रीय विकास की योजनाओं का निर्माण करके उन्हें क्रियान्वित करना है। सभ्यता के विकास के साथ-साथ मानव जीवन की जटिलता बढ़ती जा रही है जिसके फलस्वरूप राज्य के कार्यों की सूची लम्बी तथा विशाल होती जा रही है। यहाँ महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि राज्य के ऐच्छिक तथा अनिवार्य कार्यों में अन्तर केवल मात्रा का है, प्रकार का नहीं। जो कार्य किसी राज्य द्वारा आज ऐच्छिक समझे जाते हैं वे ही कल अनिवार्य कार्यों की श्रेणी में भी आ सकते हैं। इस प्रकार राज्य के कार्यों का क्षेत्र दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। राज्य के कार्य-क्षेत्र सम्बन्धी सिद्धान्त राज्य के कार्यों के सम्बन्ध में अनेक सिद्धान्तों को प्रतिपादन हो चुका है। इसका मुख्य कारण यह है कि राज्य के उचित कार्य-क्षेत्र के सम्बन्ध में विद्वानों में एकमत का अभाव है। प्राचीनकाल में व्यक्ति के हित और राज्य के हित को समान समझा जाता था। जॉन लॉक का मत था कि राज्य के कार्य-क्षेत्र की सीमाएँ व्यक्ति के प्राकृतिक और जन्मजात अधिकारों द्वारा निर्धारित होती हैं। इस मत के आधार पर यूरोप में हस्तक्षेप न करने का सिद्धान्त प्रचलित हुआ। हरबर्ट स्पेन्सर ने इस सिद्धान्त के आधार पर ही व्यक्तिवादी विचारधारा का प्रतिपादन किया। यह कहा जाने लगा, “राज्य व्यक्ति के लिए है, न कि व्यक्ति राज्य के लिए।” कालान्तर में आदर्शवाद, अराजकतावाद, समाजवाद आदि विचारधाराएँ विकसित होकर राज्य के कार्य-क्षेत्र का निर्धारण अपने-अपने सिद्धान्तों के अनुकूल करने लगीं। बीसवीं शताब्दी में कल्याणकारी राज्य की भावना का विकास हुआ। इसने राज्य के कार्य-क्षेत्र का व्यापक विस्तार कर दिया। भारतीय विचारकों ने पाश्चात्य विचारकों से बहुत पहले ही कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को साकार रूप प्रदान किया था। मनु ने प्राचीनकाल में ही राज्य के कार्यों का निर्धारण कर दिया था। कालान्तर में कौटिल्य ने भी राज्य के कार्यों की सीमाओं का निश्चित किया था। लेकिन भारतीय विचारकों को दृष्टिकोण राजतन्त्रात्मक प्रणाली से प्रभावित था, जबकि आज विश्व के अधिकांश राज्यों में लोकतन्त्रात्मक प्रणाली स्थापित है। यही कारण है कि इक्कीसवीं शताब्दी के इस प्रारम्भिक दौर में लोक-कल्याणकारी राज्य की श्रेष्ठता स्थापित हो चुकी है।
|