1.

राज्य के कार्यों के सम्बन्ध में व्यक्तिवादी दृष्टिकोण का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। याराज्य के कार्यों का व्यक्तिवादी सिद्धान्त क्या है? इसकी विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।याव्यक्तिवाद से आप क्या समझते हैं ? इसके गुण एवं दोषों की विवेचना कीजिए।या“राज्य एक आवश्यक बुराई है।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने विचारों के पक्ष में तीन तर्क दीजिए। याव्यक्तिवाद की विशेषताएँ बतलाइए तथा समाजवाद से इसका अन्तर स्पष्ट कीजिए।या“राज्य एक अनिवार्य बुराई है।” इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।

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व्यक्तिवादी सिद्धान्त
व्यक्तिवादी सिद्धान्त के समर्थक व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर सर्वाधिक बल देते हैं। उनके अनुसार, राज्य के कार्य तथा कानून व्यक्ति की स्वतन्त्रता को प्रतिबन्धित करते हैं; अतः राज्यों के कार्यों की संख्या न्यूनतम होनी चाहिए। राज्य को व्यक्ति के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
इस सिद्धान्त के समर्थक एडम स्मिथ, जे०एस० मिल, हरबर्ट स्पेन्सर आदि थे। फ्रीमैन के शब्दों में, “सबसे अच्छी सरकार वह है जो सबसे कम शासन करती है।’
एक अन्य लेखक के अनुसार, “राज्य एक अनिवार्य बुराई है।” अर्थात् यह एक ऐसी बुराई है। जिसे व्यक्ति विवश होकर अपनाता है; अतः इसे अधिक कार्य नहीं सौंपे जाने चाहिए।

बेन्थम के शब्दों में, “व्यक्ति के हित को समझे बिना समुदाय के हित की कल्पना करना कोरी बकवास है।”
व्यक्तिवादियों के अनुसार, “राज्य एक अयोग्य संस्था है।”

स्पेन्सर के शब्दों में, “विधानमण्डलों के अँगूठा टेक, अशिक्षित तथा अनुभवहीन सदस्यों ने अतीत में अनेक भयंकर भूलें करके समाज को हानि पहुँचाई है। अतः भविष्य में उन पर कोई विश्वास नहीं किया जाना चाहिए।

व्यक्तिवादी मत के अनुसार राज्य का कार्यक्षेत्र
व्यक्तिवादी चाहते हैं कि राज्य के कार्यक्षेत्र को अधिक-से-अधिक सीमित कर दिया जाये। स्पेन्सर के मतानुसार, “व्यक्ति का स्थान समाज तथा राज्य के ऊपर होना चाहिए और राज्य को केवल वही कार्य करने चाहिए जिन्हें व्यक्ति नहीं कर सकता। उनके अनुसार राज्य के केवल निम्नलिखित तीन कार्य होने चाहिए-
1. आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था करना – राज्य की आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है। राज्य में नागरिकों को घूमने-फिरने, सभा करने, मिलने-जुलने, आजीविका प्राप्त करने इत्यादि के अनेक अधिकार होते हैं, परन्तु समाज में अनेक ऐसे व्यक्ति होते हैं जो इन अधिकारों के प्रयोग में बाधा उत्पन्न करते हैं। इससे लोगों का जीवन व सम्पत्ति खतरे में पड़ जाती है। ऐसे असामाजिक तत्वों का दमन कर शान्ति और व्यवस्था बनाये रखना राज्य का प्रधान कर्तव्य है, इसीलिए राज्य पुलिस और सेना की सहायता से समाज में शान्ति और व्यवस्था का प्रबन्ध करता है। राज्य अपराधों, उपद्रव, लूटमार, चोरी-डकैती, विद्रोह आदि को रोकता है।
2. देश की बाहरी आक्रमणों से रक्षा करना – कभी-कभी एक राज्य दूसरे राज्य पर आक्रमण कर उस पर आधिपत्य स्थापित करने का प्रयास करता है। आत्म-रक्षा प्रत्येक राज्य का प्रमुख कार्य होता है। बाहरी आक्रमणों से रक्षा करने की दृष्टि से राज्य शक्तिशाली जल, थल तथा वायु सेना आदि रखता है। इस प्रकार बाह्य आक्रमण से देश की रक्षा करना राज्य का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसके अभाव में उसका अस्तित्व ही समाप्त हो सकता है।
3. न्याय और दण्ड की व्यवस्था करना – समाज में शान्ति और व्यवस्था बनाये रखने के लिए न्याय की उत्तम व्यवस्था का होना भी अनिवार्य है। न्याय की समुचित व्यवस्था से ही दुर्बल और असहाय व्यक्ति के अधिकार सुरक्षित रह पाएँगे और प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करेगा। इसलिए न्याय का प्रबन्ध करना भी राज्य का अनिवार्य कार्य है। न्याय के साथ दण्ड भी सम्बद्ध है। दण्ड का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं होना चाहिए, उसका उद्देश्य अपराधी का सुधार होना चाहिए।

व्यक्तिवाद की विशेषताएँ
व्यक्तिवादी सिद्धान्त की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
⦁    यह सिद्धान्त राज्य की सर्वव्यापक शक्ति का विरोध करता है।
⦁    यह सिद्धान्त इस बात में विश्वास नहीं करता कि राज्य के अपने निजी व्यक्तित्व और अपने निजी उद्देश्य हैं। व्यक्ति स्वयं साध्य है और राज्य साधन।
⦁    व्यक्तिवादी राज्य की निरंकुशता तथा असीमितता में विश्वास नहीं करते।
⦁    यह सिद्धान्त ‘लैसिस फेयर’ (Laissez Faire) के नाम से पुकारा जाता है, जिसका अभिप्राय है कि मनुष्य को जो वह चाहे करने दो।
⦁    व्यक्तिवादी चाहते हैं कि राज्य को मनुष्य के जीवन से अलग रहना चाहिए।
⦁    व्यक्तिवादियों के मतानुसार, राज्य का कार्य मनुष्य की स्वतन्त्रता की रक्षा करना, अपराधी को दण्ड देना और बाहरी शत्रु से देश की रक्षा करना है, अर्थात् राज्य का कार्य मनुष्य की रक्षा करना है न कि उनके व्यक्तित्व के विकास में सहायता करना।
⦁    व्यक्तिवादियों के अनुसार, राज्य का अस्तित्व मानव-स्वभाव की निर्बलता का कारण है।
⦁    स्वतन्त्रता व्यक्तिवाद की आधारशिला है। यह सिद्धान्त राज्य को व्यक्तियों की स्वतन्त्रता की रक्षा करने के लिए केवल पुलिस संगठन का कार्य देना चाहता है। राज्य को ऐसी कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व के स्वतन्त्र विकास में कोई बाधा उत्पन्न हो।
⦁    व्यक्तिवादियों के अनुसार, “राज्य एक अभिशाप है, क्योंकि वह व्यक्तिगत स्वतन्त्रता छीनता है तथा एक ऐसी संस्था है जो बुरी होते हुए भी समाज से अराजकता और अव्यवस्था दूर करने के लिए आवश्यक है।

व्यक्तिवाद के पक्ष में तर्क (गुण)
व्यक्तिवादी सिद्धान्त के समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं-
1. नैतिक तर्क – व्यक्तिवाद के समर्थन में नैतिक तर्क यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना अलग व्यक्तित्व तथा विशेषता होती है। अत: यह आवश्यक है कि राज्य सभी व्यक्तियों को समान न समझे, अपितु प्रत्येक व्यक्ति को उसकी इच्छा के अनुसार अपनी शिक्षा, व्यवसाय तथा मनोरंजन आदि कार्यों को करने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए। मिल ने कहा है कि व्यक्तिगत जीवन में राजकीय हस्तक्षेप व्यक्ति के आत्म-विश्वास को नष्ट कर देता है, उसकी उत्तरदायित्व की भावना को कमजोर बनाता है तथा चारित्रिक विकास को अवरुद्ध कर देता
2. आर्थिक तर्क – एडम स्मिथ, माल्थस, मिल, रिकाड आदि अर्थशास्त्री इस विचारधारा के सम्बन्ध में यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि व्यक्ति अपने हानि-लाभ तथा आर्थिक हितों को स्वयं ही भली प्रकार समझता है। अतः राज्य को व्यक्ति के आर्थिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
3. ऐतिहासिक तर्क – व्यक्तिवादी अपने मत के समर्थन में ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उनका कहना है कि व्यक्ति के आर्थिक तथा सामाजिक जीवन में राज्य का हस्तक्षेप सदैव हानिकारक रहा है। राज्य ने मूल्य पर नियन्त्रण किया तो चोर-बाजारी बढ़ी, उत्पादन अपने हाथ में लिया तो भ्रष्टाचार बढ़ा और धार्मिक जीवन में हस्तक्षेप से क्रान्तियाँ हुईं। अतः राज्य को हस्तक्षेप न करने की नीति का ही पालन करना चाहिए।
4. प्राणिवैज्ञानिक तर्क – स्पेन्सर ने व्यक्तिवाद के समर्थन में नया तर्क प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, यह प्राकृतिक नियम है कि सभी प्राणी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हैं। उस संघर्ष में योग्य तथा सबल प्राणी ही जीवित रहते हैं तथा शेष नष्ट हो जाते हैं। अयोग्य और निर्बल व्यक्तियों के नष्ट होने से एक उन्नत और शक्तिशाली राज्य का निर्माण सम्भव होता है। स्पेन्सर ने यहाँ तक कहा कि राज्य को निर्धन, अपाहिज व अनाथों की रक्षा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह जैविक नियमों के विरुद्ध है। राज्य को अपनी ऊर्जा योग्य व्यक्तियों के विकास के लिए लगानी चाहिए, क्योंकि वे ही समाज में रन के रूप में होते हैं।”
5. व्यावहारिक तर्क – व्यक्तिवादी विचारधारा के समर्थकों का कहना है कि व्यावहारिक दृष्टि से : राज्य में सभी कार्यों को सम्पन्न करने की योग्यता नहीं होती, क्योंकि राज्य के कर्मचारी लगन और प्रतिबद्धता से कार्य नहीं करते और मन्त्री प्रायः अनुभवशून्य होते हैं। इसके अतिरिक्त अनेक समस्याएँ स्थानीय प्रकृति की होती हैं तथा कुछ ऐसे कार्य होते हैं जिन्हें देरी किये बिना सम्पन्न करना आवश्यक होता है। इन्हें व्यक्तिगत स्तर पर जितनी जल्दी निपटाया जा सकता है, सरकारी स्तर पर उतना शीघ्र नहीं।

व्यक्तिवादी सिद्धान्त की आलोचना (दोष)
व्यक्तिवादी सिद्धान्त की आलोचना निम्नलिखित आधारों पर की जाती है-
1. व्यक्ति और समाज की गलत कल्पना – वास्तविकता यह है कि “मनुष्य स्वभाव से ही एक सामाजिक प्राणी है। समाज से उसका अटूट सम्बन्ध है। समाज तथा राज्य के बिना मनुष्य अपना विकास नहीं कर सकता। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि व्यक्तिवादी विचारधारा गलत धारणा पर आधारित है।
2. स्वतन्त्रता का भ्रामक अर्थ – वस्तुतः राज्य अपने कानूनों द्वारा स्वतन्त्रता का अपहरण नहीं करता, अपितु उसकी रक्षा करता है। अतः यह कहा जा सकता है कि व्यक्तिवादियों की स्वतन्त्रता विषयक धारणा गलत मान्यताओं पर टिकी है।
3. राज्य को अनिवार्य बुराई कहना गलत – अरस्तू ने लिखा है कि राज्य की उत्पत्ति मनुष्य की रक्षा के लिए हुई है और श्रेष्ठ जीवन की प्राप्ति के लिए ही वह स्थिर है। अतः राज्य एक आवश्यक बुराई नहीं, अपितु एक सकारात्मक अच्छाई है।
4. राज्य मानव की उन्नति में बाधक नहीं – राज्य मनुष्यों की सर्वांगीण उन्नति के लिए। समुचित अवसर तथा सुविधाएँ प्रदान करता है। मानव-समाज ने राज्य की छत्रछाया में ही पर्याप्त आर्थिक व वैज्ञानिक उन्नति की है। इसलिए राज्य मानव-उन्नति में बाधक नहीं है। अरस्तु के अनुसार, “राज्य समस्त विज्ञानों, समस्त कलाओं, समस्त गुणों तथा समस्त पूर्णता में सहायक है।”
5. राज्य को हस्तक्षेप आवश्यक – राज्य के अभाव में प्रत्येक व्यक्ति अपने हित व स्वार्थ की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील होगा। उसका ऐसा प्रयत्न दूसरे व्यक्ति के ऐसे ही प्रयत्नों में बाधक हो सकता है जो परस्पर संघर्ष को जन्म देगा। इसलिए व्यक्तिवादियों का यह मत गलत है कि राज्य का हस्तक्षेप अनावश्यक है।
6. लोकतन्त्रीय युग में व्यक्तिवाद अनावश्यक – व्यक्तिवाद का जन्म निरंकुश राज्यों की प्रतिक्रिया-स्वरूप हुआ था। वर्तमान युग में लोकतन्त्र के उदय तथा लोक-कल्याणकारी राज्य की धारणा के उद्भव से ऐसी परिस्थिति नहीं है; अतः आज यह सिद्धान्त अमान्य है।
7. व्यक्तिवादी तर्क अमानवीय – लीकॉक ने कहा है कि “यदि शक्ति को ही जीवित रहने की कसौटी मान लिया जाए तो एक समृद्ध और सबल चोर समाज में प्रशंसा का पात्र होगा और एक भूखा कलाकार घृणा का।” इस प्रकार शारीरिक शक्ति बौद्धिक बल पर हावी हो जाएगी, जिसे जंगल-राज कह सकते हैं; अतः व्यक्तिवादी सिद्धान्त अमानवीय है।
निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि यद्यपि व्यक्तिवादी सिद्धान्त वर्तमान समय में प्रभावहीन हो गया है, तथापि इस सिद्धान्त का महत्त्व इस दृष्टिकोण से आवश्यक है कि राज्य की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखना चाहिए। वस्तुतः व्यक्तिवाद व्यक्ति की गरिमा एवं स्वतन्त्रता पर बल देती है। गार्नर के शब्दों में, “व्यक्तिवादियों ने व्यक्ति के महत्त्व को विश्व के समक्ष रखा है।”

व्यक्तिवाद और समाजवाद में अन्तर
1. विचारधारा – व्यक्तिवादी सिद्धान्त के समर्थक व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर बल देते हैं। उनके अनुसार, राज्य के कार्य तथा कानून व्यक्ति की स्वतन्त्रता को प्रतिबन्धित करते हैं; अत: राज्य के कार्यों की संख्या न्यूनतम होनी चाहिए। वे राज्य को एक आवश्यक बुराई मानते हैं। । दूसरी ओर समाजवादी विचारधारा के अनुसार राज्य के द्वारा वे सभी कार्य किये जाने चाहिए जो व्यक्ति और समाज की उन्नति के लिए आवश्यक हों। इस विचारधारा के अनुसार राज्य के कार्यों की कोई सीमा नहीं है तथा सामाजिक जीवन के प्रायः सभी कार्य राज्य के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत आ जाते हैं।
2. कार्यक्षेत्र – व्यक्तिवादी चाहते हैं कि राज्य के कार्यक्षेत्र को अधिक-से-अधिक सीमित कर दिया जाए। स्पेन्सर के मतानुसार, “व्यक्ति का स्थान समाज तथा राज्य के ऊपर होना चाहिए। और राज्य को केवल वही कार्य करने चाहिए जिन्हें व्यक्ति नहीं कर सकता।” उनके अनुसार राज्य के केवल तीन निम्नलिखित कार्य होने चाहिए-
⦁    आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था करना,
⦁    देश की बाहरी आक्रमणों से रक्षा करना तथा
⦁    न्याय और दण्ड की व्यवस्था करना।
दूसरी ओर समाजवादी समानता को अपना आदर्श मानकर चलते हैं और राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में अधिकाधिक स्थापित करने के लिए निम्नलिखित बातों पर विशेष बल देते हैं-
⦁    समाज की आंगिक एकता,
⦁    समाज में प्रतियोगिता के स्थान पर सहयोग,
⦁    पूँजीवाद का अन्त तथा
⦁    उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व।

उद्योगों के प्रति दृष्टिकोण
व्यक्तिवादी विचारधारा राज्य के कार्यों को न्यूनतम कर देना चाहती है तथा उद्योगों को व्यक्तियों के लिए पूर्ण रूप से खुला रखना चाहती है। वह उद्योगों की स्थापना, संचालन तथा विकासे में राज्य का हस्तक्षेप नहीं चाहती। वह खुली प्रतियोगिता में विश्वास रखती है तथा एक प्रकार से पूँजीवाद की समर्थक है।
दूसरी ओर समाजवादी विचारधारा पूँजीवाद की घोर विरोधी होने के कारण भूमि और उद्योगों पर व्यक्तिगत स्वामित्व के अन्त की माँग करती है। यह विचारधारा उत्पादन के समस्त साधनों पर सामाजिक स्वामित्व स्थापित करना चाहती है। समाजवादी विचारधारा के अनुसार वैयक्तिक उद्योग वैयक्तिक लूटमार है और व्यक्तिगत सम्पत्ति को सामाजिक अथवा सामूहिक सम्पत्ति का रूप देना ही उचित है।
अतः निष्कर्षतया कहा जा सकता है कि उद्योगों के निजीकरण की प्रवृत्ति समाजवादी विचारधारा के प्रतिकूल है।



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