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“रामजी कदाचित् मुझे इसलिए दर्शन नहीं दे रहे हैं कि मैं रत्नावली से निठुराई बरत रहा हूँ।” पंक्ति में निहित तुलसीदास के अन्तर्द्वन्द्व को स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» तुलसी के हृदय में अन्तर्द्वन्द्व था। उनका मन थाली के बैंगन की तरह कभी रत्नावली की ओर झुकता तो कभी राम की ओर मुड़ जाता । राजा से बात करने के बाद उन्होंने चादर तान ली। राम-राम जपना भी आरम्भ किया किन्तु रत्नावली उनके मन से नहीं हटी। वे सोचने लगे कि रत्नावली उनके पास आए अपना दुख-सुख उनसे कहे। कभी सोचते रत्नावली को अपने पास रख लूं इससे उसे सुख मिलेगा। रत्नावली से दूर रहने के लिए ही शायद राम दर्शन नहीं दे रहे हैं। उनका मन इसी उहापोह में रहता। कभी मन रत्नावली के मोह में फँस जाता, कभी राम की ओर मुड़ जाता । इसी अन्तर्द्वन्द्व के कारण वे रातभर सो न सके। मन की गति अस्थिर थी। |
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