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राष्ट्र को परिभाषित करना क्यों कठिन है? आधुनिक समाज में राष्ट्र और राज्य कैसे संबंधित हैं? |
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Answer» ⦁ राष्ट्र एक अनूठे किस्म का समुदाय होता है, जिसका वर्णन तो आसान है पर इसे परिभाषित करना कठिन है। ⦁ हम ऐसे अनेक विशिष्ट राष्ट्रों का वर्णन कर सकते हैं, जिनकी स्थापना साझे – धर्म, भाषा, नृजातीयता, इतिहास अथवा क्षेत्रीय संस्कृति जैसी साझी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक संस्थाओं | ⦁ किंतु किसी राष्ट्र के पारिभाषिक लक्षणों को निर्धारित करना कठिन है। ⦁ प्रत्येक संभव कसौटी के लिए अनेक अपवाद तथा विरोधी उदाहरण पाए जाते हैं। ⦁ उदाहरण के लिए, ऐसे बहुत से राष्ट्र हैं जिनकी एक समान भाषा, धर्म, नृजातीयता इत्यादि नहीं हैं। दूसरी तरफ ऐसी अनेक भाषाएँ, धर्म या नृजातियाँ हैं जो कई राष्ट्रों में पाई जाती हैं। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि यह सभी मिलकर एक एकीकृत राष्ट्र का निर्माण करते हैं। सरल शब्दों में कहें तो राष्ट्र समुदायों का समुदाय है। एक राजनीतिक समूहवाद के अंतर्गत किसी देश में नागरिक अपनी आवश्यकताओं का सहभाजन करते हैं। राष्ट्र ऐसे समुदायों से निर्मित होते हैं, जिनके अपने राज्य होते हैं। ⦁ आधुनिक काल में राष्ट्र तथा राज्य के बीच एकैक (एक-एक) का संबंध है। लेकिन यह एक नया विकास है। पूर्व में यह बात सत्य नहीं थी कि एक अकेला राज्य केवल एक ही राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर सकता है। तथा प्रत्येक राष्ट्र को अपना एक राज्य होना जरूरी है। ⦁ उदाहरण के तौर पर, सोवियत संघ ने यह स्पष्ट रूप से मान रखा था कि जिन लोगों पर उनका शासन था, वे विभिन्न राष्ट्रों के थे। ⦁ इसी प्रकार से, एक राष्ट्र का अस्तित्व प्रदान करने वाले लोग हो सकता है कि विभिन्न राज्यों के नागरिक या निवासी हों। उदाहरणार्थ, संपूर्ण जमैकावासियों में जमैका से बाहर रहने वालों की संख्या इसके भीतर रहने वालों की संख्या से अधिक ⦁ दोहरी नागरिकता’ की स्थिति भी संभव है। यह कानून किसी राज्य विशेष के नागरिक को एक ही समय में दूसरे राज्य का नागरिक बनने की अनुमति देता है। उदाहरणार्थ, यहूदी जाति के अमेरिकी लोग एक ही साथ इजराइल तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के नागरिक हो सकते हैं। ⦁ अतएव राष्ट्र एक ऐसा समुदाय है, जिसके पास अपना राज्य होता है। यह देखने में आया है कि राज्य यह दावा करना ज्यादा आवश्यक मान रहे हैं। कि वो एक राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। ⦁ आधुनिक युग का एक विशिष्ट लक्षण है राजनीतिक वैधता के प्रमुख स्रोतों के रूप में लोकतंत्र तथा राष्ट्रवाद की स्थापना। इसका तात्पर्य यह है कि आज एक राज्य के लिए राष्ट्र एक सर्वाधिक स्वीकृत अथवा औचित्यपूर्ण आवश्यकता है, जबकि लोग राष्ट्र की वैधता के अहं स्रोत हैं। |
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