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राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रथम चरण की विवेचना कीजिए।

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राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रथम चरण (1885-1919 ई०)- प्रारम्भ में कांग्रेस के आन्दोलन की गति बहुत धीमी थी। इसका मुख्य कारण कांग्रेस का शैशवकाल था। यह समय सुधारवादी तथा वैधानिक युग के नाम से भी विख्यात है। इस समय कांग्रेस पर उदारवादियों का प्रभाव रहा। इन उदारवादियों ने विनय-अनुनय की नीति अपनाई, परन्तु उनकी इस नीति ने 19वीं शताब्दी के अन्तिम एवं 20 वीं शताब्दी के प्रारम्भिक चरणों में अतिवादी विचारधारा को जन्म दिया। 1885-1905 ई० के दौरान कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य संवैधानिक, आर्थिक, प्रशासनिक सुधार एवं नागरिक अधिकारों की सुरक्षा की माँग करना था। इस समय तक कांग्रेस को जनसमर्थन भी प्राप्त नहीं हो सका था। मुख्य रूप से शिक्षित मध्य वर्ग तक ही इसका प्रभाव रहा। प्रारम्भ में कांग्रेस ने उदारवादी रुख अपनाया।

उदारवादी आन्दोलन का युग- प्रारम्भिक बीस वर्षों में कांग्रेस आम जनता के कष्ट निवारण हेतु ब्रिटिश सरकार को प्रार्थना पत्र ही भेजती रही। इस चरण के प्रमुख कांग्रेसी नेता गोपालकृष्ण गोखले, पंडित मदन मोहन मालवीय, दादाभाई नौरोजी आदि थे। ये सभी नेता शान्तिपूर्वक अंग्रेजी सरकार से अपनी माँगें मनवाने के पक्ष में थे परन्तु इनकी उदारवादी प्रवृत्ति का कांग्रेस को कोई लाभ नहीं हुआ क्योंकि स्वार्थी व कुटिल अंग्रेजों पर प्रार्थना-पत्र व याचना-पत्र कोई प्रभाव नहीं डाल पाए और न ही उदारवादी नेता अंग्रेजों पर किसी भी प्रकार का दबाव बनाने में सफल हो पाए।
1885-1905 ई० के काल को उदारवादियों का काल अथवा उदार राष्ट्रवाद का काल भी कहा जाता है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस प्रारम्भ में अत्यन्त नरम थी। आरम्भ से ही कांग्रेस का दृष्टिकोण विशुद्ध राष्ट्रीय रहा। इसने किसी वर्ग विशेष के हित का समर्थन नहीं किया वरन् सभी प्रश्नों पर राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाया। प्रारम्भिक दौर में कांग्रेस की पूरी बागडोर नरम राष्ट्रवादियों के हाथ में थी। इस समय भारतीय राजनीति में ऐसे व्यक्तियों का प्रभाव था, जो उन अंग्रेजों के प्रति श्रद्धा रखते थे, जिनका उदारवादी विचारधारा में विश्वास था। दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, फीरोजशाह मेहता, रासबिहारी घोष, गोपालकृष्ण गोखले इत्यादि नेता नरमपंथी विचारों के प्रमुख स्तम्भ थे।

कुछ अंग्रेज भी उदारवादी विचारधारा के समर्थक थे, जिनमें छूम, विलियम वेडरवर्न, जॉर्ज यूल, स्मिथ प्रमुख थे। इन्हीं उदारवादी नेताओं ने कांग्रेस का दो दशकों (1885-1905 ई०) तक मार्गदर्शन किया। ये उदारवादी भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को अभिशाप नहीं वरन् वरदान समझते थे। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का यह कथन उदारवादियों की मनोवृत्ति को स्पष्ट करता है, “अंग्रेजों के न्याय, बुद्धि और दयाभाव में हमारी दृढ़ आस्था है। विश्व की महानतम प्रतिनिधि संस्था, संसदों की जननी ब्रिटिश कॉमन सदन के प्रति हमारे हृदय में असीम श्रद्धा है।” कांग्रेस की प्रसिद्धी बढ़ती गई। उसकी लोकप्रियता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1885 ई० में इसके 72 सदस्य थे, जो 1890 ई० में 2,000 तक पहुंच गए।

कांग्रेस के उदारवादी नेताओं की यह धारणा थी कि अंग्रेज सच्चे और न्यायप्रिय हैं। कांग्रेस के आरम्भिक नेताओं का मानना था कि ब्रिटिश सरकार के समक्ष सार्वजनिक मुद्दों से सम्बन्धित माँगों को रखकर देश के प्रबुद्ध देशवासियों, नेताओं व कार्यकर्ताओं के मध्य राष्ट्रीय एकता की भावना जाग्रत की जा सकती है। कांग्रेस के 12वें अधिवेशन पर मुहम्मद रहीमतुल्ला ने कहा था कि, संसार में सूर्य के नीचे शायद ही कोई इतनी ईमानदार जाति हो, जितना की अंग्रेज।”

कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में संवैधानिक सुधारों की माँग की गई, जिसमें 1885 ई० के अधिनियम द्वारा निर्मित भारत सचिव व इण्डियन कौंसिल को समाप्त करने को कहा गया, क्योंकि उसमें कोई भी भारतीय प्रतिनिधि नहीं था। प्रान्तों में भी विधान परिषदों के पुनर्गठन की माँग रखी गई। इन माँगों के फलस्वरूप 1892 ई० का इण्डियन कौंसिल ऐक्ट पास हुआ, जिसके अनुसार केन्द्रीय एवं प्रान्तीय विधायिकाओं की सदस्य संख्या में वृद्धि की गई।

इस समय कांग्रेस ने देश की स्वतन्त्रता की माँग नहीं की, केवल भारतीयों के लिए रियायतें ही माँगी। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में बाल गंगाधर तिलक ने स्वराज्य शब्द का प्रयोग किया। किन्तु न तो यह शब्द लोकप्रिय हुआ और न ही इसका कांग्रेस के प्रस्तावों में उल्लेख था। न्यायपालिका के क्षेत्र में कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार के समक्ष माँग रखी कि शासन और न्याय कार्यों को अलग रखा जाए। अपने चौथे अधिवेशन में कांग्रेस ने माँग रखी कि भूमि कर को स्थायी, कम व निश्चित किया जाए और किसानों को शोषण से बचाने के लिए कानूनों में सुधार किए जाएँ। नागरिकों के सम्बन्ध में राजद्रोह सम्बन्धी कानून को वापस लिए जाने की माँग की। भारतीय सेना का देश से बाहर प्रयोग न किया जाए तथा सैनिक सेवा में भारतीयों को उच्च स्थान दिए जाएँ। कांग्रेस ने प्रशासन सुधार, प्रेस की स्वतन्त्रता आदि माँगों को भी सरकार के सम्मुख रखा। हालाँकि उदारवादियों का दृष्टिकोण देशहित में था परन्तु वे सरकार के समक्ष अपनी माँगें याचनापूर्वक व हीन शब्दों में रखते थे। जबकि सरकार का रुख प्रतिरोधात्मक था। अत: उनकी माँगों की उपेक्षा की गई। अन्ततः सरकार कांग्रेस को नापसन्द करने लगी।।



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