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राष्ट्रीय आन्दोलन में अतिवादियों के उदय की समीक्षा कीजिए।

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अतिवादियों अथवा गरम दल का उदय (1905-1919 ई०)- उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक कांग्रेस की नरमपंथी नीतियों के विरुद्ध असन्तोष बढ़ता जा रहा था। कांग्रेस के पुराने नेताओं और उनकी भिक्षा-याचना की नीति के फलस्वरूप कांग्रेस में एक नए तरुण दल का उदय हुआ, जो पुराने नेताओं के ढोंग एवं आदर्शों का कड़ा आलोचक बन गया। फलत: कांग्रेस दो गुटों में बँटने लगी- नरमपंथी और गरमपंथी। नरमपंथी नेताओं ने देश में राजनीतिक ढाँचे का तो निर्माण कर लिया था, परन्तु उसे वैचारिक स्थायित्व न मिला। वे अपनी विद्वता, देशभक्ति और समर्पण भावना में किसी से पीछे न थे, परन्तु उन्हें न तो अंग्रेजों की ईमानदारी और न्यायप्रियता पर सन्देह था और न ही उनका अपना कोई जनाधार। उन्होंने अपने भाषणों, विचारों और लेखों द्वारा शिक्षित समाज को राजनीतिक शिक्षा के सिद्धान्तों से परिचित कराया था, परन्तु अब आवश्यकता उसके व्यावहारिक प्रयोग की थी।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को स्थापित हुए 20 वर्ष हो चुके थे, परन्तु उसके फायदे समाज के सम्मुख दृष्टिगोचर नहीं हो रहे थे। नरमपंथियों का सम्पर्क मुख्यत: कुछ पढ़े-लिखे प्रबुद्ध लोगों तक ही सीमित था। उनकी पहुँच सामान्य जनता, कृषक, मजदूर, मध्यम वर्ग तक न थी। भारतीय जनमानस के बढ़ते हुए असन्तोष, सरकार की अकर्मण्यता और कांग्रेस की उदासीनता की अभिव्यक्ति राष्ट्रीय चेतना के रूप में हुई। इसके उन्नायक लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय और विपिनचन्द्र पाल थे। उन्होंने भारतीय जनमानस में आत्मसम्मान, आत्मविश्वास, देशभक्ति और साहस की भावना का संचार किया। अतिवादियों ने अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए निम्नलिखित तरीके अपनाए

⦁    निष्क्रिय विरोध अर्थात् सरकारी सेवाओं, न्यायालयों, स्कूलों तथा कॉलेजों का बहिष्कार कर ब्रिटिश सरकार का विरोध।
⦁    स्वदेशी को बढ़ावा तथा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार।
⦁    राष्ट्रीय शिक्षा के द्वारा नए राष्ट्र का निर्माण।

राष्ट्रवादियों के अतिवादी विचार 1857 ई० के विद्रोह के बाद धीरे- धीरे बढ़ रहे थे। बदलती हुई परिस्थितियों में सरकार के द्वारा दमन किए जाने के बावजूद अतिवादी विचार तेजी से बढ़े। शताब्दी के अन्त तक असन्तोष की लहर ग्रामीण समाज, किसानों तथा मजदूरों तक फैल गई। इन परिस्थितियों ने कई नेताओं को अपनी माँगों और कार्यवाही को लेकर वाकपटु बना दिया। ये नेता अतिसुधारवादी या अतिवादी के नाम से जाने गए।
क्रान्तिकारी राष्ट्रीयता के बढ़ने के अनेक कारण थे। राजनीतिक रूप से जागरूक लोगों का नरमपंथी नेतृत्व के सिद्धान्तों तथा उनके कार्य के तरीकों से मोहभंग हो चुका था। 1892 ई० के भारतीय कौंसिल अधिनियम से लोगों को बहुत निराशा हुई तथा प्लेग और अकाल जैसी आपदाओं में ब्रिटिश सरकार द्वारा ठीक से प्रबंधन न किए जाने पर उनके प्रति कड़वाहट बढ़ती गई। दमनकारी ब्रिटिश नीतियों; जैसे-1898 ई० के राजद्रोह के विरुद्ध कानून और 1899 ई० के राजकीय गोपनीयता अधिनियम ने आग में घी का काम किया। इसके अन्य कारणों में आयरलैण्ड और रूस का क्रान्तिकारी आन्दोलन जैसी अन्तर्राष्ट्रीय घटनाएँ, निवेशों में भारतीयों का अपमान, अरविन्द घोष, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और विपिनचन्द्र पाल जैसे नेताओं के नेतृत्व में एक क्रान्तिकारी राष्ट्रवादी विचारों की शाखा का अस्तित्व में आना, शिक्षा प्रसार के बावजूद बेरोजगारी का बढ़ना आदि थे। अन्तत: लॉर्ड कर्जन की नीतियों के कारण हुए 1905 ई० के बंगाल विभाजन से जन-विरोध भड़क उठा।



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