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Answer» राष्ट्रीयता के गुण किसी भी राष्ट्र के विकास में राष्ट्रीयता एक वरदान का कार्य करती है। इस भावना के फलस्वरूप अनेक नये राष्ट्रों का निर्माण हुआ है। राष्ट्रीयता को यदि इसके सही अर्थों में अपनाया जाये तो यह अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और विश्व शान्ति की स्थापना में सहायक सिद्ध हो सकती है। राष्ट्रीयता के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं- ⦁ राजनीतिक एकता की शिक्षक – राष्ट्रीयता की भावना के कारण भी लोग मिलकर रहना सीखते हैं। ⦁ देश-प्रेम का आधार – राष्ट्रीयता और देशभक्ति पर्यायवाची शब्द हैं। राष्ट्रीयता व्यक्तियों को अपने देश के प्रति प्रेम करना सिखाती है। जब व्यक्ति अपने देश से प्रेम करने लगते हैं तो वे देश की उन्नति करने का प्रयत्न भी करते हैं। ⦁ राष्ट्र की स्वतन्त्रता के लिए प्रेरक – राष्ट्रीयता की भावना से लोग आपसी भेदभाव को भूलकर देश को आजाद कराने के लिए संघर्ष और आन्दोलन करते हैं। ⦁ संस्कृति के विकास में सहायक – राष्ट्रीयता की भावना भाषा, साहित्य, विज्ञान, कला तथा संस्कृति के विकास में बहुत सहायता प्रदान करती है। ⦁ आर्थिक विकास में योगदान – राष्ट्रीयता ने राष्ट्र के विकास में बहुत योगदान दिया है। देश के विकास के लिए नागरिक, व्यापारी अच्छी वस्तुओं का उत्पादन करते हैं, जिससे उद्योग धन्धे और व्यापारों की उन्नति होती है और देश का आर्थिक विकास होता है। ⦁ चरित्र-निर्माण में सहायक – राष्ट्रीयता व्यक्तियों के चरित्र-निर्माण में सहायक होती है। राष्ट्रीयता मनुष्य को अपने स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्र के लिए त्याग करना सिखाती है। राष्ट्रीयता व्यक्तियों में अनुशासन, कर्तव्यपरायणता, सहयोग, सहानुभूति, सहायता इत्यादि नागरिक गुणों की शिक्षा देती है। ⦁ उदारवाद का परिचायक – राष्ट्रवाद का आत्म-निर्णय के अधिकार से सम्बद्ध होना ही स्वतन्त्रता के विचार का परिचायक है। व्यक्ति व राज्य में प्रजातन्त्रीय विचार संचारित होते हैं। जो साम्राज्यवादी विचारों का विरोध करते हैं। ⦁ विभिन्नताओं की रक्षा – राष्ट्रवाद संकीर्णताओं को लाँघकर मानव को एक बनाता है। विभिन्न जाति, धर्म, वर्ग व वर्ण के लोगों को एकता के सूत्र में बाँधता है। ⦁ विश्व-शान्ति की संस्थापक – राष्ट्रीयता अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और विश्व-शान्ति की स्थापना में सहायक होती है। यह विश्व-बन्धुत्व की भावना में वृद्धि करती है। राष्ट्रीयता के दोष-राष्ट्रीयता एक अभिशाप उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि राष्ट्रीयता मानव समुदाय के लिए एक वरदान है, किन्तु जब यह भावना बहुत संकुचित अथवा उग्र रूप धारण कर लेती है तो यह विध्वंसक हो जाती है तथा एक अभिशाप बन जाती है। पं० जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है कि राष्ट्रीयता एक ऐसा विचित्र तत्त्व है जो एक देश के इतिहास में जीवन, विकास, शक्ति और एकता का संचार करता है, वह संकुचित भी बनाता है; क्योंकि इसके कारण एक व्यक्ति अपने देश के बारे में विश्व के अन्य देशों से पृथक् रूप से सोचता है।” राष्ट्रीयता के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं- 1. विश्व-शान्ति के लिए घातक – उग्र-राष्ट्रीयता मानवता और विश्व-शान्ति के लिए घातक है। उग्र-राष्ट्रीयता की भावना के कारण ही एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र से घृणा करता है। 2. अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में बाधक – उग्र-राष्ट्रीयता के कारण विभिन्न राष्ट्रों के बीच अच्छे तथा मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित नहीं हो पाते हैं। राष्ट्रों के आपसी सम्बन्धों में कटुता पैदा हो जाती है। अत: उग्र-राष्ट्रीयता अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग में बाधक है। 3. साम्राज्यवाद की जनक – उग्र-राष्ट्रीयता साम्राज्यवाद की जड़ है। उग्र-राष्ट्रीयता की भावना से ही विश्व में साम्राज्यवाद का उदय हुआ। 4. विकास कार्यों में बाधक – उग्र-राष्ट्रीयता के कारण राष्ट्र का विकास भी रुक जाता है। उग्र राष्ट्रीयता के कारण राष्ट्रों के पारस्परिक सम्बन्ध बिगड़ जाते हैं जिसके कारण उन्हें अपनी रक्षा के लिए बड़ी-बड़ी सेनाओं को रखना पड़ता है तथा रक्षा और सेना पर बहुत व्यय करना पड़ता है। फलस्वरूप राष्ट्र के विकास की योजनाओं पर अपेक्षित व्यय नहीं हो पाता। 5. युद्धों को बढ़ावा – उग्र-राष्ट्रीयता ही युद्ध को जन्म देती है। संकीर्ण राष्ट्रीयता सैन्यवाद की ओर प्रवृत्त करती है जिसका अन्तिम परिणाम युद्ध होता है। युद्धों में अपार धन और जन की हानि होती है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों का एक प्रमुख कारण उग्र-राष्ट्रीयता की भावना ही थी। हेज ने लिखा है, “वर्तमान शताब्दी के अधिकांश युद्धों को कारण राष्ट्रवाद है। इसने विगत सौ वर्षों में जितना रक्तपात कराया है, उतना मध्ययुग के कई सौ वर्षों में धर्म या किसी अन्य तत्त्व ने नहीं कराया।”
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