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रवि एक बंकर है वह अर्थव्यवस्था के किस क्षेत्र से संबंधित है।​

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सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स में कटौती करते हुए कॉरपोरेट सेक्टर को एक बड़ी मदद देने की कोशिश की. लेकिन, इसका भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव होता नहीं दिख रहा है.

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वित्त वर्ष - की दूसरी तिमाही के जीडीपी आंकड़े सामने आ चुके हैं. जीडीपी की वृद्धि दर पिछली तिमाही की तुलना में फीसदी से घटकर . फीसदी रह गई है. जीवीए (ग्रॉस वैल्यू ऐडेड) घटकर . फीसदी हो चुका है.

यह स्थिति किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए खतरे के संकेत के रूप में होती है. वर्ष - के बाद किसी भी तिमाही में यह सबसे बड़ी गिरावट है. पिछले सालों यानी बीती तिमाहियों में भारतीय अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी गिरावट के दौर से गुजर रही है.

मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की वृद्धि दर घटकर फीसदी, कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर घटकर . फीसदी, कंस्ट्रक्शन सेक्टर जो पहले . फीसदी की वृद्धि से बढ़ रहा था अब उसकी वृद्धि दर कम होकर . फीसदी पर आ चुकी है.

बेरोजगारी दर अक्टूबर में . फीसदी पहुंच चुकी थी. भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में एनपीए एक गंभीर समस्या के रूप में बना हुआ है. यह अभी भी लाख करोड़ रुपये से अधिक है. बैंकिंग व्यवस्था को बैंकिंग फ्रॉड ने भी बड़े स्तर पर प्रभावित किया है.

वित्त मंत्री ने सदन में जानकारी दी है कि वर्ष में अप्रैल से लेकर सितंबर तक कुल , करोड़ रुपये बैंकिंग फ्रॉड की वजह से बर्बाद हुए हैं. मोदी सरकार के पिछले वर्षों में कुल ,, करोड़ रुपये बैंकिंग फ्रॉड में बर्बाद हो चुके हैं. ये सभी आंकड़े अर्थव्यवस्था की भयावह कहानी को दिखाते हैं. भारतीय अर्थव्यवस्था आर्थिक मंदी के दुष्चक्र में फंसती जा रही है.

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ऐसा नहीं है कि सरकार और देश के केंद्रीय बैंक ने अर्थव्यवस्था में गंभीर होती स्थिति को सुधारने के लिए कदम नहीं उठाएं हैं. लेकिन, किसी भी कदम से आर्थिक सुस्ती रुकने के बजाय और बढ़ती चली गई .

कोशिशों का नहीं दिख रहा असर

इस साल अब तक केंद्रीय बैंक नीतिगत दरों में कुल . फीसदी की कटौती कर चुका है. वर्ष के बाद सबसे ज्यादा कटौती की गई है. लेकिन, बावजूद इसके बाजार में न तो कर्ज की मांग बढ़ रही है और न ही कर्ज की ब्याज दरों में कटौती के अनुसार कमी आ रही है.

सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स में कटौती करते हुए कॉरपोरेट सेक्टर को एक बड़ी मदद देने की कोशिश की. लेकिन, इसका भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव होता नहीं दिख रहा है. वित्त मंत्री और सरकार को समझना चाहिए कि निजी क्षेत्र तभी निवेश करते हैं जब अर्थव्यवस्था में मांग और खपत होती है. यह तर्क एक अर्थशास्त्र का सामान्य छात्र भी दे सकता है.

कॉरपोरेट टैक्स में कटौती से निवेश तो नहीं बढ़ने वाला है. लेकिन, सरकार को एक बड़ी चपत कर संग्रह के रूप में जरूर लगने वाली है. सरकार ने बैंकों के विलय के रूप में भी एक महत्वपूर्ण कदम उठाया. पर, यह समय ठीक नहीं था.

बैंकों का विलय तभी किया जाना चाहिए था जब भारतीय अर्थव्यवस्था सात से आठ फीसदी की दर से बढ़ रही थी. सरकार अब कर संग्रह के लक्ष्य को पूरा करने के लिए सरकारी कंपनियों का निजीकरण कर रही है.

इधर, राजकोषीय घाटा पूरे वर्ष के निर्धारित लक्ष्य को महज महीने में ही पूरा कर चुका है. सरकार ने अनुमान लगाया था कि पूरे वित्तीय वर्ष में . लाख करोड़ रुपये का राजकोषीय घाटा रहेगा. पर, महज महीने में ही यह घाटा निर्धारित अनुमान को पूरा कर चुका है. सरकार के सामने अब राजकोषीय नीति की भी चुनौती बढ़ती जा रही है. यह अपने आप में चुनौतीपूर्ण स्थिति है.

क्‍या है समस्‍या की जड़?

इस पूरी आर्थिक सुस्ती की बुनियाद नोटबंदी और जीएसटी ने तैयार की है. ऐसा इसलिए क्योंकि नोटबंदी ने असंगठित क्षेत्र यानी मजदूर और किसानों वाले क्षेत्र को बड़े स्तर पर प्रभावित किया.

उपभोग आधारित भारतीय अर्थव्यवस्था नोटबंदी के सदमे को झेल नहीं सकी और अब उसके परिणाम निकल कर सामने आ रहे हैं. मनमोहन सिंह उस वक्त सदन में यही कह रहे थे कि नोटबंदी से भारतीय अर्थव्यवस्था जीडीपी दर में फीसदी से अधिक की भी गिरावट देखेगी. सच्चाई सामने है.

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जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विस टैक्स. मोदी सरकार का एक और नीतिगत सुधार जिसकी खूब चर्चा की गई. लेकिन, जीएसटी के परिणाम क्या हैं, इस पर चर्चा करना ज्यादा जरूरी हो जाता है.



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