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साझेदारी संस्था का अर्थ व लक्षण की सूची बनाइए । |
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Answer» साझेदारी संस्था का अर्थ : साधारण शब्दों में साझेदारी दो या दो से अधिक व्यक्तियों का एक समूह है, जो व्यापार द्वारा लाभार्जन करने के उद्देश्य से बनता है । दूसरे शब्दों में दो या अधिक व्यक्ति पारस्परिक लाभ के उद्देश्य से मिलकर जब वैध व्यापार करने के लिए सहमत होते हैं तब इसे साझेदारी कहा जाता है । साझेदारी संस्था की परिभाषाएँ (Definition of Partnership Firm) : डॉ. ज्योन शुबिन : “दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी व्यापार को चलाने का संयुक्त दायित्व अपने ऊपर लेकर लिखित या मौखिक करार करके साझेदारी की स्थापना कर सकते हैं ।” श्री ल्युइस हेन्री : “करार करने में सक्षम हो तथा लाभ के उद्देश्य से संयुक्त रूप से किसी प्रकार का धन्धा करने के लिए सहमत हुए हों ऐसे मनुष्यों के बीच का सम्बन्ध अर्थात् साझेदारी संस्था ।” किम्बाल तथा किम्बाल के मतानुसार : “साझेदारी जैसा कि प्रायः कहा जाता है कि उन व्यक्तियों का समूह है जिन्होंने किसी धन्धे को चलाने के लिए पूँजी तथा सेवाओं को संयुक्त रूप से लगाया है ।” भारतीय साझेदारी अधिनियम 1932 के अनुसार : “साझेदारी यह ऐसे व्यक्तियों के मध्य का सम्बन्ध है, जो कि सभी द्वारा या सभी , की ओर से किसी एक द्वारा चलाए जानेवाले धन्धे का लाभ विभाजन हेतु सहमत हुए हो ।” साझेदारी संस्था के लक्षण (Characteristics of Partnership Firm) : (1) करार-जन्य सम्बन्ध : साझेदारी संस्था साझेदारी के बीच लिखित या मौखिक करार के आधार पर अस्तित्व में आती हैं । परस्पर एक-दूसरे के प्रति व्यवहार-बर्ताव तथा समझ द्वारा साझेदारी अस्तित्व में आती है । (2) लाभ का उद्देश्य एवं लाभ का वितरण : साझेदारी संस्था का उद्देश्य धन्धा करना एवं लाभ प्राप्त कर उसका वितरण करना होता है । इसके अलावा दूसरे किसी उद्देश्य के लिए एकत्रित हुए हों तो उसे साझेदारी नहीं कहा जायेगा । जैसे – दो या अधिक व्यक्ति धार्मिक या सेवा के उद्देश्य के लिये मंदिर, क्लब, जीमखाना या लायब्रेरी प्रारंभ करें तो साझेदारी नहीं कहलायेगी । (3) धंधा होना अनिवार्य : साझेदारी में कोई भी उद्योग, व्यापार, वाणिज्य, धन्धा, साहस या प्रत्यक्ष सेवा के द्वारा चलाया जा सकता है । अगर साझेदारी किसी धंधे के लिये न चलाई जाये तो उसे साझेदारी नहीं कहेंगे । (4) साझेदारों की संख्या पर नियंत्रण : साझेदारी में कम से कम दो और अधिक से अधिक बीस व्यक्तियों की संख्या होनी चाहिए । अगर शराफी कार्य करनेवाली बैंकिंग पेढ़ी हो तो अधिक से अधिक दस साझेदार हो सकते हैं । इस प्रकार एक व्यक्ति से साझेदारी प्रारंभ नहीं हो सकती । अगर साझेदारों की संख्या शराफी सेवा में 10 से बढ़ जाये तो वह साझेदारी कानून की दृष्टि से गैरकानूनी घोषित होती है । (5) सभी साझेदार या सभी की तरफ से किसी एक साझेदार के द्वारा संचालन : इसका अर्थ यह हुआ कि प्रत्येक साझेदार दूसरे साझेदार का एजेन्ट और अभिकर्ता (Agent) है । पेढ़ी की तरफ से कार्य करने का उन्हें गर्भित अधिकार है । इस तरह धन्धा चलानेवाले साझेदार जो कार्य करें या जो जिम्मेदारी उठाएँ वह सर्व साझेदारों को बंधनकर्ता है । (6) साझेदारों की जिम्मेदारी अमर्यादित : व्यक्तिगत मालिकी के साहस की तरह सभी साझेदारों की जिम्मेदारी अमर्यादित है । अगर पेढ़ी का ऋण उसकी संपत्ति की अपेक्षा बढ़ जाये तो साझेदारों को उसकी निजी और व्यक्तिगत संपत्तियों का विक्रय कर पेढ़ी का ऋण चुकाना पड़ता है । भारतीय कानून के अनुसार पेढ़ी का ऋण चुकाने के लिये हरेक साझेदारों की जिम्मेदारी व्यक्तिगत तथा संयुक्त गिनी जाती है । (7) पूँजी : सामान्य रूप से प्रत्येक साझेदार पेढ़ी में निश्चित किये गये प्रमाण में साझेदार पूँजी लगाता है । हालांकि ऐसा बंधन नहीं है कि सभी साझेदार धंधे में पूँजी लगाएँ । कुछ निश्चित व्यक्ति साझेदार होने पर भी पूँजी न लगाएँ ऐसा भी हो सकता है । इसी तरह सभी साझेदार एकसमान पूँजी लगाएँ यह भी जरूरी नहीं है । प्रत्येक साझेदार कितनी पूँजी लगायेगा यह साझेदारी कानून में बताया गया होता है । (8) स्थापना-विधि : साझेदारी की स्थापना सरलता से हो सकती है । इसके लिये कानून की अटपटी विधि नहीं है । साझेदारी की स्थापना के लिये मात्र करार होना अनिवार्य है । यह करार लिखित, मौखिक या गर्भित भी हो सकता है । (9) मालिकी में परिवर्तन : साझेदारी में साझेदार को खुद के भाग का परिवर्तन करना हो तो सभी साझेदारों की संमति अनिवार्य । है । सभी की संमति के बिना साझेदारी के हिस्से का परिवर्तन नहीं हो सकता । (10) धंधे का आयुष्य : साझेदारी का आयुष्य व्यक्तिगत मालिकी की तरह छोटा है । साझेदारी को जोइन्ट स्टॉक कंपनी की तरह कानून के द्वारा अलग व्यक्तित्व नहीं दिया गया है । इससे किसी भी साझेदार की मृत्यु होने पर, दिवालिया होने पर या पागल होने पर साझेदारी का विसर्जन होता है । इसके बावजूद प्रत्येक साझेदार की संमति से किसी भी साझेदार का हिस्सा परिवर्तन किया जा सकता है । परिणामस्वरुप साझेदारी पेढ़ी लंबी आय रखती है। (11) मालिकी और संचालन में एकता : साझेदारी में व्यक्तिगत मालिकी की तरह ही मालिक और संचालक होते हैं । इस तरह साझेदारी में मालिकी और संचालन में एकता देखने को मिलती है । संचालन कार्यों का वितरण साझेदारों के बीच किया जाता है । प्रत्येक साझेदार को ज्ञान, अनुभव और कुशलता के आधार पर कार्य सौंपा जाता है । इस तरह, विविध व्यक्तियों के ज्ञान, अनुभव और कुशलता का महत्तम लाभ मिलता है । (12) कानूनी नियंत्रण : साझेदारी के नियंत्रण के लिये 1932 का भारतीय साझेदारी कानुन अमल में है । इस कानून में साझेदारों के अधिकार, फर्ज, सत्ता, पंजीकरण वगैरह दिया गया है । सभी साझेदार संयुक्त रूप से पेढ़ी के रूप में जाने जाते हैं, इसके बावजूद पेढ़ी को साझेदारों से अलग अस्तित्व प्राप्त नहीं होता । (13) निर्णय-शक्ति : साझेदारी में सामान्य बातों के बारे में निर्णय बहुमति से लिया जाता है । इसके बावजूद कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय जैसे धंधे में परिवर्तन करना, साझेदार को अलग करना वगैरह सभी साझेदार की संमति से लिया जाता है । |
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