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। 'सामाजिक संरचना' शब्द से आप क्या समझते हैं?​

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संरचना शब्द की व्युत्पत्ति सम् (उपसर्ग) + रच् (धातु) + मुच (प्रत्यय) = संरचना हुई है। रच् धातु का अभिप्राय प्रतियत्न  अर्थात गुणाधान पूर्वक प्रयत्न करने से हैं। इस प्रकार का अभिप्राय व्यवस्था तैयारी, विन्यास, निर्माण, सृजन निष्पत्ति आदि से हैं। हम यहां का अर्थ विशिष्ट पद्धति से किसी इकाई की निष्पत्ति से लेते हैं अर्थात गुणाधान पूर्वक परिष्कृत सृजन अर्थात निर्माण। जैसे जल को उबालने से उसमें से सभी अशुद्धियां बाहर हो जाती है, उसी प्रकार परिष्कृत निर्माण को संरचना कहा जाता है।

            मौरिन्स गिन्सबर्ग ने अपने लेख "द स्कोप एंड मेथड ऑफ़ सोशियोलॉजी" में लिखते हैं कि "समाज के संघटक प्रधान समूहो तथा संस्थाओं के जटिल संपूर्णता को सामाजिक संरचना कहा जाता है।" एस एफ नेडल ने "थ्योरी आफ स्ट्रक्चर" में लिखा है कि "हम मूर्त जनसंख्या उसके व्यवहार से एक दूसरे से संबंध भूमिका का निर्वाह करने वाले कर्ताओं के बीच संबंधों के विद्यमान सम्बन्धो के जाल या प्रतिरूप की धारणा बना कर समाज की संरचना तक पहुंच सकते हैं।" इसी प्रकार सी गर्थ व सी राइट मिल्स ने "करेक्टर एंड सोशल स्ट्रक्चर" में लिखा है भूमिका की अवधारणा संस्थाओं की हमारी परिभाषा के आधार पद हैं। भूमिका वह इकाई है जिसके आधार पर हम सामाजिक संरचना के विचार का निर्माण करते हैं।  

संक्षेप एंव सार रूप में सामाजिक संरचना को स्पष्ट किया जाए तो कहा जा सकता है कि यह किसी समूह के आंतिरक संगठन के स्थाई प्रतिमान अर्थात समूह के सदस्यों के बीच पाए जाने वाले सामाजिक संबंधों का संपूर्ण ताना-बाना होता है। इन संबंधों में सामाजिक क्रियाएं, भूमिकाएं,प्रस्थितियां, संचार व्यवस्था, श्रम विभाजन तथा आदर्शात्मक व्यवस्था को सम्मिलित किया जाता है। सामाजिक संरचना को स्वरूप के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। संरचना किसी व्यवस्था के स्थिर पक्ष को प्रतिबिंबित करती हैं।



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