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“शाहजहाँ का काल मुगल स्थापत्य का स्वर्ण-काल था।” विवेचना कीजिए।

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शाहजहाँ के शासनकाल में मुगल स्थापत्य कला अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई थी। उसका काल विद्वानों द्वारा मुगल स्थापत्य कला का ‘स्वर्ण-युग’ कहा जाता है। शाहजहाँ ने नवीन इमारतों के अलावा आगरा और लाहौर के किलो में अकबर द्वारा बनवाई गई कई इमारतों को तुड़वाकर नवीन इमारतें भी बनवाई। आगरा के किले में दीवाने आम, दीवाने खास, शीश महल, शाहबुर्ज, खासमहल, मच्छीभवन, झरोखा दर्शन का स्थान, अंगूरी बाग, नगीना मस्जिद और मोती मस्जिद उसके द्वारा बनवाई गई इमारतों में प्रमुख हैं। ये सभी इमारतें अत्यन्त सुन्दर हैं। हालाँकि शाहजहाँ के भवन दृढ़ता तथा मौलिकता में अकबर के भवनों की अपेक्षा निम्न कोटि के हैं परन्तु सौन्दर्य रमणीयता, अलंकरण व सादगी में उनका कोई सानी नहीं है।

1639 ई० में शाहजहाँ ने दिल्ली के पास शाहजहाँनाबाद नगर की नींव डाली। दिल्ली में यमुना नदी के दाएँ किनारे एक किला बनवाया, जो लाल किले के नाम से विख्यात है। इस किले के भीतर सफेद संगमरमर की सुन्दर इमारतें बनवाई गई हैं, जिनमें मोती महल, हीरा महल और रंग महल विशेष उल्लेखनीय हैं। दीवाने आम और दीवाने खास आदि सरकारी इमारतों के अतिरिक्त नौबतखाना, शाही निवास, नौकरों के निवास आदि भी बने हुए हैं। दीवाने खास में चमकीले संगमरमर के फर्श, उसकी दीवारों पर फूल-पत्तियों की सुन्दर नक्काशी और मेहराबों का सुनहला रंग इतना आकर्षक है कि वहाँ लिखा है- “अगर भूमि पर कहीं स्वर्ग है तो वह यहीं हैं, यहीं है, यहीं है।’ यहाँ पानी और फव्वारों का प्रबन्ध अत्यन्त भव्य है।
 
शाहजहाँकालीन मस्जिदों में दिल्ली की जामा मस्जिद देश की सबसे प्रसिद्ध मस्जिद है। एक दूसरी जामा मस्जिद शाहजहाँ की बड़ी पुत्री जहाँआरा ने आगरा में बनवाई। पर्सी ब्राउन ने आगरा की जामा मस्जिद को दिल्ली की जामा मस्जिद से स्थापत्य कला की दृष्टि से भव्य और सुन्दर बताया है। मोती मस्जिद जिसे शाहजहाँ ने आगरा के किले में बनवाया था, स्थापत्य कला की दृष्टि से एक उच्चकोटि की कृति है। दूध की तरह सफेद संगमरमर से बनी हुई यह मस्जिद अपने नाम ‘मोती की तरह ही है।

लेकिन जिस इमारत के लिए शाहजहाँ को आज भी याद किया जाता है, वह है ताजमहल, जो उसने अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में बनवाया, जिसे 22 वर्षों में लगभग चार करोड़ रुपए की रकम से बनाया गया था। जन्नत के बागों की तरह खूबसूरत चार बाग के बीचों-बीच स्थित इस संगमरमर की इमारत का ज्यामितीय ग्रिडों की श्रृंखला के अनुसार यथानुपात निर्माण किया गया था। चबूतरे के चारों कोनों पर चार सफेद मीनारें हैं और इसकी बगल में यमुना नदी बहती है। सुन्दर चित्रकारी से अलंकृत जालियाँ, बेल-बूटों से सजी हुई दीवारें तथा लम्बाई,
 
चौड़ाई और ऊँचाई की दृष्टि से इमारत को एक इकाई का रूप प्रदान करने वाली कला न केवल ताजमहल के सौन्दर्य को बढ़ाने वाली है अपितु ताजमहल एक सम्पूर्ण इकाई के रूप में संगमरमर में ढाला गया एक स्वपन है, जो एक महान् सौन्दर्य का प्रतीक माना जा सकता है। हावेल ने इसे ‘भारतीय नारीत्व की साकार प्रतिमा कहा है। ताजमहल के निर्माण की योजना के बारे में यह धारणा गलत सिद्ध कर दी गई है कि इसके नक्शे को बनाने में किसी यूरोपियन कलाकार ने सहयोग दिया था। यह प्रमाणित किया जा चुका है कि इसका मुख्य कलाकार उस्ताद अहमद लाहौरी था, जिसे शाहजहाँ ने ‘नादिर-उज-असर’ की उपाधि प्रदान की थी।

शाहजहाँ ने मयूर सिंहासन भी बनवाया था, जिसकी छत मयूर स्तम्भों पर आधारित थी। ये स्तम्भ हीरे, पन्ने, मोती तथा लाल रत्नों से बने हुए थे। इस सिंहासन के बनने में 14 लाख रुपए से अधिक व्यय हुआ था। 1739 ई० में नादिरशाह इस सिंहासन को लूटकर अपने साथ ईरान ले गया था।
लाहौर के किले में दीवाने आम, शाहबुर्ज, शीशमहल, नौलखा महल और ख्वाबगाह आदि शाहजहाँ के समय में बनाई गई मुख्य इमारतें हैं। इनके अतिरिक्त काबुल, कश्मीर, अजमेर, कन्धार, अहमदाबाद आदि विभिन्न स्थानों पर भी शाहजहाँ ने अनेक मस्जिदें, मकबरे आदि बनवाए थे।



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