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शैक्षिक निर्देशन के लाभ अथवा उपयोगिता का उल्लेख कीजिए।

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शैक्षिक निर्देशन के लाभ (उपयोगिता अथवा महत्त्व) [Merits (Utility or Importance) of Educational Guidance)
वर्तमान शिक्षा-पद्धति एक जटिल व्यवस्था है जिसमें बालकों की क्षमताएँ, शक्तियाँ, योग्यताएँ, समय तथा धन आदि का अपव्यय होता है और वे अपने शैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रहते हैं। इन असफलताओं तथा निराशाओं के बीच शैक्षिक निर्देशनं आशा की किरणों के साथ शिक्षा के क्षेत्र में अवतरित होता है जिसकी उपयोगिता या महत्त्व सन्देह से परे है। इसके लाभों की पुष्टि निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत हो जाती है –

(1) पाठ्य-विषयों का चयन – माध्यमिक विद्यालयों में विभिन्न व्यवसायों से सम्बन्धित विविध पाठ्य-विषयों के अध्ययन की व्यवस्था है। निर्देशन की सहायता से विद्यार्थी अपने बौद्धिक स्तर, क्षमताओं, योग्यताओं तथा रुचियों के अनुसार पाठ्य-विषयों का चुनाव कर सकता है। इस भाँति वह अपने मनोनुकूल व्यवसाय की प्राप्ति कर सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है।
(2) भावी शिक्षा का सुनिश्चय – हाईस्कूल स्तर के पश्चात् विद्यार्थियों के लिए यह सुनिश्चित कर पाना दूभर हो जाता है कि उनकी भावी शिक्षा का लक्ष्य एवं स्वरूप क्या होगा, अर्थात् वे किस व्यावसायिक विद्यालय में प्रवेश लें, व्यापारिक विद्यालय में या औद्योगिक विद्यालय में। यदि किन्हीं कारणों से वे अनुपयुक्त शिक्षा संस्थान में भर्ती हो जाते हैं तो कुसमायोजन के कारण उन्हें बीच में ही संस्था छोड़नी पड़ सकती है जिसके फलस्वरूप काफी हानि उठानी पड़ती है। इसके सन्दर्भ में निर्देशन सही पथ-प्रदर्शन करता है।
(3) नवीन विद्यालय में समायोज – शैक्षिक निर्देशन उन विद्यार्थियों की सहायता करता है ज़ो किसी नये विद्यालय में प्रवेश पाते हैं और वहाँ के वातावरण के साथ समायोजित नहीं हो पाते हैं।
(4) पाठ्यक्रम का संगठन – विद्यार्थियों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को दृष्टिगत रखते हुए उनका पाठ्यक्रम निर्धारित एवं संगठित किया जाना चाहिए। पाठ्यक्रम संगठन का कार्य शैक्षिक निर्देशन के माध्यम से किया जाता है।
(5) परिवर्तित विद्यालयी प्रबन्ध, पाठ्यक्रम एवं शिक्षण-विधि के सन्दर्भ में – विद्यालय एक लघु समाज है। समाज की प्रजातान्त्रिक व्यवस्था का सीधा प्रभाव विद्यालयी प्रबन्ध एवं व्यवस्थाओं पर पड़ता है। प्रजातान्त्रिक शिक्षा समाज के सभी व्यक्तियों को समान अवसर प्रदान करती है। व्यक्तिगत विभिन्नता के सिद्धान्त पर आधारित गत्यात्मक प्रकार की प्रजातान्त्रिक विद्यालयी व्यवस्था, पाठ्यक्रम तथा शिक्षण विधियों की आवश्यकताओं की ओर पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए। इन परिवर्तित देशाओं के कारण पैदा होने वाली समस्याओं का समाधान एकमात्र शैक्षिक निर्देशन की सहायता से ही सम्भव है।
(6) मन्द बुद्धि, पिछड़े तथा मेधावी बालकों के लिए – शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत मन्द बुद्धि, पिछड़े तथा मेधावी बालकों की पहचान करके उनकी क्षमतानुसार शिक्षा की व्यवस्था की जाती है। इस विशिष्ट व्यवस्था को लाभ अलग-अलग तीनों ही वर्गों के बालकों अर्थात् । मन्द बुद्धि, पिछड़े व मेधावी बालकों को प्राप्त होता है।
(7) अभिभावकों की सन्तुष्टि के लिए – कभी-कभी अभिभावकों की महत्त्वाकांक्षाओं तथा बालकों की मानसिक योग्यताओं व क्षमताओं के मध्य गहरा अन्तर होता है। निर्देशन के माध्यम से वे अपने बालक की विशेषताओं की सही वास्तविक झलक पाकर तदनुकूल शिक्षा की व्यवस्था कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त वे शिक्षा-संस्थानों के कार्यक्रमों से परिचित होकर उन्हें अपना योगदान प्रदान कर सकते हैं।
(8) अनुशासन की समस्या के समाधान के लिए – क्योंकि शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया में बालक की क्षमताओं, रुचियों तथा अभिरुचियों को ध्यान में रखकर उसकी शिक्षा सम्बन्धी व्यवस्था की जाती है; अत: पाठ्यक्रम बालक को भार-स्वरूप नहीं लगता। इसके विपरीत, वह चयनित विषयों में रुचि लेकर अनुशासित रूप में अध्ययन करता है जिससे अनुशासन की समस्या का एक बड़ी सीमा तक समाधान निकल आता है।
(9) जीविकोपार्जन का समुचित ज्ञान – प्रायः विद्यार्थियों को विभिन्न पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित एवं आगे चलकर उपलब्ध हो सकने वाले व्यावसायिक अवसरों की जानकारी नहीं होती। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति किसी विशेष व्यवसाय में जानकारी व रुचि न होने के कारण बार-बार अपना व्यवसाय बदलते हैं जिससे व्यावसायिक अस्थिरता में वृद्धि के कारण हानि होती है। अतः रोजगार के अवसरों का ज्ञान प्राप्त करने तथा जीविकोपार्जन सम्बन्धी समुचित ज्ञान पाने की दृष्टि से शैक्षिक निर्देशन अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होता है।
(10) अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या का अन्त – अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या के अन्त ज्यादातर बालक-बालिकाएँ विभिन्न कारणों से स्थायी साक्षरता प्राप्त किये बिना ही विद्यालय का त्याग कर देते हैं जिससे प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर अत्यधिक अपव्यय हो रहा है। इसके अतिरिक्त परीक्षा में फेल होने वाले विद्यार्थियों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। इस समस्या का अन्त शैक्षिक निर्देशन के माध्यम से ही सम्भव है।



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