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Answer» निर्देशन का क्षेत्र अत्यधिक व्यापक और महत्त्वपूर्ण है। सम्यक् निर्देशन की सहायता से व्यक्ति का जीवन व्यवस्थित हो जाता है और अपनी समस्याओं को हल करके वह सुखी एवं सफल व्यक्ति के रूप में अपने उज्ज्वल भविष्य की रक्षा हेतु तत्पर होता है। इसके विपरीत, समुचित निर्देशन और परामर्श के अभाव में व्यक्ति का पूर्ण विकास नहीं हो पाता और वह अपनी क्षमताओं एवं योग्यताओं के अनुसार एक सफल नागरिक नहीं बन पाता है। समुचित निर्देशन के अभाव में हानियाँ अनिवार्यता के बावजूद भी समुचित निर्देशन प्रदान न करने की दशा में निम्नलिखित हानियाँ दृष्टिगोचर होती हैं – (1) शारीरिक विकास एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी दोष – उचित निर्देशन के अभाव में शरीर में घर कर गयीं अनेक बीमारियाँ बढ़ती जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप शारीरिक बल तथा साहस का अभाव पाया जाता है। निर्देशन के अभाव में शारीरिक आकर्षण घटता जाता है। अत्यधिक लम्बे या छोटे कद के अतिरिक्त अनेक शारीरिक विकृतियों; यथा—हकलाना, तुतलाना, गूंगा-बहरा या अन्धापन, कुरूपता इत्यादि पर अंकुश न होने से ये बढ़ते ही जाते हैं। (2) घर-परिवार विषयक समस्याओं में वृद्धि – माता-पिता में से किसी एक की मृत्यु, तलाक या परित्याग के कारण खण्डित हुए परिवार को दुष्प्रभाव सीधे बच्चों पर पड़ता है। उचित निर्देश न मिलने के कारण बालाकों में परस्पर ईष्र्या, द्वेष, मन-मुटाव, अपराध भावना तथा लड़ाई-झगड़ा व्याप्त रहता है। घुटन-भरा कलहपूर्ण वातावरण तथा सद्भाव की कमी बालक-बालिकाओं को घर छोड़ने पर मजबूर कर देते हैं जो बाहर निकलकर सामाजिक दोषों व आपराधिक जीवन के शिकार हो जाते हैं। (3) व्यक्तित्व का असन्तुलित विकास – प्रायः देखने में आता है कि व्यक्तित्व के असन्तुलित विकास के कारण बालक में अत्यधिक लापरवाही, आत्मविश्वास की कमी, अत्यधिक घमण्ड तथा स्वार्थ, संवेगात्मक अस्थिरता, भ्रान्तियाँ, अधिक भावुकता, लज्जा एवं संकोच तथा प्रबल अरुचियाँ जन्मै ले बैठती हैं। समुचित निर्देशन के अभाव में ये समस्याएँ एवं दोष व्यक्तिगत और सामाजिक कुसमायोजन में वृद्धि करते हैं, जिसकी परिणति निराशा तथा असफल जीवन में होती है। (4) विद्यालयी जीवन से सम्बन्धित विकास – प्राय: निर्देशन के अभाव में विद्यार्थीगण अपनी रुचि के अनुकूल एवं जीवनोपयोगी पाठ्य-विषयों का चयन नहीं कर पाते, जिसके परिणामस्वरूप उनको पाठ्य-विषयों में ध्यान नहीं लगता और मन उचटता रहता है। उनमें अनुशासनहीनता घर कर जाती है और वे पढ़ाई-लिखाई से बचकर कक्षा छोड़ने के आदी हो जाते हैं। जिन बालकों में पढ़ाई-लिखाई से सम्बन्धित गलत आदतें निर्मित हो जाती हैं, वे उचित निर्देशन के अभाव में स्वयं को विद्यालयी कार्यक्रमों से अभियोजित नहीं कर पाते, समय नष्ट करते रहते हैं, गृह कार्य करके नहीं लाते, मेहनत से जी चुराते हैं तथा फेल होने के भय से चिन्ताग्रस्त रहने लगते हैं। (5) सामाजिक एवं नैतिक पतन – सम्यक् निर्देशन के अभाव में व्यक्ति सामाजिक एवं नैतिक पतन को प्राप्त होता है। अनेकानेक कारणों से बालक को असामाजिक प्रवृत्तियाँ तथा नैतिक मान्यताओं का अभाव झेलना पड़ता है। वह बेईमानी, झूठ, चालबाजी, दगाबाजी, चोरी तथा धोखाधड़ी का व्यवहार अर्जित करता है। नैतिक गुणों के अभाव में वह मादक द्रव्यों; जैसे-शराब, सिगरेट, भाँग, गाँजा, अफीम आदि का सेवन करने लगता है। दूसरों के मतों व विश्वासों के प्रति असहिष्णुता के साथ-साथ उसमें अधिकारियों के प्रति विद्रोह की भावना बढ़ती है। कभी-कभी युवा प्रेम में असफलता के कारण असामाजिक व अनैतिक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। उनमें लैंगिक जीवन की गलत आदतों के अतिरिक्त विषमलिंगी व्यक्तियों के प्रति असभ्य और असंगत व्यवहार भी देखने को मिलता है। इससे नागरिक उत्तरदायित्वों का भली प्रकार पालन नहीं कर पाते और श्रेष्ठ नागरिकता के मार्ग से भटक जाते (6) व्यावसायिक अक्षमताएँ – प्रायः देखा गया है कि माता-पिता की किसी व्यवसाय-विशेष में इच्छा व रुचि होती है जिसे वे अपनी सन्तान पर बलात् थोपना चाहते हैं। उचित मार्गदर्शन के अभाव में अपनी योग्यताओं व क्षमताओं के विरुद्ध व्यवसाय अपनाने के कारण बालक-बालिकाएँ अपनी व्यावसायिक परिस्थितियों से उचित तालमेल नहीं बैठा पाते। इसके अतिरिक्त उचित परामर्श न मिलने के कारण व्यवसाय को प्रारम्भ करने सम्बन्धी तथा समय, स्थान व साधनों सम्बन्धी दोष व्यावसायिक विफलताओं को जन्म देते हैं। (7) धार्मिक समस्याएँ – एक ओर, धर्म भारतीय जन-जीवन का प्राण कहलाता है तो दूसरी ओर, विज्ञान और तकनीकी के अगणित चमत्कारों से मानव-मस्तिष्क को चिन्तन के नये-नये आयाम मिले हैं। इसके फलस्वरूप वैज्ञानिक मान्यताओं तथा धार्मिक मूल्य व अवस्थाओं के बीच एक संघर्ष और विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। धार्मिक आशंकाएँ, अन्धविश्वास तथा बलात् धर्म परिवर्तन को लेकर उत्पन्न हुए प्रश्नों का मनोवैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत न करने से समाज को भारी क्षति होती है। (8) अवकांराजनित दोषों से हानियाँ – प्रायः लोगों को अवकाश के सदुपयोग के साधनों की उचित जानकारी नहीं रहती है। उचित मार्गदर्शन प्राप्त न होने की स्थिति में दुर्बलता, कमजोरी या शारीरिक-मानसिक असमर्थता के कारण उनमें खेलकूद अथवा मनोरंजन के किसी साधन में सफलतापूर्वक भाग ले सकने की असमर्थता देखने में आती है। उपर्युक्त विवेचने से स्पष्ट होता है कि उचित निर्देशन के अभाव में व्यक्ति को अनेकानेक क्षेत्रों से सम्बन्धित दुष्कर समस्याओं का समाना करना पड़ता है, जिससे अपूरणीय हानि की सम्भावना बनी रहती है।
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