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समाज सेवा पर निबंध लिखिए :

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मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज से अलग नहीं रहना चाहता। मनुष्य की प्रत्येक इकाइयाँ मिलकर ही समाज का निर्माण करती हैं। समाज में मनुष्य एक – दूसरे पर आश्रित है। इसीलिए समाज – सेवा की भावना मानव के हृदय में उच्चतम भावना है। सेवा की यह भावना मनुष्य मात्र की उन्नति के लिए आवश्यक है।

नवयुवक समाज के सुदृढ़ अंग हैं। अतः समाज – सेवा द्वारा समाज को उन्नत बनाने का सबसे बड़ा दायित्व हमारे नवयुवक पर है। खेद है कि आज पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध में फँसकर हमारे देश के नवयुवक, नवयुवतियाँ आमोद – प्रमोद में लीन रहकर समाज – सेवा से विमुख हो रहे हैं। हमारे कॉलेज के विद्यार्थियों को आज की शिक्षा ने इससे बहुत दूर फेंक दिया है। वे परिश्रम से भागते हैं। शरीर की सजावट के सामने उनके पास अपने जर्जर समाज तथा दीन – दुखी भाइयों को देखने का अवकाश नहीं है। शिक्षित नवयुवक आज खेतों में काम करना अपमान समझते हैं। यही कारण है कि हमारे पास ईश्वर प्रदत्त उपजाऊ भूमि और जलपूर्ण नदियाँ तथा मनुष्यकृत अनेक साधन होने पर भी हम दाने – दाने के लिए दूसरों के मुहताज हैं।

हमारा देश गाँवों में बसता है। गाँवों में शिक्षा और स्वच्छता का अभाव है। अशिक्षित और गन्दे होने के कारण गाँवों का घोर पतन हो गया है। समाज – सेवी भाइयों को चाहिए कि वे गाँवों को अपना मुख्य कार्यक्षेत्र बनाएँ और मजदूरों, किसानों तथा अन्य ग्रामवासियों को शिक्षित बनाकर उन्हें स्वच्छता का पाठ पढ़ायें। इस प्रकार हमारा ग्रामीण समाज शीघ्र ही उन्नत होकर सुखी बन जायेगा।

आज देश में अनेक प्रकार के रोग फैले हुए हैं। दीन जनता के पास रोगों से बचने के लिए न कोई उपाय है और न उनकी चिकित्सा के लिए पैसे। लाखों असहाय दरिद्र लोग रोगवश अकाल में ही काल – क्वलित हो जाते हैं। हमारे वैद्य और डाक्टरों का कर्तव्य है कि वे निःस्वार्थ और त्याग भावना से निर्धन रोगियों की सेवा करें और उन्हें अकाल – मृत्यु से बचाकर जीवन प्रदान करें। रोगी की औषधि और परिचर्या निःशुल्क होनी चाहिए। इस भाँति स्वस्थ जीवन प्राप्त करके समाज अपनी अभीष्ट उन्नति कर सकेगा।

हमारे समाज का नैतिक पतन हो गया है। चारों ओर भ्रष्टाचार, चोर – बाजारी, रिश्वत तथा धोखेबाजी फैली हुई है। इसलिए समाज – सेवकों का कर्त्तव्य है कि वे अपने चरित्र – बल से समाज की विनाशकारी तथा अनैतिकता की जड़ को उखाड़कर दूर फेंक दें। समाज का तभी उद्धार होगा।

समाज में अन्धविश्वास और छुआछूत का भी बोलबाला है। भाग्यवाद ने समाज को आलसी और अकर्मण्य बना दिया है। जादू – टोना, भूत – प्रेत, मन्त्र – तन्त्र आदि ने उसको सहज बुद्धि पर पर्दा डाल दिया है। ऊँच – नीच के विचार ने परस्पर घृणा का बीज बो दिया है। समाज – सेवकों को इन घृणित तत्वों को हृदय से निकाल कर उनमें सद्भावों की प्रतिष्ठा करनी है।

समाज की उन्नति के लिए स्त्री – जाति की संकीर्णताएँ दूर करनी अत्यावश्यक है। बिना स्त्रियों की उन्नति के समाज की उन्नति अधूरी है। स्त्रियाँ ही चरित्रवान् नागरिकों की जननी है। वास्तव में इनकी ही उन्नति पर समाज की उन्नति निर्भर है। आज समाज में स्त्रियों का अपना स्थान है। उन्हें उचित स्थान देना होगा।

भारत हमेशा से समाज – सेवा में अग्रणी रहा है। उसने सबसे पहले ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उच्च सिद्धान्त बनाकर विश्व – बन्धुत्व का दिव्य सन्देश दिया है। आज हम इसी उच्च सिद्धान्त को अपनाकर समाज तथा राष्ट्र की उन्नति कर सकते हैं।



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