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‘समाज’ शब्द के विभिन्न पक्षों की चर्चा कीजिए। यह आपके सामान्य बौद्धिक ज्ञान की समझ से किस प्रकार अलग है?

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सामान्य रूप से ‘समाज’ शब्द से प्रत्येक व्यक्ति परिचित है। ऐसा कहा जाता है कि जहाँ जीवन है वहीं समाज भी है। ‘समाज’ एक अत्यधिक प्रचलित शब्द है जिसको साधारण बोलचाल की भाषा में व्यक्तियों के समूह के लिए प्रयुक्त किया जाता है। उदाहरण के लिए–‘आर्य समाज’, ब्रह्म समाज’, ‘धर्म समाज’, ‘विद्यार्थी समाज’ तथा ‘बाल समाज’, आदि शब्दों का प्रयोग व्यक्ति इसी अर्थ में करते हैं। कुछ लोग ‘समाज’ शब्द का प्रयोग व्यक्तियों के समूह के रूप में अथवा एक समिति या संस्था के रूप में भी करते हैं। इसी कारण समाज के अर्थ के संबंध में काफी अनिश्चितता पायी जाती है। समाजशास्त्र में समाज’ शब्द का प्रयोग जनसाधारण द्वारा लगाए गए इन अर्थों में नहीं होता, वरन् यह एक विशिष्ट अर्थ को प्रतिपादित करता है। समाजशास्त्र एक विज्ञान है तथा विज्ञान होने के नाते इसकी अपनी एक शब्दावली है। वैज्ञानिक शब्दावली में प्रत्येक शब्द को विशिष्ट अर्थ में प्रयोग किया जाता है। ‘समाज’ भी इसी प्रकार का एक शब्द (संकल्पना या अवधारणा) है, जिसका संबंध समाजशास्त्र की शब्दावली से है। इस नाते न केवल इसका स्पष्ट अर्थ है, अपितु इसके विभिन्न पक्षों के बारे में भी किसी प्रकार का संदेह नहीं है।

मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) के अनुसार-“समाज रीतियों एवं कार्य-प्रणालियों, प्रभुत्व एवं पारस्परिक सहयोग, अनेक समूहों और उनके विभाजनों, मानव-व्यवहार के नियंत्रणों एवं स्वाधीनताओं की एक व्यवस्था है। इस निरंतर परिवर्तनशील जटिल व्यवस्था को हम समाज कहते हैं। यह सामाजिक संबंधों का जाल (Web of social relationships) है और यह सदैव परिवर्तित होता रहता है। समाज की यह परिभाषा समाज के विभिन्न पक्षों को पूर्णतः स्पष्ट करने वाली मानी जाती है। समाज मूर्त न होकर अमूर्त होता है। यह कोई अखंडित व्यवस्था नहीं है अपितु इसमें अनेक समूह एवं उप-समूह पाए जाते हैं। व्यक्तियों के व्यवहार हेतु निश्चित रीतियाँ एवं कार्य-प्रणालियाँ होती हैं जिन्हें संस्थाएँ कहा जा सकता है। संस्थाएँ व्यक्ति को समाज की मान्यताओं के अनुरूप व्यवहार करने हेतु प्रेरित करती हैं। व्यक्ति को स्वतंत्रता तो होती है परंतु वह अन्य व्यक्तियों से व्यवहार हेतु समाज द्वारा मान्य रीतियों में से ही किसी एक का चयन कर सकता है। विभिन्न व्यक्तियों में जो संबंध पाए जाते हैं उन्हीं को समाज कहते हैं। संबंध स्थिर नहीं रहते अपितु निरंतर परिवर्तित होते रहते हैं। इस प्रकार, समाज के विभिन्न पक्ष मिलकर एक जटिल व्यवस्था का निर्माण करते हैं।

समाज के क्रमबद्ध ज्ञान एवं सामान्य बौद्धिक ज्ञान में अंतर

समाजशास्त्र में समाज का क्रमबद्ध (विधिवत्) अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन एक विशिष्ट दृष्टिकोण या चिंतन द्वारा किया जाता है, जिसे समाजशास्त्रीय चिंतन कहते हैं। यह चिंतन सामान्य बौद्धिक ज्ञान से भिन्न होता है। सामान्य बौद्धिक ज्ञाने में दार्शनिक एवं धार्मिक अनुचिंतन सम्मिलित किया जाता है। उदाहरणार्थ-हम अपने दैनिक जीवन में बहुत-सी बातों एवं घटनाओं को देखते हैं परंतु उनके बारे में वैज्ञानिक चिंतन नहीं करते अर्थात् उनका क्रमबद्ध वर्णन करने का प्रयास नहीं करते। यदि हम किसी भिखारी को किसी चौराहे या सार्वजनिक स्थल पर भीख माँगते हुए देखते हैं तो सामान्य बौद्धिक ज्ञान से यह सोच लेते हैं कि वह शायद गरीब है इसलिए भीख माँग रहा है। यदि इसी को हम समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखें तो हमारा चिंतन पूर्णतया अलग होगा। हमारी सोच के प्रमुख बिंदु इस प्रकार होंगे—क्या सभी गरीब भिक्षा माँगने पर विवश होते हैं? यदि नहीं तो, केवल कुछ व्यक्ति ही भिक्षावृत्ति क्यों करते हैं? भिक्षावृत्ति एक राष्ट्रीय समस्या क्यों है? गरीबी के अतिरिक्त भिक्षावृत्ति के क्या कारण हैं? क्या इस समस्या के कारणों का पता लगाकर इसका निराकरण करना संभव है? भिक्षावृत्ति जनहित का मुद्दा क्यों हैं? सरकार भिक्षावृत्ति के निवारण के लिए क्या प्रयास कर रही है?

समाज का क्रमबद्ध चिंतन व्यक्तियों में जिस दृष्टिकोण को विकसित करता है उसी को समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण या चिंतन कहते हैं। यह चिंतन हमें भिक्षावृत्ति के इतिहास, भिखारियों की जीवन दशाओं, उनके सामाजिक-आर्थिक कारणों तथा इस समस्या के समाधान की खोज करने की उत्सुकता से भर देता है। समाज का क्रमबद्ध अध्ययन रोजमर्रा के सामान्य प्रेक्षण से भी भिन्न है। रोजमर्रा की घटनाएँ व्यक्तियों में समाजशास्त्रीय सोच विकसित नहीं करतीं। हम बहुत-सी घटनाओं को देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। उदाहरणार्थ-अपने पड़ोस में एक कामकाजी महिला को अपने पति, सास-ससुर या अन्य सदस्य से झगड़ते हुए देखकर हम सोच लेते हैं कि अमुक महिला ही ऐसी है। यदि इसी को हम समाजशास्त्रीय चिंतन की दृष्टि से देखें तो हमारे सामने कामकाजी महिलाओं से संबंधित अनेक मुद्दे सामने आ जाएँगे। कामकाजी महिलाएँ ही ऐसा क्यों करती हैं? क्या बिना कामकाजी महिलाओं वाले परिवारों में भी ऐसा होता है? क्या आस-पड़ोस में कोई ऐसा परिवार भी है जिसमें कामकाजी महिला को अपने परिवार के सदस्यों से किसी प्रकार का मतभेद नहीं है तथा सभी सदस्य उसके पारिवारिक दायित्वों को पूरा करने में सहयोग देते हैं?

समाज के क्रमबद्ध ज्ञान एवं सामान्य बौद्धिक ज्ञान में अंतर को सामने रखते हुए ही टी० बी० बॉटोमोर ने इस तथ्य पर बल दिया है कि व्यक्ति हजारों वर्षों से समाज में रह रहे हैं, परंतु समाजशास्त्र एक नवीन विषय है। स्पष्ट है कि समाज में रहना तथा समाज में हो रही घटनाओं का सामान्य चिंतन या प्रेक्षण समाजशास्त्र नहीं है।



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