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Answer» समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों से घनिष्ठ रूप से संबंधित है। विभिन्न विद्वानों ने समाजशास्त्र व अन्य सामाजिक विज्ञानों के संबंध के विषय में भिन्न-भिन्न विचार प्रकट किए हैं। मुख्य विद्वानों के विचार निम्नवर्णित हैं- गिडिंग्स के विचार-गिडिंग्स समाजशास्त्र को न तो सामाजिक विज्ञानों का समन्वय मानते हैं और न ही संयोग, वरन वे इसे स्वतंत्र विज्ञान के रूप में स्वीकार करने पर बल देते हैं। समाजशास्त्र का अपना एक भिन्न दृष्टिकोण है। इसी दृष्टिकोण के आधार पर अर्थशास्त्र, इतिहास तथा राजनीतिशास्त्र को समाजशास्त्र से अलग किया जा सकता है। वस्तुतः वह समस्त सामाजिक विज्ञानों का अध्ययन सामाजिक दृष्टिकोण के आधार पर करता है। इस स्थिति में समाजशास्त्र को अन्य सामाजिक विज्ञानों का स्वामी कहा जा सकता है। सोरोकिन के विचार–सोरोकिन के अनुसार, समाजशास्त्र न केवल अन्य सामाजिक विज्ञानों का आधार है वरन् एक विशिष्ट विज्ञान है। सोरोकिन के शब्दों में, “समाजशास्त्र न केवल समाज के सामान्य सिद्धान्तों का अध्ययन करता है वरन यह विभिन्न सामाजिक विज्ञानों के मध्य संबंध स्थापित करता है और उन्हें पूर्ण बनाता है।” उपर्युक्त विवरण के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि समाजशास्त्र व अन्य सामाजिक विज्ञानों के पारस्परिक संबंधों के विषय में विभिन्न विद्वानों के विचारों में मतैक्य का अभाव है। प्रत्येक ने अपने दृष्टिकोण से विचारों को प्रकट किया है तथा प्रत्येक के दृष्टिकोण में कुछ-न-कुछ सत्यता है। वैसे अधिकांश विद्वान वार्ड के मत से अधिक सहमत है। कॉम्टे के विचार–समाजशास्त्र के जन्मदाता फ्रांसीसी समाजशास्त्री ऑगस्त कॉम्टे समाजशास्त्र व अन्य सामाजिक विज्ञानों में किसी प्रकार का संबंध नहीं है। उनके मतानुसार समाजशास्त्र एक पूर्ण एवं स्वतंत्र विषय है, जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता समाज एक पूर्णता है और उसका अध्ययन भी पूर्णता में ही होना चाहिए। इतिहास, अर्थशास्त्र व राजनीतिशास्त्र आदि सभी विषय समाज के केवल एक पहलू का ही अध्ययन करते हैं। इस कारण समाज के यथार्थ स्वरूप का अध्ययन नहीं हो पाता। इस दोष की पूर्ति केवल समाजशास्त्र द्वारा ही हो सकती है। ऐसी दशा में समाजशास्त्र के अतिरिक्त अन्य विषय व्यर्थ हैं। समाजशास्त्र एक स्वतंत्र विज्ञान है, उसे अपने अध्ययनों में किसी अन्य शास्त्र से सहायता नहीं लेनी चाहिए। वास्तव में, इनका समाजशास्त्र के विकास का उद्देश्य यही था कि इससे सभी पहलुओं को एक साथ रखकर अध्ययन किया जा सकें। स्पेंसर के विचार–स्पेंसर के अनुसार, “समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों का समन्वय मात्र है। समाजशास्त्र समस्त सामाजिक विज्ञानों में से प्रत्येक से कुछ बातें ग्रहण करती है और उनका समन्वय करता है। इस प्रकार समाजशास्त्र को स्वतंत्र विज्ञान के रूप में, जैसा कि कॉम्टे मानते हैं, स्वीकार नहीं किया जा सकता। इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र आदि जितने भी सामाजिक विज्ञान है, सभी पूर्ण विज्ञान हैं। ये विज्ञान समाजशास्त्र को प्रभावित कर सकते हैं, परंतु समाजशास्त्र इन्हें प्रभावित नहीं कर सकता।” वार्ड के विचार-वार्ड स्पेंसर के मत के पक्ष में नहीं हैं। उसके अनुसार समाजशास्त्र विभिन्न सामाजिक विज्ञानों का केवल समन्वय नहीं है वरन स्वतंत्र विज्ञान है। यह सत्य है कि समाजशास्त्र में अन्य सामाजिक विज्ञानों का समन्वय होता है, परंतु यह समन्वय केवल मिश्रण नहीं है वरन् नवीन विषय की सृष्टि करने वाला संयोग होता है। विभिन्न सामाजिक विज्ञान मिलकर एक नवीन विषय को निर्माण करते हैं और अपना स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त कर देते हैं। इस संयोग से एक नवीन विषय ‘समाजशास्त्र’ का जन्म होता है, जो पूर्णतया स्वतंत्र विज्ञान है। उदाहरण के लिए नीले और पीले रंग मिलकर हरे रंग को जन्म देते हैं जो कि पीले और नीले रंग से पूर्णतया अलग होता है। उसी प्रकार विभिन्न सामाजिक विज्ञानों से तत्त्व ग्रहण करके समाजशास्त्र सर्वथा नवीन और स्वतंत्र विज्ञान बन जाता है। उपर्युक्त विवरण के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि समाजशास्त्र व अन्य सामाजिक विज्ञानों के पारस्परिक संबंधों के विषय में विभिन्न विद्वानों के विचारों में मतैक्य का अभाव है। प्रत्येक ने अपने दृष्टिकोण से विचारों को प्रकट किया है तथा प्रत्येक के दृष्टिकोण में कुछ-न-कुछ सत्यता है। वैसे अधिकांश विद्वान वार्ड के मत से अधिक सहमत हैं। समाजशास्त्र का अन्य सामाजिक विज्ञानों से संबंध समाजशास्त्र सामाजिक विज्ञानों के एक समूह का भाग है। विभिन्न सामाजिक विज्ञानों में पाया जाने वाला विभाजन सुस्पष्ट नहीं है और इसलिए सभी में कुछ सीमा तक सामान्य रुचियाँ, संकल्पनाएँ एवं अध्ययन की पद्धतियाँ हैं। इसलिए बहुत-से विद्वानों का कहना है कि सामाजिक विज्ञानों को अलग-अलग करना इनमें पाए जाने वाले अंतरों को अतिरंजित करना तथा समानताओं पर आवरण चढ़ाने जैसा होगा। अधिकांश सामाजिक विज्ञानों द्वारा अन्त:विषयक उपागम (Inter-disciplinary approach) अपनाए जाने से सामाजिक विज्ञानों में अंतर करना और भी कठिन हो गया है। फिर भी, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि विभिन्न सामाजिक विज्ञानों में परस्पर संबंध के बावजूद रुचियों, संकल्पनाओं एवं अध्ययन-पद्धतियों में थोड़ा-बहुत अंतर पाया जाता है। समाजशास्त्र और अन्य सामाजिक विज्ञानों में पाया जाने वाला परस्पर संबंध निम्न प्रकार हैं- (अ) समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र का परस्पर घनिष्ठ संबंध हैं। अर्थशास्त्र भी एक सामाजिक विज्ञान है, क्योंकि उसमें मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के संबंधों पर विचार करने से पूर्व यह आवश्यक है कि अर्थशास्त्र के अर्थ पर प्रकाश डाला जाए। अर्थशास्त्र आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन है। इसमें मुख्यत: उत्पादन, वितरण एवं उपभोग का अध्ययन किया जाता है। प्रमुख विद्वानों ने अर्थशास्त्र को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है- फेयरचाइल्ड (Fairchild) के अनुसार-“अर्थशास्त्र मनुष्य की उन क्रियाओं का अध्ययन है, जो मनुष्य की आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए भौतिक साधनों की प्राप्ति हेतु की जाती है।” मार्शल (Marshall) के अनुसार–‘अर्थशास्त्र मनुष्य के धनोपार्जन के दृष्टिकोण से मनुष्य जाति का अध्ययन है।” रॉबिन्स (Robbins) के अनुसार-“अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो कि मानवीय आचरणों का साध्य एवं साधनों के विभिन्न प्रयोगों के पारस्परिक संबंधों की दृष्टि से अध्ययन करता है।” अर्थशास्त्र की परिभाषाओं से स्पष्ट है कि अर्थशास्त्र वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन एवं वितरण का अध्ययन करता है तथा इसका मुख्य विषय आर्थिक क्रियाएँ हैं। शास्त्रीय आर्थिक दृष्टिकोण पूर्ण रूप से आर्थिक चरों के अंतर्संबंधों (जैसे कीमत, माँग एवं पूर्ति का संबंध) का वर्णन करता है। इसमें मुख्य रूप से इस बात पर विचार किया जाता है कि उत्पादन के साधनों को अर्जन किस प्रकार किया जा सकता है और उससे संबधित विभिन्न नियम क्या-क्या हैं, परंतु उत्पादन के साधनों को संबंध मनुष्य । से होता है और मनुष्य समाज की क्रियाशील सदस्य है। समाजशास्त्र के माध्यम से सामाजिक संबंधों को समझने का प्रयास किया जाता है और अर्थशास्त्र द्वारा समाज और व्यक्ति की आर्थिक गतिविधियों को समझने का प्रयास किया जाता है। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि अर्थशास्त्र आर्थिक संबंधों का अध्ययन करता है और समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों का, परंतु आर्थिक संबंध सामाजिक संबंधों पर आश्रित होते हैं। वास्तव में, आर्थिक संबंध सामाजिक संबंधों के गुच्छे की एक कड़ी मात्र है। इस प्रकार, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र दोनों एक-दूसरे के अत्यधिक निकट हो जाते हैं, दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। जैसे-जैसे आर्थिक प्रक्रिया समाज में विकसित होती है, वैसे-वैसे सामाजिक जीवन भी प्रभावित होता है; अर्थात् आर्थिक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन के प्रति भी उत्तरदायी होते हैं। इस कारण ही कुछ अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक परिवर्तन के आधार पर सामाजिक परिवर्तनों के स्वरूप की व्याख्या की है। समाज के रीति-रिवाज, परंपराएँ, रूढ़ियाँ तथा कानून आदि परिस्थितियों द्वारा प्रभावित होते रहते हैं। अर्थशास्त्र की विभिन्न क्रियाएँ; जैसे—उत्पादन, वितरण तथा उपभोग इत्यादि; समाज में ही क्रियांवित होती हैं और सामाजिक जीवन को प्रभावित करती है। औद्योगिक विकास ने पूँजीवाद को जन्म दिया तथा पूँजीवाद ने संघर्ष को। मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) ने ठीक ही लिखा है, “आर्थिक घटनाएँ सदैव सामाजिक आवश्यकताओं और क्रियाओं से प्रभावित होती है और स्वयं भी उन्हें सदा प्रभावित करती हैं।’ कार्ल मार्क्स (Karl Marx) आर्थिक कारणों को ही सामाजिक परिवर्तन का मुख्य कारण मानते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में परस्पर घनिष्ठ संबंध है। अनेक विद्वानों का तो मत यह है कि समाज की समस्त समस्याओं का समाधान केवल आर्थिक व्यवस्था के सुधार में हैं। इस कारण ही अर्थशास्त्र को समाजशास्त्र की एक शाखा भी माना जाता है। थॉमस (Thomas) के शब्दों में, “वास्तव में अर्थशास्त्र समाजशास्त्र के विस्तृत विज्ञान की एक शाखा है।” इसी प्रकार, सिल्वरमैन (Silverman) ने लिखा है, “साधारण कार्यों के लिए अर्थशास्त्र को पितृविज्ञान समाजशास्त्र, जो सामाजिक संबंधों के सामान्य सिद्धांत का अध्ययन करता है, की एक शाखा माना जा सकता है।” समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में निम्नलिखित प्रमुख अंतर पाए जाते हैं- ⦁ समाजशास्त्र में सामाजिक संबंधों को संपूर्ण रूप से अध्ययन किया जाता है, परंतु अर्थशास्त्र में केवल आर्थिक संबंधों का ही अध्ययन किया जाता है। इस स्थिति में यह कहा जा सकता है कि अर्थशास्त्र एक सीमित विज्ञान है, जबकि समाजशास्त्र एक विस्तृत विज्ञान है।। ⦁ समाजशास्त्र के क्षेत्र में संपूर्ण समाज सम्मिलित है, जबकि अर्थशास्त्र में केवल इसका आर्थिक पक्ष ही सम्मिलित है। ⦁ समाजशास्त्र में समाज का अध्ययन किया जाता है, उसकी इकाई समूह है; परंतु अर्थशास्त्र की इकाई मनुष्य है तथा उसके आर्थिक पक्ष की विवेचना की जाती है। ⦁ समाजशास्त्र एक सामान्य सामाजिक विज्ञान है, जबकि अर्थशास्त्र एक विशिष्ट सामाजिक विज्ञान है। ⦁ समाजशास्त्र की अध्ययन पद्धतियाँ अर्थशास्त्र की अध्ययन पद्धतियों से भिन्न हैं, क्योंकि अर्थशास्त्र में केवल आगमन तथा निगमन पद्धतियों का ही मूल रूप से, प्रयोग किया जाता है। इसके विपरीत, समाजशास्त्र में सामाजिक सर्वेक्षण, समाजमिति तथा निरीक्षण आदि विभिन्न अध्ययन प्रविधियों एवं ऐतिहासिक, तुलनात्मक संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक आदि पद्धतियों को अपनाया जाता है। (ब) समाजशास्त्र और इतिहास समाजशास्त्र और इतिहास सदा एक-दूसरे के निकट रहे हैं। सर्वप्रथम हमें यह समझना है कि ‘इतिहास’ का अर्थ क्या है? अंग्रेजी के शब्द ‘History’ का जन्म ग्रीक शब्द historica’ से हुआ है। जिसका अर्थ है ‘वास्तविक रूप में क्या घटित हुआ। इस अर्थ में इतिहास केवल निरंतर घटित होने वाली घटनाओं का निष्पक्ष लेखा-जोखा मात्र है। कुछ विद्वानों के विचार में इतिहास केवल युद्धों का ही विवेचन करता है, परंतु यह धारणा भ्रामक है, क्योंकि इतिहास मानव-समाज के प्रत्येक पहलू का विवेचन करता है। इतिहास की सबसे सुंदर परिभाषा रेपसन ने इन शब्दों में दी है, “इतिहास घटनाओं या विचारों की प्रगति का एक सुसंबद्ध विवरण है। इस प्रकार इतिहास एक सुसंगठित एवं क्रमबद्ध ज्ञान है, जिससे घटनाओं का तारतम्यता के साथ वर्णन किया जाता है। घाटे के अनुसार, “इतिहास हमारे संपूर्ण भूतकाल का वैज्ञानिक अध्ययन तथा लेखा-जोखा अर्थात् ज्ञात प्रमाण है।” इतिहास की परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसमें मानव जाति के कार्यों का अध्ययन किया जाता है तथा इनका ठोस विवरण प्रस्तुत किया जाता है। इसमें भूतकाल घटनाओं का निरूपण किया जाता है। परंपरागत इतिहास केवल राजाओं और युद्ध की घटनाओं का वर्णन करने वाला विषय मात्र था, परंतु अब इतिहास के अध्ययन को ध्येय सभी प्रकार के आर्थिक, सामाजिक व राजीतिक परिवर्तनों का अध्ययन करना है। इतिहास में अतीतकालीन घटनाओं, सभ्यता एवं संस्कृति का अध्ययन किया जाता है जो कि समाजशास्त्री को समाज के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करने में विशेष रूप से सहायक है; अर्थात् समाजशास्त्र के अध्ययन में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना परम आवश्यक है। पालवर्क के शब्दों में, “संस्कृति और संस्थाओं का इतिहास, समाजशास्त्र को समझने और सामग्री | जुटाने में सहायक होता हैं। जिस प्रकार समाजशास्त्र के अध्ययन में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार इतिहास के अध्ययन में भी सामाजिक पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक होता है। प्रत्येक ऐतिहासिक घटना को अपना पृथक् सामाजिक मूल्य होता हैं, परंतु ऐतिहासिक घटनाओं का सामाजिक महत्त्व समझे बिना इतिहास का अध्ययन व्यर्थ हो जाता है। इस प्रकार समाजशास्त्र इतिहास के अध्ययन को उपयोगी और सरल बनाने में सहायक होता है। गिलिन तथा गिलिन ने ठीक लिखा है, “यदि समुचित रूप से विचार किया जाए तो इतिहासकार सामान्य रूप से उस सामाजिक अतीत का अध्ययन करता हैं, जिसे मानव द्वारा लिपिबद्ध कर लिया गया हो।” समाजशास्त्र और इतिहास के घनिष्ठ संबंधों के कारण ही जॉर्ज ई० होवार्ट ने लिखा है, “इतिहास भूतकालीन समाजशास्त्र है, जबकि समाजशास्त्र वर्तमान इतिहास है। आधुनिक युग में इतिहासकार समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण रखकर ही अध्ययन करता है। समाजशास्त्री भी अतीत की सभ्यताओं के सामाजिकु पक्षों में प्रचलित ऐतिहासिक ज्ञान का प्रयोग करने लगे हैं। समाजशास्त्र और इतिहास के संबंधों पर प्रकाश डालते हुए राइट लिखते हैं, “किसी सीमा तक समाजशास्त्री और इतिहासवेत्ताओं के क्षेत्र समान है। इतिहासवेक्ता से इस प्रकार से प्राप्त किए ज्ञान को वर्तमान और भविष्य की समस्याओं के विश्लेषण से संबंधित करके समाजशास्त्री इस कार्य को आगे बढ़ाता है। समाजशास्त्री को इतिहासवेत्ता के परिणामों को उसी प्रकार ग्रहण करना चाहिए, जिस प्रकार वह एक वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक के परिणामों को स्वीकार करता है तथा इसको समाज के अध्ययन से संबंधित करना चाहिए।” समाजशास्त्र एवं इतिहास में मुख्य रूप से निम्नलिखित अंतर पाए जाते हैं- ⦁ इतिहास में अधिकतर अतीतकालीन घटनाओं का ही अध्ययन किया जाता है, जबकि समाजशास्त्र समकालीन समय या कुछ पहले के अतीत की सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करता है तथा उनके आधार पर भविष्यवाणी. भी करता है। ⦁ समाजशास्त्र में घटनाओं के कारणों की खोज की जाती है और उसी के द्वारा वह अपनी विषय-वस्तु का निर्धारण करता है। इतिहास कारणों की खोज पर अधिक बल न देकर घटनाओं के यथासंभव वर्णन पर बल देता है। ⦁ समाजशास्त्र एक विज्ञान है, परंतु इतिहास को विज्ञान की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। उल्फ समाजशास्त्र और इतिहास में भेद करते हुए लिखते हैं, “इतिहास विशेष राष्ट्रों, संस्थाओं, अनुसंधानों या अंवेषणों में रुचि लेता हैं, संस्थाओं और राष्ट्रों आदि से संबंधित नियमों में नहीं। ऐसे सामान्य नियम नृवंशशास्त्र (Ethnology), मानवशास्त्र, समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान में होते। हैं जो कि विज्ञान हैं, इतिहास नहीं।” ⦁ ऐतिहासिक अध्ययन में किसी विशिष्ट समाज की क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है, जबकि समाजशास्त्र सर्वांगीण समाज का अध्ययन करता है। ⦁ इतिहास मूर्त हैं, उसका संबंध स्थूल घटनाओं से है; परंतु समाजशास्त्र अमूर्त है, उसमें मुख्य रूप से सामाजिक संबंधों का अध्ययन किया जाता है जो कि अमूर्त हैं। पार्क के शब्दों में, “इसी अर्थ में इतिहास मूर्त तथा समाजशास्त्र मानवीय अनुभव एवं स्वभाव का अमूर्त विज्ञान है।” ⦁ इतिहास में घटनाओं का यथातथ्य वर्णन किया जाता है, जबकि समाजशास्त्र इन समस्याओं का विश्लेषण करने के साथ-साथ उनको सुलझाने के साधन भी जुटाता है। ⦁ इतिहास व्यक्ति के कार्यकलापों पर बल देता है, जबकि समाजशास्त्र के अध्ययन की इकाई मानव-समूह है। ⦁ समाजशास्त्र वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग करता है, जबकि इतिहास मुख्यतया ऐतिहासिक पद्धति का। ⦁ इतिहास एवं समाजशास्त्र में दृष्टिकोण का भी अंतर है। इतिहास मुख्य रूप से असाधारण घटनाओं का ही अध्ययन करता है, जबकि समाजशास्त्र मुख्य रूप से साधारण घटनाओं का अध्ययन करता है तथा अपवादों की अवहेलना करता है। (स) समाजशास्त्र और मनोविज्ञान समाजशास्त्र और मनोविज्ञान दोनों परस्पर संबंधित विज्ञान हैं। दोनों के संबंधों पर प्रकाश डालने से पूर्व यह आवश्यक है कि मनोविज्ञान को अर्थ समझा जाए। मनोविज्ञान को मुख्य रूप से व्यवहार के विज्ञान के रूप में परिभाषित किया जाता है तथा यह व्यक्ति से संबंधित है। मनोविज्ञान की प्रमुख परिभाषाएँ निम्न प्रकार हैं- वुडवर्थ (Woodworth) के अनुसार-“मनोविज्ञान वातावरण के संबंध में व्यक्ति की क्रियाओं का अध्ययन करने वाला विज्ञान है।” स्किनर (Skinner) के अनुसार-“मनोविज्ञान विविध परिस्थितियों के प्रति प्राणी की प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करता है। प्रतिक्रियाओं अथवा व्यवहार से तात्पर्य प्राणी को सभी प्रकार की प्रतिक्रियाओं, समायोजन क्रियाओं तथा अनुभवों से हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि मनोविज्ञान मानवे व्यवहार का एक विज्ञान है। उपर्युक्त परिभाषाओं के विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है कि मनोविज्ञान मानव-व्यवहार का अध्ययन करने वाला एक प्रमुख विज्ञान है। मनोविज्ञान में मुख्यतया व्यक्ति की समायोजन संबंधी समस्याओं का अध्ययन किया जाता है, जिन्हें सुलझाने के लिए उसके सामाजिक परिवेश को समझना आवश्यक है। इस कार्य में समाजशास्त्र ही सहायता पहुँचा सकता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि समाजशास्त्र मनोविज्ञान के अध्ययन में विशेष रूप से सहायक होता है। दूसरे; समाजशास्त्र एवं मनोविज्ञान दोनों ही मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करते हैं। दोनों विषयों का संबंध प्रत्यक्ष मस्तिष्क से होता है। दोनों का ही अध्ययन-क्षेत्र मानव-व्यवहार है। समाजशास्त्र में सामाजिक संबंधों को जानने के लिए व्यवहार का अवलोकन किया जाता है। उसका प्रमुख विषये पर्यावरण के संदर्भ में व्यक्ति के व्यवहार को समझना है, जिसके लिए मनोविज्ञान का सहारा लेना आवश्यक हो जाता है। वास्तव में, मनुष्य की प्रकृति की समस्याओं की व्याख्या के लिए दो विज्ञानों का सहयोग परम आवश्यक है। मैकाइवर तथा पेज इस विषय में लिखते हैं, “समाजशास्त्र विशेष रूप से मनोविज्ञान को सहायता देता है, जिस प्रकार मनोविज्ञान समाजशास्त्र को विशेष सहायता देता है।” समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के संयोग से एक नवीन विज्ञान का जन्म हुआ जिसे सामाजिक मनोविज्ञान कहकर पुकारा जाता है। यह विषय समाजशास्त्र और मनोविज्ञान को परस्पर संबंधित करता हैं। इस कारण ही सामाजिक मनोविज्ञान को समाजशास्त्र और मनोविज्ञान दोनों की शाखा माना जाता है। मोटवानी ने लिखा है कि “सामाजिक मनोविज्ञान; मनोविज्ञान व समाजशास्त्र के बीच की कड़ी है।” सामाजिक मनोविज्ञान; समाजशास्त्र व मनोविज्ञान के संबंधों पर प्रकाश डालता है। क्रच एवं क्रचफील्ड के अनुसार, सामाजिक मनोविज्ञान समाज में व्यक्ति के व्यवहार का विज्ञान है। सामाजिक मनोविज्ञान की परिभाषा ही उसे समाजशास्त्र के निकट ले आती है, क्योंकि इस परिभाषा के अनुसार सामाजिक मनोविज्ञान व्यक्ति की समाज के साथ प्रतिक्रिया पर बल देता है। इस प्रकार समाजशास्त्र और सामाजिक मनोविज्ञान दोनों ही संमाज से संबधित हैं। समाजशास्त्र में मानव व्यवहार के उन सब रूपों का अध्ययन होता है, जो समूह के लिए समस्याएँ होते हैं। सामाजिक मनोविज्ञान में उस व्यक्तिगत व्यवहार का अध्ययन होता है जो कि समूह में दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि स्पष्ट रूप से सामाजिक मनोविज्ञान तथा समाजशास्त्र की पाठ्य-वस्तु में अलगाव नहीं है। लेपियर तथा फ्रांसवर्थ के अनुसार, “सामाजिक मनोविज्ञान; समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान के लिए उसी प्रकार है, जिस प्रकार शारीरिक रसायनशास्त्र; जीवशास्त्र तथा रसायनशास्त्र के लिए है।” समाजशास्त्र एवं मनोविज्ञान में पाए जाने वाले मुख्य अंतर निम्नवर्णित हैं- ⦁ मनोविज्ञान का दृष्टिकोण वैयक्तिक है, जबकि समाजशास्त्र का दृष्टिकोण सामूहिक है। भले ही दोनों विज्ञानों की सामग्री एक ही हैं, फिर भी अध्ययन के दृष्टिकोणों में अंतर के कारण इनमें पर्याप्त अंतर आ जाती है। ⦁ समाजशास्त्र में मुख्य रूप से व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार के बाह्य पक्ष का ही अध्ययन होता है जो कि सामाजिक संबंधों के रूप में प्रकट होता है, जबकि मनोविज्ञान व्यक्ति के केवल | मानसिक पक्ष का ही अध्ययन करता है। ⦁ मनोविज्ञान की इकाई व्यक्ति है, जबकि समाजशास्त्र में समूह को इकाई माना जाता है। ⦁ मनोविज्ञान और समाजशास्त्र की अध्ययन पद्धतियों में भी अंतर है। मनोविज्ञान में मुख्य रूप से प्रयोगात्मक और विकासात्मक पद्धतियों को अपनाया जाता है, जबकि समाजशास्त्र में अन्य पद्धतियों को अधिक अपनाया जाता है। ⦁ समाजशास्त्र एवं मनोविज्ञान में क्षेत्र संबंधी अंतर भी है। समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है तथा | इसका क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत है, जबकि मनोविज्ञान एक विशिष्ट विज्ञान है तथा इसका क्षेत्र सीमित है। (द) समाजशास्त्र और राजनीतिशास्त्र समाजशास्त्र और राजनीतिशास्त्र का परस्पर घनिष्ठ संबंध है। राजनीतिशास्त्र का संबंध मुख्यतया राज्य, राजनीतिक संस्थाओं व राजनीतिक व्यवहार से है तो समाजशास्त्र का सम्पूर्ण समाज, सामाजिर्क संस्थाओं तथा सामाजिक व्यवहार से। ऐसी दशा में दोनों में परस्पर घनिष्ठता का होना स्वभाविक ही है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि दोनों में अंतर नहीं है। समाजशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र के संबंधों पर प्रकाश डालने से पूर्व राजनीतिशास्त्र का अर्थ स्पष्ट कर लेना अनिवार्य है। प्रमुख विद्वानों ने राजनीतिशास्त्र को अग्रांकित रूप से परिभाषित किया है- 1. गैटिल (Gattle) के अनुसार-“राजनीतिशास्त्र राज्य का विज्ञान है। इसके अतंर्गत हम राजनीतिक समुदायों, शासन के संगठन, कानून की व्यवस्था तथा अन्य राज्य संबंधों का अध्ययन करते हैं। यह मानव के उन संबंधों का अध्ययन करता है, जिन पर राज्य का नियंत्रण होता है।” 2. पॉल जैनेट (Paul Jenett) के अनुसार–राजनीतिशास्त्र विज्ञान का वह भाग है, जिसमें राज्य के आधार तथा शासन के सिद्धांतों पर विचार किया जाता है।” राजनीतिशास्त्र की परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि राजनीतिशास्त्र एक विशेष प्रकार का सामाजिक विज्ञान है, जो व्यक्ति के उस राजनीतिक जीवन का अध्ययन करता है, जो संपूर्ण सामाजिक जीवन का अंग है। यह विषय समाज की एक विशेष संगठित राजनीतिक इकाई में रुचि रखता है, जिसे राज्य कहा जाता है। राज्य का मानव-जीवन से अप्रत्यक्ष संबंध होता है; अतः राजनीतिशास्त्र मनुष्य का राजनीतिक प्राणी के रूप में अध्ययन करता है। यदि राजनीतिशास्त्र मनुष्य का राजनीतिक प्राणी के रूप में अध्ययन करता है तो समाजशास्त्र बताता है कि मनुष्य क्यों और कैसे राजनीतिक प्राणी बना। इस प्रकार दोनों विज्ञानों के अध्ययन के विषय मानव-जीवन के क्रियाकलाप हैं; अत: दोनों के मध्य आदान-प्रदान चलता रहता है। समस्त राजनीतिक संस्थाएँ सामाजिक व्यवस्थाओं से प्रभावित होती हैं तथा प्रत्येक राज्य कानूनों का निर्माण करते समय सामाजिक संस्थाओं का सदा ध्यान रखता है। वास्तव में राजनीतिशास्त्र को ठीक प्रकार से समझने के लिए समाजशास्त्र का अध्ययन आवश्यक हो जाता है। गिडिंग्स का यह कहना पूर्णतया सत्य है कि समाजशास्त्र के प्रारंभिक सिद्धांतों से अनभिज्ञ लोगों को राज्य के सिद्धांतों को पढ़ाना वैसे ही व्यर्थ है, जैसे न्यूटन द्वारा बताए गए गति-नियमों को न जानने वाले व्यक्ति को खगोलशास्त्र अथवा ऊष्मा विज्ञान पढ़ाना।” यदि एक ओर राजनीतिशास्त्र को समझने के लिए समाजशास्त्र सहायक होता है, तो दूसरी ओर समाजशास्त्र भी राजनीतिशास्त्र से सहायता प्राप्त करता है। राजनीतिशास्त्र समाजशास्त्र को समाज के सामान्य सामाजिक संगठन के अंग के रूप में राज्य के संगठन और कार्यों से संबंधित तथ्यों को प्रदान करता है। समाजशास्त्र को राजनीतिशास्त्र से उन सिद्धान्तों का ज्ञान प्राप्त होता है, जिनकी संगठित संबंधों से उत्पत्ति होती है। समाजशास्त्र राजनीतिशास्त्र को न केवल अध्ययन-पद्धति उपलब्ध कराता है, अपितु राजनीतिशास्त्र की शब्दावली को तीक्ष्ण बनाने में सहायता प्रदान करता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि राजनीतिशास्त्र और समाजशास्त्र एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं। इस विषय पर एफ० जी० विल्सन लिखते हैं, “वास्तव में यह मान लिया जाना चाहिए कि अक्सर यह निश्चित करना बहुत कठिन होता है कि कोई विशेष लेखक समाजशास्त्री माना जाए या राजनीतिशास्त्री या दार्शनिक?’ बार्स के अनुसार, “समाजशास्त्र और आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत के विषय में सबसे अधिक मइत्त्वपूर्ण बात यह है कि राज्य सिद्धांत के पिछले तीस वर्षों में जो परिवर्तन हुए हैं, उनमें से अधिकतर समाजशास्त्र द्वारा सुझाए हुए और बतलाए गए मार्ग पर ही हुए हैं।” राजनीतिक समाजशास्त्र एक ऐसा विषय है, जो दोनों विषयों को परस्पर निकट लाता है। राजनीतिक समाजशास्त्र में राज्य अथवी राजीनीतिक संस्थाओं तथा समाज अथवा सामाजिक संस्थाओं के परस्पर प्रभाव को अध्ययन किया जाता है; अर्थात् इसमें राजनीतिक तथा सामाजिक दृष्टिकोणों को एक समान महत्त्व दिया जाता है। समाजशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र में निम्नलिखित प्रमुख अंतर पाए जाते हैं- ⦁ समाजशास्त्र अपने विस्तृत अर्थ में समाज के समस्त स्वरूपों एवं पहलुओं का अध्ययन करता है। जबकि राजनीतिशास्त्र में केवल राज्य और सरकार तथा राजनीतिक स्वरूपों का अध्ययन किया जाता है। गिलक्राइस्ट के शब्दों में, “समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है, राजनीतिशास्त्र राज्य अथवा राजनीतिक समाज का विज्ञान है। समाजशास्त्र मानव का एक सामाजिक प्राणी के रूप में अध्ययन करता है। चूंकि राजनीतिक संगठनका एक विशेष तरह का सामाजिक संगठन है, इसलिए राजनीतिशास्त्र समाजशास्त्र की अपेक्षा अधिक विशिष्ट है।” ⦁ राजनीतिशास्त्र में केवल उन नियंत्रणों का अध्ययन किया जाता है, जिन्हें राज्य द्वारा स्वीकार किया जाता है, जबकि समाजशास्त्र में सामाजिक नियंत्रणों के समस्त साधनों (जैसे रूढ़ियों, प्रथाओं, परंपराओं, आदर्शों इत्यादि) का भी अध्ययन किया जाता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि राजनीतिशास्त्र में संस्थागत व्यवहार का ही अध्ययन किया जाता है। इन तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि राजनीतिशास्त्र तथा समाजशास्त्र में दृष्टिकोण संबंधी अंतर भी है। समाजशास्त्र का दृष्टिकोण राजनीतिशास्त्र की तुलना में अधिक व्यापक है।। ⦁ समाजशास्त्र संगठित तथा असंगठित दोनों प्रकार के समुदायों का अध्ययन करता है, परंतु राजनीतिशास्त्र का संबंध केवल संगठित समुदायों और समाजों का अध्ययन करना ही है। अराजनीतिक समुदाय से उसका कोई संबंध नहीं है। ⦁ समाजशास्त्र में समाज का अध्ययन मुख्यतया सामाजिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर किया | जाता है, जबकि राजनीतिशास्त्र में राजनीतिक अथवा शासकीय दृष्टिकोण को अपनाया जाता है। ⦁ समाजशास्त्र व्यक्ति के चेतन और अचेतनं दोनों प्रकार के व्यवहार से संबंधित है, परंतु राजनीतिशास्त्र केवल चेतन व्यवहार से संबंधित है। (य) समाजशास्त्र एवं सामाजिक मानव विज्ञान विश्व के विभिन्न देशों में मानवविज्ञान में पुरातत्व विज्ञान, भौतिक मानवविज्ञान, सांस्कृतिक इतिहास, भाषा की विभिन्न शाखाएँ और सामान्य समाजों में जीवन के सभी पक्षों का अध्ययन सम्मिलित किया जाता है। यहाँ सामाजिक मानवविज्ञान और सांस्कृतिक मानवविज्ञान से समाजशास्त्र के संबंधों की बात है क्योंकि यह समाजशास्त्र के अध्ययन से संबंध है। समाजशास्त्र को आधुनिक जटिल समाजों का अध्ययन माना गया है जबकि सामाजिक मानवविज्ञान को सरल समाजों का अध्ययन माना गया है। प्रत्येक विषय का अपना अलग इतिहास या विकास यात्रा होती है। सामाजिक मानवविज्ञान का विकास पश्चिम में उन दिनों हुआ जब यह माना जाता था कि पश्चिमी शिक्षित सामाजिक मानवविज्ञानियों ने गैर-यूरोपियन समाजों का अध्ययन किया जिनको प्रायः विजातीय, अशिष्ट और असभ्य समझा जाता था। जिनका अध्ययन किया गया और जिनका अध्ययन नहीं किया गया था, उनके मध्य असमान संबंध पर अधिक प्रकाश नहीं डाला गया। लेकिन अब समय बदल गया है और अब वे मूल निवासी विद्यमान हैं, चाहे वे भारतीय हैं या सूडानी, नागा हैं या संथाल, जो अब अपने समाजों के बारे में बोलते हैं और लिखते हैं। अतीत के मानवविज्ञानियों ने सरल समाजों का विवरण तटस्थ वैज्ञानिक तरीके से लिखा था। प्रत्यक्ष व्यवहार में वे निरंतर उन समाजों की तुलना आधुनिक पश्चिमी समाजों से करते रहे थे, जिसे वे एक मानदंड के रूप में देखते थे। अन्य परिवर्तनों ने भी समाजशास्त्र और सामाजिक मानवविज्ञान की प्रकृति को पुन: परिभाषित किया आधुमिकता ने एक ऐसी प्रक्रिया की शुरुआत की जिसमें छोटे से छोटा गाँव भी भूमण्डलीय प्रक्रियाओं से प्रभावित हुआ। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है-उपनिवेशवाद। ब्रिटिश उपनिवेशवाद काल में भारत के अत्यधिक दूरस्थ गाँवों ने भी अपने प्रशासन और भूमि कानूनों में परिवर्तन, अपने राजस्व उगाही में परिवर्तन और अपने उत्पादक उद्योग को समाप्त होते हुए देखा था। समकालीन भूमण्डलीय प्रक्रियाओं ने ‘विश्व के इस प्रकार सिकुड़ने’ को और अधिक बल प्रदान किया है। एक सरल समाज का अध्ययन करते समय यह मान्यता थी कि यह एक सीमित समाज है किंतु आज ऐसा नहीं है। सामाजिक मानवविज्ञान द्वारा सरल व निरक्षर समाजों पर किए गए परंपरागत अध्ययन का प्रभाव मानवविज्ञान की विषवस्तु और विषय सामग्री पर भी पड़ा। सामाजिक मानवविज्ञान की प्रवृत्ति समाज (सरल समाज) के सभी पक्षों का एक समग्र में अध्ययन करने की होती थी। अभी तक जो विशेषज्ञता प्राप्त हुई है वह क्षेत्र पर आधारित थी। उदाहरण के लिए अंडमान द्वीप समूह, नूअर अथवा मेलैनेसिया समाजशास्त्री जटिल समाजों का अध्ययन करते हैं, अत: समाज के भागों जैसे नौकरशाही अथवा धर्म या जाति अथवा एक प्रक्रिया जैसे सामाजिक गतिशीलता पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। सामाजिक मानवविज्ञान की विशेषताएँ थीं, लंबी क्षेत्रीय कार्य, परंपरा, समुदाय जिसका अध्ययन किया उसमें रहना और अनुसंधान की नृजाति पद्धतियों का उपयोग। समाजशास्त्री प्रायः सांख्यिकी एवं प्रश्नावली विधि का प्रयोग करते हुए सर्वेक्षण पद्धति एवं संख्यात्मक आँकड़ों पर निर्भर करते हैं। आज एक सरल और जटिल समाज में अंतर को स्वयं एक बड़े पुनर्विचार की आवश्यकता है। भारत स्वयं परंपरा और आधुनिकता का, गाँव और शहर, जाति और जनजाति का, वर्ग एवं समुदाय का एक जटिल मिश्रण है। गाँव राजधानी दिल्ली के बीचों-बीच निवास करते हैं। कॉल सेंटर देश के विभिन्न कस्बों से यूरोपीय और अमेरिकी ग्राहकों की सेवा करते हैं। भारतीय समाजशास्त्र दोनों परंपराओं से भार ग्रहण करने में अत्यधिक उदार रहा है। भारतीय समाजशास्त्री अक्सर भारतीय समाजों के अध्ययन में केवल अपनी संस्कृति का नहीं बल्कि उनका भी अध्ययन करते हैं जो उनकी संस्कृति का अंग नहीं है। यह शहरी आधुनिक भारत के जटिल अंतर करने वाले समाजों के साथ-साथ जनजातियों का भी एक समग्र रूप में अध्ययन कर सकता है। इस बात का डर बना रहता था कि सरल समाजों के समाप्त होने से सामाजिक मानवविज्ञान अपनी विशिष्टता खो देगा और समाजशास्त्र में मिल जाएगा। हालाँकि दोनों विषयों में लाभदायक अन्त:परिवर्तन हुए हैं और वर्तमान पद्धतियों एवं तकनीकों को दोनों विषयों से लिया जाता है। राज्य और वैश्वीकरण के मानवविज्ञानी अध्ययन किए गए हैं जोकि सामाजिक मानवविज्ञान की परंपरागत विषय-वस्तु से एकदम अलग हैं। दूसरी ओर समाजशास्त्र भी आधुनिक समाजों की जटिलताओं के अध्ययन के लिए संख्यात्मक एवं गुणात्मक तकनीकों, समष्टि और व्यष्टि उपागमों का उपयोग करता है क्योंकि भारत में समाजशास्त्र और सामाजिक मानवविज्ञान में अति निकट का संबंध रहा है।
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