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Answer» प्रत्येक विषय का अपना-अपना विषय-क्षेत्र होता है। इस विषय-क्षेत्र के आधार पर ही प्रत्येक विषय दूसरे विषयों से अलग हो जाता है। अन्य विषयों के समान ही समाजशास्त्र का भी अपना क्षेत्र है, परंतु एक आधुनिक एवं विस्तृत विज्ञान होने के कारण इसका विषय-क्षेत्र निर्धारित करना कठिन हैं। * यह कठिनाई विद्वानों के विचारों में मतभेद के कारण और अधिक बढ़ जाती है। कुछ विद्वान इसे समस्त सामाजिक विज्ञानों का मूल आधार मानते हैं तो कुछ इसे अनेक विषयों का भंडार या स्वामी बनाने की भूल करते हैं। कालबर्टन (Calberton) ने इस संदर्भ में उचित ही लिखा है, “समाजशास्त्र एक लचीला विज्ञान है, इसकी सीमाओं का आदि और अंत निर्धारित करना कठिन है। कहीं समाजशास्त्र सामाजिक मनोविज्ञान बन जाता है और कहीं आर्थिक सिद्धांत समाजशास्त्रीय विचारधारा बन जाता है। या प्राणिशास्त्रीय विचारधारा बन जाता है; अतः इसकी सीमा निश्चित करना असंभव है।” समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र मतभेदों के बावजूद, समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र को दो प्रमुख संप्रदायों द्वारा स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है जो कि इस प्रकार हैं– (अ) विशेषात्मक संप्रदाय तथा (ब) समन्वयात्मक संप्रदाय। इन दोनों संप्रदायों को विस्तारपूर्वक समझकर, समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र का अनुमान लगाया जा सकता है। (अ) विशेषात्मक या विशिष्टवादी या यथारूपेण संप्रदाय विशेषात्मक विचारधारा के प्रमुख समर्थक सिमेल (Simmel), रिचार्ड (!Richard), टॉनीज (Tonnies), स्टेमलर (Stemmler), रॉस (Rose), वेबर (Weber), वीरकांत (Vierkant), पार्क (Park), बर्गेस (Burgess) तथा वॉन वीज (Von wiese) हैं। ये विद्वान समाजशास्त्र को विशेष विज्ञान के रूप में मानते हैं। इस संप्रदाय के समर्थक समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र वैसा ही निश्चित तथा परिसीमित कर देना चाहते हैं जैसा कि प्राकृतिक विज्ञान तथा अन्य सामाजिक विज्ञानों का है। इस संप्रदाय की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं- ⦁ इस संप्रदाय के समर्थकों के अनुसार समाजशास्त्र का क्षेत्र सामाजिक संबंधों के स्वरूपों का अध्ययन करना होना चाहिए। ⦁ समाज के विभिन्न पक्षों का अध्ययन विभिन्न सामाजिक विज्ञान (जैसे-राजनीतिशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र आदि) करते हैं; अतः समाजशास्त्र में इनके अध्ययन की आवश्यकता नहीं है। ⦁ समाजशास्त्र का एक विशिष्ट एवं निश्चित क्षेत्र होना चाहिए। ⦁ समाजशास्त्र एक स्वतंत्र विज्ञान है। ⦁ समाजशास्त्र एक विश्लेषणात्मक विज्ञान है। इस संप्रदाय के विचारकों के दृष्टिकोण को ठीक प्रकार से समझने के लिए निम्नलिखित प्रमुख समाजशास्त्रियों के विचारों पर प्रकाश डालना आवश्यक है- 1. सिमेल (Simmel) के विचार-जॉर्ज सिमेल के अनुसार समाजशास्त्र में प्रत्यक्ष और वास्तविक व्यवहारों के स्थान पर स्वरूपकीय व्यवहारों का अध्ययन करना चाहिए। उनके अनुसार समाजशास्त्र का अन्य विज्ञानों से वहीं संबंध है जो भौतिक विज्ञानों से रेखागणित का है। जिस प्रकार रेखागणित में भौतिक वस्तुओं की अंतर्वस्तु (Content) का नहीं वरन उसके। स्थान संबंधी स्वरूपों का अध्ययन किया जाता है, उसी प्रकार समाजशास्त्र का क्षेत्र भी। सामाजिक संबंधों और क्रियाओं का नहीं वरन् उनके स्वरूपों का अध्ययन है। सिमेल के अनुसार, सामाजिक संबंध के दो रूप होते हैं-(i) सूक्ष्म तथा (ii) स्थूल। इसके अनुसार समाजशास्त्र में सूक्ष्म संबंधों की विवेचना की जाती है। विभिन्न विज्ञानों में समाजशास्त्र के जो सूक्ष्म सिद्धांत काम कर रहे हैं, उन सिद्धांतों को उन विज्ञानों से अलग करके उनका स्वतंत्र रूप में अध्ययन करना ही समाजशास्त्र का प्रमुख अधिकार-क्षेत्र है। इस प्रकार हम देखते हैं कि विभिन्न सामाजिक विज्ञानों में तो सामाजिक संबंधों का अंतर्वस्तु का अध्ययन करते हैं, परंतु समाजशास्त्र में स्वरूप (Form) का अध्ययन किया जाता है। उदाहरण के लिए–आर्थिक क्रियाओं में उत्पादक, श्रमिक, विक्रेता, क्रेता, अर्थ मंत्री, मिल मालिक आदि सभी का योग रहता है; इन सबकी आर्थिक क्रियाएँ और उनके नियम वह अंतर्वस्तु हैं जिनका कि अध्ययन अर्थशास्त्र में किया जाता है, परंतु इन आर्थिक क्रियाओं में भाग लेने वाले व्यक्तियों में जो परस्पर संबंध है उसके स्वरूप का अध्ययन समाजशास्त्र में किया जाता है। 2. वीरकांत (Vierkant) के विचार-जर्मन समाजशास्त्री वीरकांत के अनुसार समाजशास्त्र का कार्य समाज के उन तत्त्वों का अंवेषण करना है जिनकी उत्पत्ति सामाजिक संबंधों के कारण होती है; उदाहरण के लिए–प्रेम, द्वेष, लज्जा, सहकारिता आदि। ये वे तत्त्व हैं जिनसे सामाजिक एकता उत्पन्न होती है। अन्य शब्दों में, ये संबंध व्यक्तियों को एक-दूसरे से बाँधते । हैं। समाजशास्त्र में इन मूल तत्त्वों या संबंधों का ही अध्ययन किया जाता है। वीरकांत ने समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र को इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “समाजशास्त्र उन मानसिक संबंधों के अन्तिम स्वरूपों का अध्ययन है जो कि मनुष्य को एक-दूसरे से बाँधते हैं।” 3. वेबर (Weber) के विचार-मैक्स वेबर के अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक क्रिया को समझने और व्याख्या करने में सहायक होता है। उनके अनुसार, सामाजिक व्यवहार दो व्यक्तियों के मध्य तब होता है जबकि वे एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं और परस्पर कोई व्यवहार करते हैं। इस पर भी यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक सामाजिक संबंध सामाजिक व्यवहार ही हो। उदाहरण के लिए दो व्यक्ति साइकिल से टकरा जाते हैं। इस प्रकार का टकराना एक प्राकृतिक घटना है, परंतु उन व्यक्तियों में से एक का दूसरे की चोट पर हाथ फेरना और क्षमा माँगना एक सामाजिक क्रिया है। इस प्रकार, वेबर के अनुसार, समाजशास्त्र का कार्य सामाजिक क्रिया की व्याख्या करना है। 4. टॉनीज (Tonnies) के विचार–टॉनीज भी समाजशास्त्र को एक विशिष्ट विज्ञान की श्रेणी में रखने के पक्षपाती थे। उनका कहना था कि समाजशास्त्र को विशिष्ट विज्ञान बनाने के लिए आवश्यक है कि इसके अंतर्गत सामाजिक संबंधों के केवल विशेष स्वरूपों का ही अध्ययन किया जाए। टॉनीज समाजशास्त्र को एक विशुद्ध विज्ञान बनाने के पक्ष में थे। 5. वॉन वीज (Von wiese) के विचार-वॉन वीज भी स्पष्ट रूप से सामाजिक संबंधों के स्वरूपों के अध्ययन को ही समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र मानते हैं। उन्होंने समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र को स्पष्ट करने के लिए सामाजिक संबंधों को 650 प्रकारों में वर्गीकृत किया है। विशेषात्मक संप्रदाय की आलोचना-विशेषात्मक संप्रदाय की आलोचना प्रमुख रूप से फ्रांसीसी तथा अंग्रेज समाजशास्त्रियों ने निम्नलिखित प्रकार से की हैं- 1. समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के सूक्ष्म तथा अमूर्त स्वरूपों के अध्ययन तक ही सीमित नहीं है-इस संप्रदाय के प्रतिपादक समाजशास्त्र को सामाजिक संबंधों के सूक्ष्म तथा अमूर्त रूपों के अध्ययन तक सीमित कर देते हैं, परंतु किसी भी घटना का अध्ययन हम तब तक नहीं कर सकते जब तक कि उसके वास्तविक स्वरूपों का अध्ययन न कर लें। इस प्रकार, सिमेल का मत अपूर्ण है। समाजशास्त्र के छात्र का मुख्य उद्देश्य तो सामाजिक घटनाओं के सजीव रूप तथा उसकी वास्तविक परिस्थितियों दोनों को ही अध्ययन करना है। 2. स्वरूप (Form) और अंतर्वस्तु (Content) दो पृथक् वस्तुएँ नहीं हैं—इस संप्रदाय के समर्थकों के अनुसार स्वरूप’ और ‘अंतर्वस्तु’ एक-दूसरे से अलग हैं, परंतु यथार्थ में सामाजिक संबंधों में स्वरूप और अंतर्वस्तु को अलग नहीं किया जा सकता। वे एक-दूसरे पर आश्रित है और एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं। जब सामाजिक संबंधों की अंतर्वस्तु में कोई परिवर्तन आता है तो उनके स्वरूपों में भी परिवर्तन आ जाता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सोरोकिन (Sorokin) ने इन शब्दों में आलोचना की है, “हम एक गिलास को | उसके स्वरूप को बदले बिना शराब, पानी या शक्कर से भर सकते हैं, परंतु मैं एक ऐसी सामाजिक संस्था की कल्पना भी नहीं कर सकता जिसका स्वरूप सदस्यों के बदलने पर भी न बदले।” 3. स्वरूपों का अध्ययन अन्य विज्ञानों में भी होता है-इस संप्रदाय के समर्थकों का यह कहना सत्य नहीं है कि केवल समाजशास्त्र में ही सामाजिक संबंधों के स्वरूपों का अध्ययन किया जाता है। समाजशास्त्र के अतिरिक्त और भी ऐसे विज्ञान हैं जिनमें सामाजिक संबंधों के अनेक स्वरूपों का अध्ययन किया जाता है। उदाहरण के लिए राजनीतिशास्त्र में युद्ध, शांति, संघर्ष, समझौता आदि सामाजिक संबंधों के अनेक स्वरूपों का अध्ययन किया जाता है। इसी प्रकार विधिशास्त्र में शक्ति दासता, आज्ञापालन, अधिकार आदि सामाजिक संबंधों के स्वरूपों का अध्ययन सदा होता आया है। 4. शुद्ध समाजशास्त्र की धारणा अव्यावहारिक हैं—विशेषात्मक संप्रदाय के समाजशास्त्रियों की शुद्ध समाजशास्त्र की धारणा अव्यावहारिक है क्योंकि प्रत्येक विज्ञान दूसरे विज्ञान से संबंधित हैं, अतः किसी भी विज्ञान को अन्य विज्ञानों से पूर्णतया अलग करके अध्ययन नहीं किया जा सकता। सामाजिक घटनाओं की तो प्रकृति ही ऐसी हैं कि इसे समझने के लिए विभिन्न दृष्टिकोणों द्वारा इसका अध्ययन करना अनिवार्य है। 5. समाज के सदस्यों को कम महत्त्व देना उचित नहीं है—विशेषात्मक संप्रदाय समाज के सदस्यों को कम महत्त्व देता है, परंतु यथार्थ में सभी सदस्य सामाजिक संबंधों की अंतर्वस्तु हैं। 6. समाजशास्त्र के क्षेत्र को अत्यधिक संकुचित कर दिया है-इस संप्रदाय ने समाजशास्त्र के क्षेत्र को अत्यधिक संकुचित कर दिया है। कोई भी विज्ञान वास्तविकता के बिना उचित प्रकार से विकसित नहीं होता। इसके लिए आवश्यक है कि समस्या के प्रत्येक पहलू का अध्ययन किया जाए, परंतु विशेषात्मक विचारधारा समाजशास्त्र को एक पक्ष विशेष तक ही सीमित कर देती है। 7. सूक्ष्म और अमूर्त स्वरूपों का अध्ययन लाभदायक नहीं इस विषय में राइट (Wright) का कथन है कि “विशुद्ध स्वरूपों के अध्ययन के परिणामस्वरूप हम ऐसे अमूर्त सिद्धांतों । का निर्माण कर लेते हैं, जो सामान्य होते हैं और हमारे मन में ये विचार उत्पन्न होते हैं कि इन सिद्धांत का ज्ञाने तो हम अपनी सामान्य बुद्धि से भी कर सकते हैं। इन्हें जानने के लिए इतने लंबे विचार, तर्क-शक्ति और विभिन्न परिभाषाओं के शब्दाडम्बरों की कोई आवश्यकता नहीं है। अनेक बार ये सिद्धांत इतने अस्पष्ट और धुंधले होते हैं कि पाठक झुंझला जाता है। और सोचने लगता है कि इनका कोई अर्थ है या नहीं। अतः राइट ने ठीक ही कहा है कि यदि सामाजिक संबंधों का सूक्ष्म और अमूर्त रूप से अध्ययन किया जाएगा तो वह समाजशास्त्र के लिए लाभदायक नहीं होगा।’ 8. समाजशास्त्र की मौलिक प्रकृति के विरुद्ध विशेषात्मक विचारधारी समाजशास्त्र की प्रकृति के पूर्णतया प्रतिकूल है, जैसा कि गिडिंग्स (Giddings) लिखते हैं कि “समाजशास्त्र का मुख्य विषय सामाजिक संबंधों का अध्ययन है। संबंध सामाजिक जीवन में ही पाए जाते हैं। सामाजिक जीवन की प्रकृति इस प्रकार की है कि इसके समस्त भागों को एक-दूसरे के साथ गहरा संबंध है। ये सब एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं और एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं। ये भाग मिलकर कार्य करते हैं; अतः यदि इनको पृथक् करके इनका सूक्ष्म अध्ययन करें तो हम सामाजिक संबंधों के पारस्परिक प्रभावों का कोई ज्ञान प्राप्त न कर सकेंगे, हमारा ज्ञान बिल्कुल अपूर्ण रहेगा।” (ब) समन्वयात्मक संप्रदाय समन्वयात्मक संप्रदाय के अनुसार समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है तथा यह अन्य विशिष्ट साम्राजिक विज्ञानों का समन्वय मात्र है। इस संप्रदाय के प्रमुख समर्थक फ्रांसीसी और अंग्रेज समाजशास्त्री हैं। इनके अनुसार समाजशास्त्र को अपना क्षेत्र सीमित तथा संकुचित न बनाकर विस्तृत और व्यापक बनाना होगा। समाजशास्त्र के क्षेत्र को कुछ विषयों तक सीमित न करके उसे अन्य सभी विज्ञानों में भी समन्वित करना चाहिए। अन्य विज्ञानों से पृथक् रखने पर समाजशास्त्र एक जड़ विषय हो जाएगा। दुर्वीम, हॉबहाइस, सोरोकिन, जिंसबर्ग तथा मोटवानी आदि इसी मत के समर्थक हैं। इन विद्वानों के मत में समाजशास्त्र एक विज्ञानों का विज्ञान’ है। सभी विज्ञान उसके क्षेत्र में आते हैं और वह सभी को अपने में समन्वित करता है। सामाजिक जीवन के समस्त भाग परस्पर संबंधित हैं। इस कारण किसी एक पक्ष का अध्ययन करने से हम संपूर्ण सामाजिक जीवन को नहीं समझ सकते। ऐसी दशा में आवश्यक है कि हम समाजशास्त्र में संपूर्ण सामाजिक जीवन का व्यवस्थित अध्ययन करें, केवल सूक्ष्म सिद्धांतों का अध्ययन करने से काम नहीं चलेगा। मोटवानी'(Motwani) के अनुसार, इस प्रकार, समाजशास्त्र जीवन को पूरी तरह और एक समग्र रूप में देखने का प्रयास करता है। इस प्रकार, समाजशास्त्र के क्षेत्र के अंतर्गत समाज के सामाजिक संबंधों को सामान्य अध्ययन होना चाहिए। इस संप्रदाय के प्रमुख समर्थकों के विचार निम्नांकित हैं- दुर्वीम के विचार-दुर्वीम के अनुसार, प्रत्येक समाज में कुछ विचार, धारणाएँ एवं भावनाएँ होती हैं, जिनका पालन संबंधित समाज के अधिकांश सदस्य करते हैं। ये विचार एवं धारणाएँ संबंधित समाज के सामाजिक जीवन का सामूहिक प्रतिनिधित्व करते हैं। दुर्णीम के अनुसार, समाजशास्त्र का कार्य इसी सामूहिक प्रतिनिधित्व का अध्ययन करना है। इस स्थिति में स्पष्ट हैं कि समाजशास्त्र को एक सामान्य विज्ञान होना चाहिए। हॉबहाउस के विचार-हॉबहाउस ने भी समाजशास्त्र को एक सामान्य विज्ञान माना है। इनके अनुसार समाजशास्त्र अन्य विज्ञानों द्वारा प्राप्त विभिन्न सिद्धांतों का अध्ययन करता है तथा कुछ सामान्य तत्त्वों को ज्ञात करता है। इन सामान्य तत्त्वों द्वारा समाज पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन भी समाजशास्त्र के अंतर्गत किया जाता है। सोरोकिन के विचार–सोरोकिन ने भी समाजशास्त्र को एक सामान्य विज्ञान माना है तथा अपने मत की पुष्टि इन शब्दों में की हैं, “मान लीजिए, यदि सामाजिक घटनाओं को वर्गों में वर्गीकृत कर दिया जाए और प्रत्येक वर्ग का अध्ययन एक विशेष सामाजिक विज्ञान करें तो इन विशेष सामाजिक विज्ञानों के अतिरिक्त एक ऐसे विज्ञान की आवश्यकता होगी जो सामान्य हो एवं विभिन्न विज्ञानों के संबंधों का अध्ययन करें।” वार्ड के विचार-वार्ड ने समाजशास्त्र को ज्ञान की विभिन्न शाखाओं का समन्वय मात्र माना हैं। समाज का निर्माण करने वाले समूह एवं संस्थाएँ आदि परस्पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, जिसके कारण एक में हुआ परिवर्तन दूसरों पर प्रभाव डालता है। इस प्रकार समाजशास्त्र का आधार अन्य सामाजिक विज्ञानों के परिणाम हैं और इसलिए समाजशास्त्र को विभिन्न सामाजिक विज्ञानों से प्राप्त केंद्रीय विचारों का समन्वय और अध्ययन करना चाहिए। समन्वयात्मक संप्रदाय की आलोचना–जर्मन समाजशास्त्री समन्वयात्मक संप्रदाय की निम्नांकित बिदुओं के आधार पर आलोचना करते हैं- ⦁ इन विद्वानों के अनुसार, समाजशास्त्र के समन्वयात्मक दृष्टिकोण से किए गए अध्ययन या सामान्य अध्ययन में, समाज में पाए जाने वाले प्रत्येक प्रकार के सामाजिक संबंधों का ज्ञान प्राप्त करना पड़ेगा; परंतु ये संबंध इतने अधिक हैं कि उनका संपूर्ण अध्ययन करना प्रायः संभव नहीं है। ⦁ दूसरा दोष यह है कि यदि हम समन्वयात्मक अध्ययन को समाजशास्त्र का लक्ष्य बना लेते हैं तो समाजशास्त्र में भी प्रायः उन विषयों का अध्ययन करना पड़ेगा। जिनका कि अध्ययन अन्य सामाजिक विज्ञान करते हैं। इस प्रकार समाजशास्त्र और अन्य सामाजिक विज्ञानों की अध्ययन-वस्तु में कोई अंतर नहीं रह जाएगा। ⦁ दि समाजशास्त्र सभी प्रकार के तथ्यों एवं सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करना शुरू कर देगा तो यह विशुद्ध शास्त्र न रहकर एक मिश्रित शास्त्र बन जाएगा। निष्कर्ष–उपर्युक्त विवेवचन से स्पष्ट हो जाता है कि समाजशास्त्र की विषय-वस्तु के समुचित अध्ययन के लिए प्रस्तुत समन्वयात्मक तथा विशेषात्मक दोनों दृष्टिकोण एकपक्षीय हैं तथा दोनों दृष्टिकोणों में समन्वय की आवश्यकता है। केवल एक ही दृष्टिकोण अपनाने से हमारी समस्याओं का समाधान नहीं हो पाएगा। अन्य शब्दों में, समाजशास्त्र के पूर्ण अध्ययन के लिए विशिष्ट व सामान्य दोनों विचारधाराएँ आवश्यक हैं। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो समाजशास्त्र को एक जटिल विज्ञान के रूप में परिणत कर देंगे। यथार्थ में विशेषात्मक और समन्वयात्मक विचारधाराएँ एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं वरन् एक-दूसरे की पूरक हैं। हॉबहाउस ने ठीक ही कहा है, “सामान्य समाजशास्त्र में जब तक विशिष्टता उत्पन्न नहीं होती, तब तक यह न तो स्वतंत्र तथा पूर्ण शास्त्र है और न यह अन्य सामाजिक संबंधों का समन्वय ही है, जो उनके द्वारा खोजे हुए सिद्धांतों में शाब्दिक संवर्द्धन करता है।”
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