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समाजशास्त्र को परिभाषित कीजिए तथा इसके विकास की संक्षिप्त विवेचना कीजिए।

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किसी भी विज्ञान अथवा शास्त्र के विषय में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने से पूर्व आवश्यक होता है कि उस विज्ञान अथवा शास्त्र की एक समुचित परिभाषा निर्धारित कर ली जाए। परिभाषा के निर्धारण से शास्त्र अथवा विज्ञान की सीमाएँ निश्चित हो जाती हैं। निश्चित सीमाओं के अंतर्गत अध्ययन करना सरल होता है। साथ ही, सीमित क्षेत्र का अध्ययन अपेक्षाकृत अधिक व्यवस्थित तथा शुद्ध भी होता है। समाजशास्त्र भी इस सामान्य नियम का अपवाद नहीं है।

समाजशास्त्र के इतिहास पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि यह एक नवविकसित सामाजिक, विज्ञान है। सर्वप्रथम इस शब्द का प्रयोग फ्रांसीसी विद्वान ऑगस्त कॉम्टे (Auguste Comte) ने 1838 ई० में किया। इसलिए कॉम्टे को समाजशास्त्र का पिता’ कहा जाता है। इन्होंने सर्वप्रथम इस विषय को ‘सामाजिक भौतिकी’ कहा। अन्य विद्वानों द्वारा इस शब्द को स्वीकार न किए जाने पर कॉम्टे ने ‘सामाजिक भौतिकी’ के स्थान पर ‘समाजशास्त्र’ शब्द का प्रयोग किया और इसी नाम से यह विषय आज भी जाना जाता है। इसका इतिहास केवल 167-68 वर्ष का है। नवविकसित विज्ञान होने के कारण समाजशास्त्र का क्षेत्र पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं हो सकता है। विभिन्न विद्वानों में इस विषय को लेकर मतभेद है। इसी मतभेद के कारण भिन्न-भिन्न विद्वानों ने समाजशास्त्र को अलग-अलग प्रकार से परिभाषित किया है।

समाजशास्त्र का अर्थ एवं परिभाषाएँ

‘समाजशास्त्र’ को अंग्रेजी में ‘sociology’ कहा जाता है, जो दो शब्दों ‘सोशियो’ (Socio) तथा ‘लोजी’ (Logy) से मिलकर बना है। ‘सोशियो’ लैटिन भाषा के socius’ शब्द से बना है जिसका अर्थ ‘समाज’ है और ‘लोजी’ ग्रीक भाषा के logos’ शब्द से बना है जिसका अर्थ ‘विज्ञान’ या ‘शास्त्र’ है। इस प्रकार, शाब्दिक अर्थ में समाजशास्त्र वह विषय या विज्ञान है, जिसमें समाज का अध्ययन किया जाता है, परंतु समाजशास्त्र के अर्थ को पूर्ण रूप से समझने के लिए समाज’ और ‘विज्ञान’ का अर्थ समझना आवश्यक है।

⦁    समाज का अर्थ–प्रायः व्यक्तियों के समूह को समाज माना जाता है, परंतु यह धारणा त्रुटिपूर्ण है। केवल व्यक्तियों के समूह को ही समाज नहीं कहा जा सकता, वरन् व्यक्तियों का वह समूह समाज है जिसके सदस्यों के मध्य पारस्परिक मानसिक या सामाजिक संबंध होते हैं और ये संबंध अमूर्त होते हैं। इस प्रकार विभिन्न व्यक्तियों के मध्य स्थापित होने वाले सामाजिक संबंधों * की अमूर्त व्यवस्था को समाज कहा जाता है।
⦁    विज्ञान का अर्थकिसी भी विषय के व्यवस्थित और क्रमबद्ध ज्ञान को विज्ञान कहा जाता है। विज्ञान में निरीक्षण और पर्यवेक्षण के द्वारा विभिन्न समानताओं की खोज की जाती है तथा प्राप्त परिणामों के आधार पर सिद्धांतों का प्रतिपादन किया जाता है और उन्हें ज्ञान के क्षेत्र में व्यवस्थित और संगठित किया जाता है। इस प्रकार, समाज और विज्ञान के अर्थों का स्पष्टीकरण करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि समाजशास्त्र वह विज्ञान है, जिसमें सामाजिक संबंधों का क्रमबद्ध, व्यवस्थित और वैज्ञानिक रूप में अध्ययन किया जाता है। अध्ययन का अर्थ है कि इसकी विषय-वस्तु को समझा और समझाया जा सकता है तथा किसी प्रकार का संदेह होने पर नवीन प्रमाण एकत्र करके उसे दूर किया जा सकता है। विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं से समाजशास्त्र के स्वरूप को ठीक प्रकार से समझा
जा सकता है। समाजशास्त्र की कोई एक सर्वमान्य परिभाषा नहीं है। विभिन्न विद्वानों ने इसे भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से परिभाषित किया। इसी परिभाषाओं को हम अपनी सुविधा के लिए निम्नांकित श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं-

(अ) समाजशास्त्र समाज का अध्ययन है।
कुछ विद्वानों के अनुसार समाजशास्त्र समाज को विज्ञान है। इन विद्वानों ने समाजशास्त्र की परिभाषा समाज को प्रमुख आधार मानकर इस प्रकार दी है-

⦁    ओडम (Odum) के अनुसार–“समाजशास्त्र वह विज्ञान है, जो समाज का अध्ययन करता है।”
⦁    वार्ड (Ward) के अनुसार-“समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है।”
⦁    जिंसबर्ग (Ginsberg) के अनुसार-“समाजशास्त्र समाज के अध्ययन के रूप में परिभाषित | किया जा सकता है।
⦁    गिडिंग्स (Giddings) के अनुसार-“समाजशास्त्र समग्र रूप से समाज का क्रमबद्ध वर्णन तथा व्याख्या है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं में समाजशास्त्र को समाज के अध्ययन के रूप में प्रतिपादित किया गया है। समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ ही समाज का अध्ययन नहीं है अपितु अनेक विद्वानों ने इसे इसी आधार पर परिभाषित भी किया है। ये परिभाषाएँ समाजशास्त्र के मूल अर्थ के निकट होते हुए भी पर्याप्त स्पष्ट एवं वैज्ञानिक नहीं है, क्योंकि इन परिभाषाओं में कहीं भी ‘समाज’ की संकल्पना को स्पष्ट नहीं किया गया है।

( ब ) समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों का अध्ययन है
कुछ विद्वानों ने समाजशास्त्र की परिभाषा सामाजिक संबंधों के अध्ययन के रूप में की है। इन विद्वानों के अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन है। सामाजिक संबंधों के ताने-बाने को ही समाज कहते हैं; अत: समाज को समझने के लिए सामाजिक संबंधों को समझना आवश्यक है। ऐसी प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

⦁    मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) के अनुसार-–“समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के विषय में है (तथा) इन संबंधों के जाल को हम ‘समाज कहते हैं।”
⦁    रोज (Rose) के अनुसार–“समाजशास्त्र मानव संबंधों का विज्ञान है।”
⦁    ग्रीन (Green) के अनुसार-“समाजशास्त्र संश्लेषणात्मक और सामान्यीकरण करने वाला वह विज्ञान है जो मनुष्यों और सामाजिक संबंधों का अध्ययन करता है।”
⦁    क्यूबर (Cuber) के अनुसार-“समाजशास्त्र को मानव-संबंधों के वैज्ञानिक ज्ञान के ढाँचे के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”
⦁    सिमेल (Simmel) के अनुसार-“समाजशास्त्र मानव-अंतर्सम्बन्धों के स्वरूपों का विज्ञान है।”
उपर्युक्त विभिन्न परिभाषाओं में समाजशास्त्र को उस सामाजिक विज्ञान के रूप में प्रतिपादित किया गया है, जिसके अंतर्गत सभी प्रकार के सामाजिक संबंधों का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। सामाजिक संबंधों को आधार मानकर दी गई परिभाषाएँ समाजशास्त्र के अर्थ को पर्याप्त सीमा तक स्पष्ट करती हैं।

(स) समाजशास्त्र सामाजिक जीवन और घटनाओं का अध्ययन है।
कुछ समाजशास्त्रियों के अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक जीवन, व्यवहारों, कार्यों तथा घटनाओं का अध्ययन है। ये विद्वान समाजशास्त्र को अग्रलिखित रूपों में परिभाषित करते हैं-

⦁    किम्बल यंग (Kimball Young) के अनुसार-“समाजशास्त्र समूहों में मनुष्य के व्यवहार का अध्ययन करता है।
⦁    बेनेट एवं ट्यूमिन (Beanet and Tumin) के अनुसार-“समाजशास्त्र सामाजिक जीवन के ढाँचे और कार्यों का विज्ञान है।”
⦁    ऑगर्बन एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार-“समाजशास्त्र सामाजिक जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन है।’
उपर्युक्त परिभाषाओं में समाजशास्त्र को मुख्य रूप से सामाजिक जीवन और सामाजिक घटनाओं के वैज्ञानिक अध्ययन के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

(द) समाजशास्त्र की अन्य परिभाषाएँ
समाज, सामाजिक संबंधों, सामाजिक जीवन तथा सामजिक घटनाओं के अतिरिक्त भी अनेक आधारों को समाजशास्त्र को. परिभाषित करने के लिए अपनाया गया है। ऐसी प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

⦁    वेंबर (Weber) के अनुसार-“समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो कि सामाजिक क्रियाओं की . अर्थपूर्ण व्याख्या करते हुए उन्हें समझने का प्रयास करता है।”
⦁    जॉनसन (Johnson) के अनुसार-समाजशास्त्र वह विज्ञान है, जो सामाजिक समूहों, उनके
आन्तरिक स्वरूपों या संगठन के स्वरूपों तथा उन प्रक्रियाओं को जो इस संगठन के स्वरूपों को बनाए रखती हैं या परिवर्तित करती है और समूहों के बीच पाए जाने वाले संबंधों का अध्ययन करता है।”
⦁    पारसन्स (Parsons) के अनुसार-“समाजशास्त्र वह विज्ञान है, जो सामाजिक कार्यों का व्याख्यात्मक अध्ययन करने का प्रयास करता है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि समाजशास्त्र समाज, सामाजिक संबंधों, सामाजिक जीवन, सामाजिक घटनाओं, सामाजिक क्रियाओं, सामाजिक समूहों तथा सामाजिक कार्यों इत्यादि का क्रमबद्ध अध्ययन करने वाला विज्ञान है।

समाजशास्त्र का उद्गम एवं विकास

व्यक्ति अपने स्वभाव के कारण एक जिज्ञासु प्राणी है और इसी जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण उसने प्रारंभ से ही अपने समय में प्रचलित विविध प्रकार की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं को समझने का प्रयास किया है। भारत के प्राचीन ग्रंथों में समाज के विभिन्न पहलुओं का उल्लेख विविध प्रकार से किया गया है। उदाहरणार्थ-वैदिक साहित्य एवं हिंदू शास्त्रों (जैसे उपनिषदों, महाभारत एवं गीता आदि ग्रंथों) में वर्ण एवं जाति व्यवस्था, संयुक्त परिवार प्रणाली, आश्रम व्यवस्था, विभिन्न संस्कारों तथा ऋण व्यवस्था जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण सामाजिक पहलुओं का विधिवत् विवरण मिलता है। जो कि आज के समाजशास्त्रीय विश्लेषणों के किसी भी मापदंड से कम नहीं है। अरस्तू की पुस्तक ‘पॉलिटिक्स’, प्लेटो की ‘रिपब्लिक’ तथा कौटिल्य का अर्थशास्त्र’ आदि ऐसे ग्रंथ हैं जिनमें समाज के विभिन्न पहलुओं की चर्चा की गई है।

यद्यपि सामाजिक पहलुओं के अध्ययन की एक लंबी परंपरा रही है, फिर भी समाजशास्त्र विषय का एक संस्थागत विषय के रूप में उद्भव एवं विकास 19वीं शताब्दी में हुआ जबकि ऑगस्त कॉम्टे ने सर्वप्रथम 1838 ई० में ‘समाजशास्त्र’ शब्द का प्रयोग किया। इनका विचार था कि कोई भी विषय ऐसा नहीं है जो कि समाज के विभिन्न पहलुओं का समग्र रूप में अध्ययन कर सकता हो। इस कमी को दूर करने के लिए इन्होंने इस नवीन विषय का निर्माण किया। उन्नीसवीं शताब्दी के समाजशास्त्र को यद्यपि निश्चयात्मक (Positive) विज्ञान माना गया है जिसका प्रभाव प्राकृतिक विज्ञानों के समान था, फिर भी यह इतिहास के दर्शन एवं जैविक सिद्धांतों के प्रभाव के कारण उविकासवादी था। साथ ही इसमें मनुष्य के संपूर्ण जीवन एवं संपूर्ण इतिहास से संबंधित अध्ययन किए जाते थे अर्थात् इसकी प्रकृति विश्वकोशीय थी। 19वीं शताब्दी में समाजशास्त्र के विकास में अनेक बौद्धिक एवं भौतिक परिस्थितियों ने सहायता प्रदान की, जिनमें से चार बौद्धिक परिस्थितियों को टी० बी० बॉटोमोर (T.B. Bottomore) ने महत्त्वपूर्ण माना है। ये परिस्थितियाँ निम्नलिखित हैं-

⦁    राजनीति का दर्शन (Political philosophy)
⦁    इतिहास का दर्शन (The philosophy of history)
⦁    उविकास के जैविक सिद्धांत (Biological theories of evolution) तथा
⦁    सामाजिक एवं राजनीतिक सुधारात्मक आंदोलन (The movements for social and political reform)

इनमें से दो, इतिहास के दर्शन तथा सामाजिक सर्वेक्षण (जो कि आंदोलनों के परिणामस्वरूप शुरू हुए), ने प्रारंभ में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। एक विशिष्ट शाखा के रूप में इतिहास का दर्शन अठारहवीं शताब्दी की देन है जिसे अबे डे सेंट-पियरे (Abbe de saint-Pieare) तथा ग्यिम्बाटिसटा विको (Giambattista Vico) ने शुरू किया। प्रगति के जिस सामान्य विचार को निर्मित करने का इन्होंने प्रयत्न किया उसने मानव की इतिहास संबंधी धारणा को गंभीर रूप से प्रभावित किया। फ्रांस में मॉण्टेस्क्यू (Montesquieu) और वॉल्टेयर (Voltaire), जर्मनी में हर्डर (Herder) तथा स्कॉटिश इतिहासज्ञों एवं दार्शनिकों; जैसे फग्र्युसन (Ferguson), मिलर (Millar), रॉबर्टसन (Robertson) इत्यादि की रचनाओं में इतिहास के दर्शन का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में हीगल (Hegel) तथा सेंट साइमन (Saint Simon) के लेखों के परिणामस्वरूप इतिहास का दर्शन एक प्रमुख बौद्धिक प्रभाव बन गया। इन्हीं दोनों विचारकों से कार्ल माक्र्स (Karl Marx) तथा ऑगस्त कॉम्प्टे (Auguste Comte) की रचनाएँ विकसित हुईं। समाज की नवीन धारणा, जो कि राज्य की धारणा से भिन्न है, दार्शनिक इतिहासकारों की ही देन है। आधुनिक समाजशास्त्र के विकास में सहायक दूसरा महत्त्वपूर्ण तत्त्व सामाजिक सर्वेक्षण कहा जा सकता है जिसके दो प्रमुख स्रोत थे—प्रथम, यह विश्वास के प्राकृतिक विज्ञान की पद्धतियों को सामाजिक घटनाओं एवं मानव क्रियाकलापों के अध्ययन में प्रयुक्त किया जा सकता है और दूसरा, यह विश्वास कि गरीबी प्रकृति या दैवीय प्रकोप नहीं है अपितु मानव प्रयास द्वारा इसे दूर किया जा सकता है। इन दोनों विश्वासों के परिणामस्वरूप समाज-सुधारक के लिए किए गए इन आंदोलनों का 18वीं तथा 19वीं शताब्दी के पश्चिमी यूरोप की सामाजिक परिस्थितियों से प्रत्यक्ष संबंध था। सामाजिक परिवर्तन में रुचि के कारण ऐतिहासिक तथा सामाजिक आंदोलनों की ओर ध्यान दिया जाने लगा। अनेक विद्धानों; जैसे बाल्डरीज (Baldridge) ने उन सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक दशाओं का भी वर्णन किया है जिन्होंने समाजशास्त्र के विकास को प्रेरित किया है। ये दशाएँ निम्नलिखित हैं-

⦁    वैज्ञानिक क्रांति-वैज्ञानिक क्रांति के परिणामस्वरूप वैज्ञानिक पद्धति की श्रेष्ठता सिद्ध हो चुकी थी और पश्चिमी यूरोप में नित्य नए आविष्कार हो रहे थे। अध्ययन के लिए तथ्यों के अवलोकन, वर्गीकरण एवं विश्लेषण की यह पद्धत समाज एवं सामाजिक जीवन के अध्ययन के लिए भी उपयोगी एवं आवश्यक समझी जाने लगी थी।
⦁    प्रौद्योगिकीय क्रांति-वैज्ञानिक आविष्कारों का उत्पादन के यंत्रों के क्षेत्र में प्रयोग होने लगा था। कपड़े की बुनाई के क्षेत्र में वृहत् मशीनों के प्रयोग ने एक नई क्रांति को जन्म दिया। इसी प्रकार, यंत्रों को चलाने के लिए शक्ति के नए साधन भी खोज निकाले गए थे; जैसे-भाप, डीजल आदि। इससे उत्पादन के क्षेत्र में प्रौद्योगिकीय क्रांति का सूत्रपात हुआ और पुराने तरीके बेकार सिद्ध होने लगे तथा प्रौद्योगिकीय क्रांति के प्रभावों को समझने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी।
⦁    औद्योगिक क्रांति-विज्ञान और तकनीकी के प्रयोग ने औद्योगिक क्रांति को जन्म दिया और बड़ी मशीनों द्वारा वृहत् स्तर पर उत्पादन प्रारंभ हुआ। परिणामतः पुरानी लघु उत्पादन व्यवस्था समाप्त होने लगी। सामाजिक व्यवस्था चरमराने लगी। औद्योगिक केंद्रों में बड़ी संख्या में श्रमिकों का संकेंद्रण बढ़ गया। कृषि के स्थान पर उद्योग धन का स्रोत बन गए। नई सामाजिक संरचना की आवश्यकता महसूस होने लगी। बढ़ती हुई बेकारी और गरीबी तथा श्रमिकों की निम्न दशा ने सामाजिक विचारकों को प्रेरित किया कि वे तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था पर पुनर्विचार करें।
⦁    बाजारों का विस्तार एवं साम्राज्यवाद–इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन आदि देशों में बने माल की खपत के लिए और कच्चे माल की तलाश में, विदेशों में व्यापार के क्षेत्र खोजने की होड़ लग गई। भाप द्वारा चालित जहाजों के द्वारा विदेशी व्यापार सरल हो गया। अनेक व्यापारिक कंपनियाँ स्थापित की गई जो अमेरिका, एशिया तथा अफ्रीका के देशों में पहुँची। ये व्यापारिक कंपनियाँ अपने माल की सुरक्षा के लिए अपनी फौज भी रखती थी। धीरे-धीरे साम्राज्यवाद की प्रवृत्ति बढ़ गई। साथ ही साम्राज्य को बनाए रखने के लिए विजित देश के मूल निवासियों की भाषा, रीति-रिवाज आदि का अध्ययन भी किया गया। परिणामतः विभिन्न समाजों के संबंध में बहुमूल्य सामाजिक तथ्य एकत्र हो गए और एक पृथक् सामाजिक विज्ञान की आवश्यकता महसूस होने लगी।
⦁    राजनीतिक क्रांति-इंग्लैंड और फ्रांस में बढ़ते हुए उद्योगवाद ने सामंतवादी व्यवस्था को चुनौती दी और वहाँ प्रजातांत्रिक क्रांतियाँ घटित हुईं। राजा और सामंतों के विरुद्ध मानव के समानता, भ्रातृत्व, स्वतंत्रता और मूल अधिकारों के लिए घटित हुई इन खूनी क्रांतियों ने पुरानी सामाजिक व्यवस्था की जड़े हिला दी। नई संरचना क्या हो?—यह प्रश्न, चिंतकों के लिए मूल प्रश्न बन गया। समाजशास्त्र का विकास इस प्रश्न से जुड़ा है।
⦁    समाज सुधार आंदोलन–स्पष्ट है कि यूरोप और अमेरिका के देशों में, जहाँ इतनी क्रांतिकारी घटनाएँ हो रही हों, अनेक सामाजिक समस्याएँ पैदा हो गई थीं। भूखमरी और बेकारी सबसे बड़ी समस्याएँ थीं। इन समस्याओं को हल करने के लिए अनेक समाज सुधार आंदोलन हुए। ये आंदोलन नई विचारधारा एवं लक्ष्य सामने रख रहे थे। इनके नेता अपने पक्ष-पोषण में, तथ्यों के रूप में प्रमाण प्रस्तुत कर रहे थे। समाज के प्रति एक नया दृष्टिकोण विकसित हो रहा था। उपर्युक्त समसामयिक दशाओं ने फ्रांस के सेण्ट साइमन, जर्मनी के कार्ल मार्क्स जैसे विचारकों को जन्म दिया, जिन्होंने एक नए सामाजिक विज्ञान की रूपरेखा प्रस्तुत की। ऑगस्त कॉम्टे ने इस नए विज्ञान का नामकरण किया, जबकि स्पेंसर और दुर्णीम ने उसे प्रतिष्ठित किया।

बॉटोमोर (Bottomore) का कहना है कि इस प्रकार समाजशास्त्र का पूर्व इतिहास सौ वर्षों की उम्र अवधि से संबंधित है जो लगभग 1740 ई० से 1850 ई० तक की है। इन्होंने 19वीं शताब्दी में विकसित समाजशास्त्र की तीन विशेषताओं का भी उल्लेख किया है-

⦁    यह विश्वकोशीय (Encyclopaedic) था;
⦁    यह उविकासवादी (Evolutionary) था तथा
⦁    यह निश्चयात्मक (Positive) था।

समाजशास्त्र के विकास में प्रारंभिक विद्वानों की समाज-सुधार में रूचि ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1880 ई० से 1920 ई० के काल में तीव्र औद्योगीकरण के कारण सामाजिक परिवर्तन के अध्ययनों में रुचि विकसित हुई तथा 20वीं शताब्दी के प्रारंभ तक इसे विज्ञान की स्थिति प्राप्त हो गई। समाज-सुधार तथा सामाजिक अनुसंधान के घनिष्ठ संबंध के परिणामस्वरूप आनुभविक अनुसंधान को प्रोत्साहन मिला तथा नीति-निर्माण करने वालों ने समस्याओं के समाधान के लिए समाजशास्त्रियों की ओर देखना शुरू कर दिया जिससे व्यावहारिक अनुसंधान प्रारंभ हुए। हेरी एम० जॉनसन (Harry M.Johnson) के अनुसार, आज समाजशास्त्र निश्चित रूप से एक विज्ञान है यद्यपि यह अन्य विज्ञानों से थोड़ा पिछड़ा हुआ है। इसमें विज्ञान की निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती हैं-

⦁    समाजशास्त्र आनुभविक (Empirical) है, क्योंकि यह तार्किक चिंतन पर आधारित है।
⦁    यह सैद्धांतिक (Theoretical) है, क्योंकि इसमें घटनाओं के कार्य-कारण संबंधों के आधार पर नियम बनाए जाते हैं।
⦁    यह संचयी (Cumulative) है अर्थात् समाजशास्त्रीय सिद्धांत एक के आधार पर दूसरे बनते हैं।
⦁    यह नैतिकता मुक्त (Nonethical) है अर्थात् समाजशास्त्री का कार्य तथ्यों की व्याख्या करना है, उन्हें अच्छा या बुरा बताना नहीं।

फ्रांस के पश्चात् अमेरिका में समाजशास्त्र का अध्ययन-कार्य सर्वप्रथम 1876 ई० में ‘येल विश्वविद्यालय से प्रारंभ हुआ और इस विषय का सर्वाधिक विकास अमेरिका में ही हुआ है। अमेरिकी समाजशास्त्रियों में समनर, रॉस, सोरोकिन, ऑगबर्न एवं निमकॉफ, मैकाइवर एवं पेज, यंग, लुंडबर्ग, जिमरमैन, पारसंस, मर्टन, किंग्स्ले डेव्रिस आदि प्रमुख हैं। आज यद्यपि फ्रांस, अमेरिका, इंग्लैंड तथा जर्मनी में समाजशास्त्र एक सर्वाधिक लोकप्रिय विषय है, फिर भी संसार में शायद ही कोई ऐसा देश हो जिसमें आज समाजशास्त्र का अध्ययन न हो रहा हो।



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