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समाजवाद के विरोध में तर्क दीजिए।

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समाजवाद के विरोध में तर्क निम्नवत् हैं-
⦁    व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अन्त – राज्य के कार्य-क्षेत्र का विस्तार व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अन्त का परिचायक है। योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था में सभी वस्तुएँ राज्य द्वारा नियन्त्रित होती हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति स्वतन्त्र होने के स्थान पर राज्य का गुलाम बन जाता है। हेयक ने उचित ही कहा है, “पूर्ण नियोजन का आशय पूर्ण गुलामी है।”
⦁    पूर्ण समानता असम्भव – समाजवाद समानता पर आधारित विचारधारा है। प्रकृति ने समस्त व्यक्तियों को समान उत्पन्न नहीं किया। जन्म से कुछ व्यक्ति बुद्धिमान तो कुछ मूर्ख, कुछ स्वस्थ तो कुछ अस्वस्थ, कुछ परिश्रमी तो कुछ आलसी होते हैं। इन सभी को समान समझना प्राकृतिक सिद्धान्त की अवहेलना करना है। पूर्ण समानता स्थापित नहीं की जा सकती।
⦁    कार्य करने की प्रेरणा का अन्त – व्यक्तियों को श्रम करने की प्रेरणा इस भावना से मिलती है कि वे व्यक्तिगत सम्पत्ति का संचय कर सकेंगे। समाजवादी व्यवस्था में उत्पादन एवं वितरण के साधनों पर राजकीय नियन्त्रण का परिणाम यह होता है कि व्यक्तियों में कार्य करने की प्रेरणा का अन्त हो जाता है।
⦁    नौकरशाही का महत्त्व – समाजवाद में राज्य के कार्यों में बढ़ोतरी होने के कारण नौकरशाही का महत्त्व बढ़ता है तथा समस्त फैसले शासकीय कर्मचारियों द्वारा लिए जाते हैं। वह जन इच्छाओं एवं आवश्यकताओं की इतनी चिन्ता नहीं करते जितनी अपने स्वार्थों की। ऐसी परिस्थिति में भ्रष्टाचार बढ़ता है।
⦁    समाजवाद से हिंसा को बढावा – समाजवाद अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु क्रान्तिकारी तथा हिंसात्मक मॉग को अपनाता है। वह शान्तिपूर्ण तरीकों में आस्था नहीं रखता। समाजवाद के द्वारा वर्ग-संघर्ष पर बल देने के परिणामस्वरूप समाज में विभाजन एवं वैमनस्यता की भावना फैलती है।
⦁    उत्पादन का श्रेय श्रमिकों को देना त्रुटिपूर्ण – उत्पादन का श्रेय केवल श्रमिकों को देना न्यायसंगत नहीं है। उत्पादन में श्रम के अलावा पूँजी तथा संसाधन इत्यादि भी आवश्यक होते हैं तथा स्थूल रूप में इन सभी को पूँजी ही कहा जा सकता है।
⦁    समाजवाद लोकतन्त्र विरोधी – समाजवाद की प्रवृत्ति जहाँ व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर अंकुश लगाती है, वहीं लोकतन्त्र का आधार ही व्यक्ति की स्वतन्त्रता है। लोकतन्त्र में व्यक्ति के अस्तित्व को अत्यन्त उत्तम स्थान प्राप्त है, जबकि समाजवाद में वह राज्यरूपी विशाल मशीन में एक निर्जीव पुर्जा बन जाता है।
⦁    उग्र राष्ट्रीयता का विकास – समाजवाद किसी राष्ट्रीय सीमा पर विश्वास नहीं करता। वह विश्व के सर्वहारा वर्ग को एक झण्डे के नीचे इकट्ठा करना चाहता है तथा राष्ट्रीयता की भावना से ऊपर उठाकर श्रमिकों को राज्य से लड़ाना चाहता है। मार्क्स के अनुसार, “राज्य ने सदैव ही पूँजीपतियों, सामन्तों तथा शोषक वर्ग का साथ दिया है। आज राष्ट्रवाद प्रधान और समाजवाद गौण है।’



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