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सन् 1857 ई० की क्रान्तिकारी घटना के बाद भारतीयों में असन्तोष उत्पन्न होने की कई घटनाएँ हुईं। उनमें से निम्नलिखित दो पर प्रकाश डालिए(क) वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट तथा(ख) इल्बर्ट बिल (विधेयक)। इन पर भारतीयों की क्या प्रतिक्रिया हुई ?

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() वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट  उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में अनेक अंग्रेजी दैनिक पत्रों की स्थापना हुई। भारतीय भाषाओं में भी समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं को आरम्भ हुआ। धीरे-धीरे भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के लगभग 500 पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन होने लगा। इन पत्र-पत्रिकाओं ने जनता में राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। बाल गंगाधर तिलक द्वारा स्थापित मराठी पाक्षिक पत्र तथा केसरी ऐसा ही पत्र था।

भारतीय प्रेस पर सेंसर लगाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने समय-समय पर अनेक कानून बनाये। ऐसा ही एक कानून 1878 ई० में लिटन ने ‘वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट’ पास करवे रतीय भाषाओं में प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्रों पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

भारतीयों की प्रतिक्रिया-समाचार-पत्रों पर कठोर प्रतिबन्ध लगाने से बुद्धिजीवी वर्ग में ब्रिटिश शासन के प्रति आक्रोश और स्वराष्ट्र के प्रति अनुराग बढ़ा। लोकमान्य तिलक के केसरी व मराठा समाचार-पत्र अब अंग्रेजों के प्रति आग उगलने लगे।

(ख) इल्बर्ट बिल (विधेयक) – सन् 1873 ई० के फौजदारी दण्ड संहिता के अन्तर्गत किसी भी भारतीय न्यायाधीश को यूरोपीय अपराधियों के मुकदमे सुनने का अधिकार नहीं था। यह पूर्ण रूप से अन्याय था तथा उच्च पदों पर आसीन भारतीयों को असहनीय था। रिपन ने इस अन्याय को दूर करने के उद्देश्य से अपनी परिषद् के विधि सदस्य इल्बर्ट की सहायता के लिए एक बिल पारित कराने का प्रयास किया। अत: 2 फरवरी, 1883 ई० को एक बिल प्रस्तुत किया गया। विधेयक का उद्देश्य था कि जाति-भेद पर आधारित सभी न्यायिक अयोग्यताएँ तुरन्त समाप्त कर दी जाएँ और भारतीय तथा यूरोपीय न्यायाधीशों की शक्तियाँ समान कर दी जाएँ। परन्तु जैसे ही बिल प्रस्तुत हुआ, उसका घोर विरोध किया गया। यूरोपियनों के कड़े विरोध के सम्मुख रिपन को झुकना पड़ा और यह बिल पास नहीं हो सका।

भारतीयों की प्रतिक्रिया – इस बिल के पास न होने से भारतीयों में निराशा की लहर दौड़ गयी। उन्हें अब अंग्रेजों से किसी प्रकार के न्याय की उम्मीद न रही, लेकिन इससे भारतीयों में राजनीतिक चेतना का संचार हुआ। इस विधेयक और इसके विरोध में किये गये आन्दोलन ने भारतीय राष्ट्रीयता पर जो प्रभाव डाला, वह प्रभाव विधेयक के मूल रूप में पास होने पर कभी नहीं हो सकता था।

यद्यपि आजाद हिन्द फौज भारत को स्वतन्त्र कराने में सफल न हो सकी, फिर भी सुभाषचन्द्र बोस और आजाद हिन्द फौज की गतिविधियों ने देश में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष को शक्ति अवश्य प्रदान की।



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