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“सन यात-सेन आधुनिक चीन के निर्माता थे।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।(या) क्या आप सन यात-सेन को आधुनिक चीन का कल्पनावादी थार्थवादी निर्माणकर्ता मानते हैं? (या) सन यात-सेन के कार्यों और उपलब्धियों का मूल्यांकन कीजिए।

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सन यात-सेन के कार्यों का मूल्यांकन

सन यात-सेन को आधुनिक चीन का जन्मदाता, निर्माता तथा महान् क्रान्तिकारी माना जाता है। आधुनिक चीन के निर्माता डॉ० सन यात-सेन की 1925 ई० में मृत्यु के समय ऐसा लगता था कि उनके द्वारा क्रान्ति के प्रति किए गए सभी प्रयास असफल हो गए हैं परन्तु शीघ्र ही उनके विचारों ने सफलता प्राप्त की। आज चीन का प्रत्येक राजनीतिक दल अपने को सन यात-सेन का सच्चा अनुयायी समझ कर गौरव का अनुभव करता है। चीन के विशाल और बड़े भू-भाग पर मार्शल च्यांग काई शेक ने अनेक वर्षों तक डॉ० सन यात-सेन के नाम पर इस प्रकार राज्य किया जिस प्रकार खलीफा मुहम्मद उमर ने पैगम्बर मुहम्मद के नाम पर राज्य किया था। इतना ही नहीं, चीन के साम्यवादी नेता माओ-त्से-तुंग ने भी अपनी सफलता के लिए डॉ० सन यात-सेन के नाम का उपयोग किया। इस प्रकार सन यात-सेन का चरित्र और व्यक्तित्व महान् था। चीन उनकी अमूल्य सेवाओं को कभी भुला नहीं पाएगा। संक्षेप में उनका मूल्यांकन इस प्रकार से किया जा सकता है।

1. महान संगठनकर्ता :
संन यात-सेन एक उच्च संगठनकर्ता थे। उन्होंने मंचू राजवंश का अन्त करने और चीन में गणतंन्त्र की स्थापना करने के लिए क्रान्तिकारी संस्था तुंग-मिंग-हुई का संगठन किया था और बाद में उन्होंने कुओमीनतांग दल का पुनर्गठन किया था।

2. महान् देशभक्त :
सन यात-सेन एक सच्चे देशभक्त थे। उन्होंने देश के एकीकरण और संगठन के लिए अपना सब कुछ बलिदान कर दिया था। 1911 ई० में वे राष्ट्रपति चुने गए थे। लेकिन उन्होंने देश की एकता को बनाए रखने के लिए युआन शी-काई के पक्ष में राष्ट्रपति पद से त्याग-पत्र दे दिया था। इसी प्रकार 1924 ई० में वे चीन की एकता के लिए ही अस्वस्थ होने पर भी पीकिंग वार्ता में भाग लेने गए थे और जब उन्हें सफलता न मिली तो उनको गहरा आघात पहुँचा और उसी से नका निधन हो गया। इसके साथ-ही-साथ उन्होंने देश में राष्ट्रीय एकता की स्थापना के लिए राष्ट्रीयता की भावना का प्रचार अपने सिद्धान्तों से किया और देश की जनता में राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत की।

3. परम लोकतन्त्रवादी : 
डॉ० सेन के आधुनिक चीन में जागरण को लाने के लिए बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। वे लोकतन्त्र के कट्टर समर्थक थे और जनता की शक्ति में उनका पूर्ण विश्वास था। उन्होंने राजनीतिक लोकतन्त्र के सिद्धान्त पर प्रतिपादन कर देश का एकीकरण करने का प्रयास किया था।

4. दो विरोधी गुणों का चरित्र :
सन यात-सेन के विषय में मुख्य रूप से दो प्रकार की विचारधाराएँ पाई जाती हैं। कुछ आलोचकों को कहना है कि सेन कल्पना की उड़ान भरने वाले राष्ट्रवादी थे। व्यक्ति कल्पना के संसार में जीवन की वास्तविकता तथा यर्थाथता से दूर चला जाता है। इस प्रकार का मत सेन के विषय में प्रस्तुत किया जाता है कि उनकी क्रान्तिकारी योजनाएँ परिस्थितियों के प्रतिकूल होती थीं, जिसके कारण उन्हें अपने जीवन में अनेक बार सफलताओं का सामना करना पड़ा। वे लोकतन्त्र के पक्के समर्थक थे परन्तु यह समझ में नहीं आता कि वे चीन की जनता को किस प्रकार लोकतन्त्र स्थापित करने और उसे कायम रखने के लिए तैयार समझते थे।

देश में गणतन्त्र स्थापित करने के मार्ग में अनेक कठिनाइयाँ थीं। देश की अधिकांश जनता अशिक्षित थी, एकता की प्रतीक राष्ट्रीय भावना का देश में पूर्ण अभाव था, देश की भाषा की लिपि बहुत कठिन और न समझने योग्य थी, यातायात के साधनों की भारी कमी थी, लोगों में गरीबी और भुखमरी फैली हुई थी तथा वे हमेशा अपने भोजन की चिन्ता में लीन रहते थे। इतना सब कुछ होने पर सेन चीन में गणतन्त्र की स्थापना के समर्थक थे जबकि गणतन्त्र की सफलता के लिए देश में शिक्षित तथा जनहित और राष्ट्र-निर्माण के कार्यों में रुचि लेने वाली जनता का होना आवश्यक होता है। कुछ आलोचकों का मत इसके ठीक विपरीत है। उनका कहना है कि सेन कल्पना के संसार में विचरण करने वाले विचारक न होकर एक सच्चे क्रान्तिकारी थे। उन्होंने हमेशा ही क्रान्ति के लिए सक्रिय कार्य किया।

देश के विभिन्न दलों को एकता के सूत्र में बाँधकर राजवंश विरोधी विद्रोहों का आयोजन किया। देश की जनता में नई चेतना और नए जागरण का संदेश प्रसारित किया। विदेशों में निवास करने वाले चीनियों को संगठित किया तथा चीन में गणतन्त्र की स्थापना कराई। जब गणतन्त्र के प्रथम राष्ट्रपति युआन शी-काई ने लोकतन्त्र के साथ विश्वासघात किया तो सबसे पहले युआन को राष्ट्रपति पद दिलवाने वाले सन यात-सेन ने ही उसका कड़ा विरोध किया और देश में पुन: राजतन्त्र स्थापित न होने दिया। उन्होंने देश का पथ-प्रदर्शन करने के लिए देश की एकमात्र राष्ट्रीय संस्था कुओमीनतांग का पुनर्गठन किया।

इसके अतिरिक्त उन्होंने देश को एकता के सूत्र में बाँधने के लिए राष्ट्रीय की पवित्र भावनाओं का प्रचार किया। चीनी जनता को विकास के मार्ग पर ले जाने के लिए उन्होंने देश को इतिहास-प्रसिद्ध अपने तीन सिद्धान्तों का मूल मन्त्र दिया जिसे चीनी जनता ने अपने धर्मग्रन्थ के रूप में स्वीकार किया। इन दोनों विचारधाराओं का अध्ययन करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वास्तव में डॉ० सन यात-सेन असाधारण व्यक्तित्व में आदर्शवाद और यथार्थवाद का सुन्दर सम्मिश्रण था।

5. सन यात-सेन का मूल्यांकन :
डॉ० सन यात-सेन को अपने जीवन में सफलताओं की अपेक्षा असफलताओं का अधिक सामना करना पड़ा। फिर भी उनके महान् कार्यों को नहीं भुलाया जा सकता। वास्तव में, सन यात-सेन ने चीन के लिए वही किया जो जर्मनी के एकीकरण के लिए बिस्मार्क ने, इटली के लिए मैजनी और कावूर, रूस के लिए लेनिन और अमेरिका के लिए जॉर्ज वाशिंगटन ने किया था। वे चीन के राष्ट्रपिता तथा आधुनिक चीन के निर्माता और विश्व के महान क्रान्तिकारी थे। क्लाइड ने भी उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में लिखा है-“सेन राष्ट्रवादी आन्दोलन के सम्पूर्ण आदर्शवाद के प्रतीक बन गए। पुनर्गठित कुओमीनतांग का सारा क्रान्तिकारी उत्साह उनमें मूर्तिमान हो गया।
कन्फ्यूशियस पुरातन चीन का दार्शनिक सन्त था। 20वीं सदी के चीन में वही भूमिका सन यात-सेन को मिल कन्फ्यूशियसवाद का स्थान सन यात-सेनवाद को मिला।” फ्रेंज शर्मन ने भी लिखा है-“सन यात-सेन ने 40 वर्षों तक चीनी लोगों की स्वाधीनता के लिए क्रान्तिकारी कार्य किए और अपना सर्वस्य बलिदान कर दिया।” इसी प्रकार विनायके का मत है-“उनके सम्बन्ध में उनके विरोधियों को जो भी शंकाएँ थीं,  वह रातों-रात भुला दी गईं। मृत्यु से पूर्व अनेक लोग उन्हें स्वप्नद्रष्टा एवं उत्पाती मानते थे परन्तु अब वह सम्पूर्ण ज्ञान एवं विवेक के स्रोत बन गए।



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