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संतों भाई आई ग्याँन की आँधी रे।भ्रम की टाटी सबै उडाँनी, माया रहै न बाँधी।।हिति चित्त की दै यूँनी गिराँनी, मोह बलिंडा तूटा।त्रिस्नों छाँनि परि घर ऊपरि, कुबधि का भाँडाँ फूटा।।जोग जुगति करि संतौं बाँधी, निरचू चुवै व पाँणी।कूड़ कपट काया का निकस्या, हरि की गति जब जाँणी।।आँधी पीछे जो जल चूठा, प्रेम हरि जन भींनौं।कहै कबीर भाँन के प्रगटे उदित भया तम खीनों।।भावार्थ : कबीर ज्ञान का महत्त्व बताते हुए कहते हैं कि हे संतों ! ज्ञान की आँधी आई है। उसके प्रभाव से भ्रम की टाटी उड़ गई है। अब वह माया की रस्सी से बँधा नहीं है। स्वार्थरूपी दोनों खंभे और मोह की बल्लियाँ टूट गई हैं। तृष्णा का छप्पर ऊपर गिर जाने से घर में रहे कुबुद्धि के सभी बर्तन टूट गए हैं। संतों ने योग-साधना के उपाय से एक ऐसा मजबूत छप्पर बनाया है, जिससे थोड़ा भी पानी नहीं टपकता है। संतों ने जब ईश्वर का मर्म जान लिया तो उनके शरीर से समस्त विकार नष्ट हो गए। इस ज्ञान रूपी आँधी के पश्चात् जो प्रभु के प्रेम की वर्षा हुई है उसमें सभी भीग गए हैं। ज्ञान के सूर्योदय से मन का अंधकार नष्ट1. कबीर ने कैसी आँधी आने की बात कही है ?2. शरीर का कूड़ कपट किसे कहा गया है ?3. साधारण आँधी और ज्ञान की आँधी के विषय में कबीर ने क्या कहा है ?4. हरि की गति जान लेने से क्या परिवर्तन आया ?5. ‘कूड कपट काया निकस्या’ में कौन-सा अलंकार है ? |
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Answer» 1. कबीर ने ज्ञान की आँधी आने की बात कही है। 2. शरीर का कूड़ कपट मोह-माया, लालच, छलकपट, कुबुद्धि और सांसारिक विषय-वासनाओं को कहा गया है। 3. साधारण आँधी के आने पर छप्पर गिर जाते हैं, उसमें रखे हुए बर्तन टूट जाते है। ज्ञान की आँधी आने पर मन के स्वार्थ का खंभा तथा मोहमाया का छप्पर गिर जाता है, उसमें रहे विकार, छलकपट, लालच और विषय-वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं। 4. हरि की गति जान लेने के पश्चात् प्रभु-भक्ति की प्रेमवर्षा में कवि का मन भीग गया और ज्ञान क उदय होने से मन का अंधकार नष्ट हो गया। 5. ‘कूड कपट काया निकस्या’ में अनुप्रास अलंकार है। |
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