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ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए :हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

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प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘हो गई है पीर पर्वत-सी’ नामक आधुनिक कविता से लिया गया है जिसके रचयिता दुष्यन्त कुमार हैं।

भाव स्पष्टीकरण : प्रगतिवादी विचारधारा को व्यक्त करते हुए कवि दुष्यन्त कुमार देश की जनता को प्रगति-पथ पर ले जाने व सुखी जीवन की परिकल्पना करते हैं। वे देखते हैं कि समाज में दुःख, दारिद्र्य, शोषण सब कुछ अभी भी है। आज के मानव वर्ग की पीड़ा हिमालय पर्वत के समान बन गई है। वे आशा करते हैं कि इस पीड़ा रूपी पर्वत से गंगा निकलनी चाहिए। अर्थात् ये परिवर्तन की आग चाहें किसी के भी मन से उठे, उसे उठना चाहिए। इसके माध्यम से कवि देशवासियों को जागरण का संदेश देते हैं।



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