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ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिएःझन झनन झनन झंझा झकोर-से झंकृत यह जीवन निशीथसब क्षणिक, वणिक वत् स्वार्थ मग्न तुम एक मात्र निस्वार्थ मीत।दुख दैन्य अश्रु दारिद्र्य धार-कर गए मुझे ही मनो-नीततूफान और इस आँधी में सुनवाने रज का जीव गीत।

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प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘तुम आओ मन के मुग्ध मीत’ नामक कविता से ली गई हैं जिसके रचयिता डॉ. सरगु कृष्णमूर्ति हैं।
संदर्भ : कवि कह रहें है कि जिंदगी में इतने दुख हैं कि जीवन को झकझोर कर रख दिया है। यहाँ सब कुछ नाश होने वाला है। सभी लोग व्यापारी वृत्तिवाले स्वार्थी हैं। तुम्ही एक मित्र हो जो निस्वार्थी हो।
स्पष्टीकरण : कवि कहते हैं कि झंकार करनेवाले इस झंझापूर्ण जीवन की अर्धरात्री में सब क्षणिक व्यापारी वृत्ति के लोग है। सब स्वार्थ में मग्न हैं। अतः तुम आओ और मुझे इनसे मुक्त करो। अपने निःस्वार्थ भाव से, मधुर गीतों से सारे पाप मिटा दो। मैं दुःख, दरिद्रता व दीनता में घिर गया हूँ। अतः तुम आओ और मुझे इस तूफान व आँधी के थपेड़ों से बचा लो। आशा है, तुम मेरी व्यथा मिटा दोगे, क्योंकि तुम मेरे मधुर मीत हो।



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