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सुभद्रा कुमारी चौहान कवयित्री पाठ-परिचय

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मेरा नया बचपन’ कविता में कवयित्री को अपनी छोटी-सी पुत्री को खेलते देख अपने बचपन की याद आ जाती है। वह भावुक होकर अपने बचपन की बातों को याद करने लगती है। बचपन में वह किस प्रकार चिन्तारहित होकर खेलती-खाती और घूमती थी, वे सभी घटनाएँ उसके मन में छाने लगती हैं।

किलकारी मारकर हँसना, कभी मोती जैसे आँसू टपक आते हुए रोना, कवयित्री को देख-देखकर घर के सभी लोगों का प्रसन्न होना आदि बातें उनके नेत्रों के सामने उजागर ही उठी॥
कुछ बड़ी होने पर उनके व्यवहार में बदलाव आने लगे। वह लजाने लगी। मन में एक अपरिचित-सा रस उमगने लगा। किन्तु बचपन से यह विछोह उन्हें भारी पड़ा।

जवानी के झंझटों में घेर लिया। अब कवयित्री चाहती थी कि उसका बचपन उसे फिर मिल जाए। कवयित्री की यह कामना उसकी पुत्री के रूप में फिर से सफल हो गई। बेटी की तोतली बातों ने उसे उसका खोया बचपन फिर लौटा दिया।



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