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स्वावलम्बन पर निबंध लिखिए :

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‘स्वावलंबन’ में दो शब्द हैं – ‘स्व’ और ‘आलंबन’। ‘स्व’ का अर्थ है – अपना और ‘आलंबन’ का अर्थ है – सहारा। इस प्रकार स्वावलंबन का अर्थ है अपना सहारा स्वयं बनना। दूसरे शब्दों में, अपने आत्मबल को जागृत करना ही ‘स्वावलंबन’ कहलाता है।

स्वावलंबी व्यक्ति के सामने असंभव कार्य भी संभव दिखने लगता है। स्वावलंबन के दो पहलू हैं – पहला, आत्म निश्चय और दूसरा, आत्म निर्भरता। इसके ठीक विपरीत छोटे – छोटे कार्यों के लिए दूसरों पर आश्रित रहना ‘परावलंबन’ कहलाता है। परावलंबी व्यक्ति हाथ रहते हुए भी लूला और पैर रहते हुए भी लंगड़ा रहता है। जिसमें अपने पैरों पर खड़े होने की सामर्थ्य नहीं है, वह दूसरों का कंधा पकड़कर कब तक चलता रहेगा? एक झटका लगते ही धराशायी हो जाएगा। ईश्वर उसी की सहायता करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं।

विश्व का इतिहास ऐसे महापुरुषों के उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिन्होंने स्वावलंबन का सहारा लिया है। महाकवि तुलसीदास बचपन से ही अनाथ थे। वे दाने – दाने के लिए मुहताज रहते थे, फिर भी अपनी आत्मनिर्भरता के सहारे वे स्वतंत्र लेखन करके भारत के लोककवि कहलाए।

ईश्वरचंद विद्यासागर एक निर्धन परिवार की संतान थे। वे सड़क की रोशनी में पढ़ते थे। उन्होंने जो यश अर्जित किया, उसका आधार स्वावलंबन ही था। अब्राहम लिंकन जूते की सिलाई करते थे, लेकिन अपनी आत्मनिर्भरता और अपने आत्मनिश्चय को जगाकर एक दिन वे अमेरिका जैसे शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति पद पर जा बैठे। इसी तरह छत्रपति शिवाजी, न्यूटन, अकबर, नेपोलियन, शेरशाह तथा महात्मा गांधी इत्यादि अनगिनत नाम हैं।

इस प्रकार स्वावलंबन ही जीवन है और परावलंबन मृत्यु। स्वावलंबन पुण्य है और परावलंबन पाप। अतः हर माता – पिता को चाहिए कि वह बचपन से ही अपने बच्चों में स्वावलंबन की भावना भरें। छात्रों को अपने छोटे – छोटे कार्य – कमरे की सफाई, वस्त्रों की धुलाई, भोजन बनाना आदि स्वयं करने की आदत डालनी चाहिए। ऐसे विद्यार्थी स्वावलंबी बनकर देश के योग्य नागरिक बनते हैं और उनके सहयोग से स्वावलंबी राष्ट्र का निर्माण होता है।



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