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“स्वस्थ राष्ट्रीयता अन्तर्राष्ट्रीयता की आधारशिला है।” इस कथन के आधार पर राष्ट्रीयता तथा अन्तर्राष्ट्रीयता के सम्बन्धों की व्याख्या कीजिए।याक्या राष्ट्रवाद विश्व-शान्ति के लिए हानिकारक है?याक्या राष्ट्रवाद और अन्तर्राष्ट्रवाद परस्पर विरोधी हैं?याराष्ट्रवाद तथा अन्तर्राष्ट्रीयवाद में सम्बन्ध बताइए।

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राष्ट्रवाद और अन्तर्राष्ट्रवाद का पारस्परिक सम्बन्ध वर्तमान समय की एक महत्त्वपूर्ण समस्या है। इन दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय पर दो परस्पर विरोधी धारणाएँ प्रचलित हैं। प्रथम, और मात्र सतही अध्ययन पर आधारित धारणा के अन्तर्गत राष्ट्रवाद और अन्तर्राष्ट्रवाद को परस्पर विरोधी कहा जाता है। इस श्रेणी के विचारकों का कथन है कि राष्ट्रवाद का तात्पर्य व्यक्ति का अपने प्रदेश के प्रति अनन्यतापूर्ण प्रेम है, जबकि अन्तर्राष्ट्रवाद का आशय यह है कि व्यक्ति अपने आपको सम्पूर्ण मानवीय जगत् का एक सदस्य समझकर सम्पूर्ण मानवीय जगत् के प्रति आस्था रखे।
लेकिन उपर्युक्त विचारधारा मिथ्या धारणाओं पर आधारित है। वास्तव में राष्ट्रवाद तथा अन्तर्राष्ट्रवाद परस्पर विरोधी नहीं हैं। राष्ट्रवाद का अन्तर्राष्ट्रवाद से विरोध केवल उसी स्थिति में होता है, जब राष्ट्रवाद को बहुत अधिक संकुचित और उग्र रूप में ग्रहण किया जाता है। विशुद्ध उदार राष्ट्रवाद जो कि राष्ट्रवाद का वास्तविक और उचित रूप है अपने उपासकों को देशभक्ति का सन्देश तो देता है, लेकिन यह देशभक्ति दूसरे राष्ट्रों के प्रति घृणा, द्वेष या बैर की भावना से प्रेरित न होकर ‘जीओ और जीने दो’ (Live and let live) की विचारधारा पर आधारित होती है। ‘जीओ और जीने दो’ की भावना पर आधारित विशुद्ध राष्ट्रवाद के इस भाव को व्यक्त करते हुए विलियम लॉयड गैरीसन लिखते हैं, “हमारा देश संसार है, हमारे देशवासी सारी मानवता हैं। हम अपने राष्ट्र (देश) को उसी प्रकार प्यार करते हैं जैसे हम अन्य देशों को प्यार करते हैं।’
इसी प्रकार अन्तर्राष्ट्रवाद का तात्पर्य यह नहीं है कि व्यक्ति अपने राष्ट्र के प्रति निष्ठा न रखें। अन्तर्राष्ट्रवाद राज्यों के विलय या अन्त की माँग नहीं करता, वरन् वह तो केवल यह चाहता है कि राष्ट्रीय हितों को मानवता के व्यापक हितों के साथ इस प्रकार से समन्वित किया जाये कि सभी राष्ट्र समानता और परस्परिक सहयोग के आधार पर शान्तिपूर्ण, सुखी और समृद्धि का जीवन व्यतीत राष्ट्रीयता तथा अन्तर्राष्ट्रीयता 143 कर सकें। हेज के शब्दों में, “आदर्श अन्तर्राष्ट्रीय विश्व का तात्पर्य सर्वोत्कृष्ट स्थिति वाले राष्ट्रों के एक विश्व से ही है।” अत: स्वस्थ राष्ट्रीयता के आधार पर ही अन्तर्राष्ट्रीयता का सफल संगठन हो सकता है। एक सफल अन्तर्राष्ट्रीय संगठन राष्ट्रीयता की स्वस्थ धारणा पर ही निर्भर करता है।
इस प्रकार राष्ट्रवाद और अन्तर्राष्ट्रवाद परस्पर विरोधी नहीं, वरन् राष्ट्रवाद अन्तर्राष्ट्रवाद की भूमिका या उसका प्रथम चरण है। जोसेफ (Joseph) के शब्दों में कहा जा सकता है कि राष्ट्रीयता व्यक्ति को मानवता से मिलाने वाली आवश्यक कड़ी है।” महात्मा गाँधी भी इसी प्रकार का विचार व्यक्त करते हुए लिखते हैं कि “मेरे विचार से बिना राष्ट्रवादी हुए अन्तर्राष्ट्रवादी होना असम्भव है। अन्तर्राष्ट्रवाद तभी सम्भव हो सकता है, जब कि राष्ट्रवाद एक यथार्थ बन जाये।”
लेकिन इस सम्बन्ध में यह स्मरणीय है कि राष्ट्रवाद/अन्तर्राष्ट्रवाद के प्रथम चरण के रूप में उसी समय कार्य कर सकता है, जब कि राष्ट्रवाद को उग्र और संकुचित रूप में न अपनाकर उदार और विशुद्ध रूप में, देशभक्ति और सम्पूर्ण मानवता के हितों के एकाकार के रूप में अपनाया जाये। उग्र राष्ट्रवाद, जिसे बीसवीं सदी में हिटलर और मुसोलिनी द्वारा अपनाया गया, कुद्ध का कारण और अन्तर्राष्ट्रीयता का नितान्त विरोधी होता है। अतः एक पंक्ति में कहा जा सकता है कि ‘उदार या विशुद्ध राष्ट्रवाद अन्तर्राष्ट्रवाद का प्रथम चरण, लेकिन उग्र-राष्ट्रवाद अन्तर्राष्ट्रीयता का नितान्त विरोधी है।”
आज आवश्यकता इस बात की है कि सत्य और न्याय पर आधारित राष्ट्रवाद और देशभक्ति के विशुद्ध भाव को ग्रहण किया जाये। बीसवीं सदी के प्रबुद्ध मनीषी लॉस्की लिखते हैं, “यूरोप का मानसिक जीवन सीजर और नेपोलियन का नहीं, ईसा का है, पूर्व की सभ्यता पर चंगेजखाँ और अकबर की अपेक्षा बुद्ध का प्रभाव कहीं गहरा और व्यापक है। अगर हमें जीना है तो इस सत्य को सीखना-समझना पड़ेगा। घृणा को प्रेम से जीता जाता है, असद् को सद् से, अधर्मता का परिणाम भी उसी जैसा होता है।”
आज के विश्व का प्रश्न राष्ट्रवाद या अन्तर्राष्ट्रवाद नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि देशप्रेम और स्वस्थ राष्ट्रवाद की भावना को उच्चतम स्तर तक विकसित किया जाये और उसके आधार पर अन्तर्राष्ट्रीयता, विश्व-शान्ति और विश्व-बन्धुत्व की भावना का विकास हो।



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