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“थाली का बैंगन कभी इधर लुढ़कता और कभी उधर।” कथन को स्पष्ट करते हुए तुलसी के अन्तर्द्वन्द्व पर अपने विचार प्रकट कीजिए।

Answer»

थाली का बैंगन गोल होने के कारण इधर-उधर लुढ़कता रहता है, एक स्थान पर स्थिर नहीं रहता। इसी प्रकार तुलसीदास का मन भी लुढ़कता रहता है। उनके मन में द्वन्द्व चलता रहता है। कभी उनका मुस रत्नावली के मोह में डूब जाता है तो कभी प्रभु की भक्ति की ओर मुड़ जाता है। यह अन्तर्द्वन्द्व सर्वत्र व्याप्त है। जब रत्नावली काशी में तुलसीदास के मठ में आती है और उनके पैरों का स्पर्श करती है तो स्पर्श से तृप्ति होती है और राम बिसर गए। राजा भगत ने जब रत्नावली के जोगिन रूप की प्रशंसा की तो तुलसीदास को अच्छा लगा लेकिन उनका मन बैंगन की तरह तुरन्त लुढ़ककर राम की भक्ति की ओर चला गया। दूध पीकर कुल्ला करने बाहर गये फिर द्वन्द्व हुआ। एक मन कहता था चेत और दूसरा रत्नावली की मनोछवि निहारने में अटका था।

दूध पीने के बाद तुलसी लेटे। राम-राम जपना आरम्भ किया पर रत्नावली मन से नहीं हटी। उससे मिलने की इच्छा होने लगी। एक साथ दो विरोधी विचार हृदय में आए। मन ऊहापोह में रहता कभी रत्नावली की ओर जाता कभी झटके के साथ मोह से बाहर निकल करे राम की ओर मुड़ जाती। टोडर, गंगाराम, कैलाश कवि और शिष्यों ने रत्नावली को मठ में रखने का आग्रह किया। तुलसीदास का दुहरा रूप सामने आया वे ऊपर से विरोध करते पर मन कहता रत्नावली को पास रखकर साधना करता तो अच्छा रहता। नत्थू से बात करते समय अन्तर्द्वन्द्व का बड़ा अच्छा उदाहरण देखने को मिलता है। तुलसीदास स्वयं स्वीकार करते हैं कि मेरा मन स्थिर नहीं है। कभी यह योगाभ्यास करता है कभी भोग-विलास में फंस जाता है। कभी कठोर और कभी दयालु बन जाता है। कभी पाखण्डी और कभी ज्ञानी बन जाता है। कभी लालच सताता है तो कभी शत्रु भय सताता है। वे प्रभु से इसे द्वन्द्व को मिटाने की प्रार्थना करते हैं।

अन्तर्द्वन्द्व का अर्थ है दो विरोधी विचारों का एक साथ मन में उठना । प्रस्तुत अंश में स्थान-स्थान पर देखने को मिलता है कि तुलसी के मन में एक साथ दो विरोधी विचार आते हैं। मन रत्नावली की ओर जाता है तो प्रभु भक्ति की ओर भी मुड़ जाता है। स्पष्ट है। तुलसीदास का मन थाली के बैंगन की तरह इधर से उधर लुढ़कता रहता है।



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