1.

तुलसी के दोहे का सारांश लिखें।

Answer»

मुखिया मुख सों चाहिए, खान पान को एक।
पालै पोसै सकल अँग, तुलसी सहित विवेक।।

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदास कहते हैं कि मुखिया को मुंह के समान होना चाहिए। मुँह खाने पीने का काम अकेला करता है, पर वह जो खाता पीता है उससे शरीर के सारे अंगों का पालन पोषण होता है। इसी प्रकार मुखिया को भी ऐसे ही विवेक से काम करना चाहिए। वह काम अपनी तरह से करे पर उसका फल सभी में बाँटे। यानी मुखिया विवेक के साथ काम करना चाहिए जिससे सभी को मुख मिल जाय।

2. जड चेतन, गुण-दोषमय, विस्व कीन्ह करतार।
संत-हंस गुण गहहिं पय, परिहरि वारि विकार ।।

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदास कहते हैं कि संत हंस पक्षी के समान होते हैं। सृष्टिकर्ता ने इस संसार को जड चेतन तथा गुण-दोष से भरकर बनाया है। इसका यह अर्थ है कि इस जगत् या संसार में अच्छे बुरे समझ-नासमझ के रूप में कई गुण-दोष भरे हुए हैं। जिस प्रकार हंस पक्षी दूध को ग्रहण करके सारहीन पानी को छोडता है उसी प्रकार संत लोग भी पानी रूपी विकारों को छोडकर दूध रूपी अच्छे गुणों को अपनाते हैं।

3. दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छाँडिये, जब लग घट में प्राण ।।

यहाँ तुलसीदासजी कहते हैं कि दया धर्म का मूल है तो अभिमान पाप का मूल है। इसलिए मनुष्य को अपना अभिमान, गर्व को छोडकर दयालु बनना चाहिए। जब तक शरीर में प्राण है, तब तक मनुष्य को अपना अभिमान, गर्व को छोडकर दया गुण को अपनाना चाहिए। जब तक प्राण तब तक दया को नहीं छोड़ना चाहिए।

4. तुलसी साथी विपत्ति के विद्या विनय विवेक।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत राम भरोसो एक॥

यहाँ पर तुलसीदासजी ने विद्या, विनय और विवेक के महत्व को बताया है। जब मनुष्य को विपत्ती
आती है तब विद्या, विनय और विवेक उसके साथ रहकर संकट को दूर करते हैं। जो राम पर भरोसा करते है वे साहसी, सत्यवृत. तथा सुकृतवान बन जाते हैं।

5. राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहिरौ जो चाहसी उजियार ।।

यहाँ पर तुलसीदासजी राम-नाम की महिमा बताते हैं। जिस प्रकार घर की देहलीज पर दिया या ज्योति रखने से घर के भीतर और बाहर रोशनी या प्रकाश फैलता है उसी प्रकार देहलीज रूपी जीभ पर राम-नाम रूपी ज्योति रखने से मन में और मन के बाहर दोनों ओर ज्ञानरूपी रोशनी या प्रकाश फैलता। राम-नाम जपने से मनुष्य के भीतर और बाहर की शुद्धि होती है।



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