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तुलसी तपस्वी एवं वैरागी हैं, पर रत्नावली के प्रति उनका मोह भी कम नहीं है। उदाहरण देते हुए अपने विचार प्रकट कीजिए।

Answer»

तुलसीदास वैरागी थे। उन्होंने ने स्वयं कहा था- “विरक्त अब फिर से राग के बन्धनों में नहीं बँध सकता।” फिर भी उनके मानस पटल पर रत्नावली की मूर्ति विद्यमान थी। उसके प्रति मन के कोने में एक आकर्षण था। जो बार-बार उन्हें आकर्षित करता रहता था। रत्नावली ने जब उनके पैरों को स्पर्श किया तो उन्हें तृप्ति मिली और पलभर के लिए मन से राम बिसर गये। रत्नावली रसोई में रसोइये की सहायता कर रही है, भृत्य से यह सुनकर उन्हें अच्छा लगा। भोजन करते समय हर व्यंजन में रत्नावली के हाथ को स्पर्श मालूम पड़ता। थाली के सामने बैठकर बार-बार रत्नावली की छवि के साथ अपने मन में बँध जाते। भोजन के हर व्यंजन में वे रत्नावली के हाथ का स्पर्श चाहते थे। रत्नावली जब प्रह्लाद घाट चली गई, तो उन्हें भोजन स्वादहीन लगने लगा।

राजा भगत से रत्नावली की कठिन साधना की प्रशंसा सुनकर तुलसीदास को अच्छा लगा। उन्हें सन्तोष हुआ। रत्नावली तुलसी के मन के दृश्य पटल पर बार-बार आती, उनकी इच्छा होती कि वह रत्नावली को एक बार फिर देखें, उससे बातें करें । मन में एक गुदगुदाहट होती। उनका मन रत्नावली की मनोहर छवि निहारने में अटका हुआ था। सोते समय राम-राम जपना आरम्भ किया किन्तु रत्नावली उनके मन से नहीं हटी। उनकी इच्छा होने लगी कि रत्नावली उनके पास आए, उनसे अपना दुख-सुख कहे। उन्हें अनुभव हुआ कि वह मेरे (तुलसी के) लिए तड़पती है। वे सोचने लगे कि प्रभु मुझे इसलिए दर्शन नहीं दे रहे हैं क्योंकि मैं रत्नावली के प्रति निठुराई बरत रहा हूँ। सरवन को उसकी सेवा करने का निर्देश दिया।

उपर्युक्त उदाहरण से स्पष्ट है कि तुलसी वैरागी थे पर उनके अन्त: करण रत्नावली विद्यमान थी। उसके प्रति उनका मोह था और वे रत्नावली से मिलना भी चाहते थे।



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