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“तुलसीदास के मार्ग में रलावली बाधक नहीं बल्कि तपस्विनी भारतीय नारी के समान उनका साथ देती है।” इस कथन के सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट कीजिए। |
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Answer» तुलसीदास ने वैराग्य धारण कर लिया है और गृहस्थ जीवन का परित्याग कर दिया है। रत्नावली उनके मार्ग में बाधक नहीं बनती। वह नहीं चाहती कि उसके कारण तुलसीदास की साधना में विघ्न पड़े। इसलिए वह मठ में आकर भी उनसे दूर ही रहती है। तुलसीदास चाहते थे कि एक बार रत्नावली से आमना-सामना हो जाए। वह अपना दुख-दर्द उसे कहे। पर वह बड़ी सतर्कतापूर्वक अपने आपको उनकी नजरों से बचा जाती। वह रसोई में उनके लिए भोजन अवश्य तैयार करती पर कभी सामने नहीं आती। पहली बार जब वह आई थी तब अवश्य आँख से आँख मिली थी। इसके बाद कभी साक्षात्कार नहीं हुआ। पाठ के अन्त में जब दोनों का संवाद होता है तो उस समय तुलसीदास रत्नावली से काशी छोड़ने के लिए कहते हैं। उस समय भी रत्नावली ने हठ नहीं किया और जाने को सहर्ष तैयार हो गई। केवल अन्तिम समय में उनके दर्शन की भीख अवश्य माँगी। इससे स्पष्ट होता है कि रत्नावली तुलसी के मार्ग की बाधक नहीं बल्कि साधक थी। |
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