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तुम आओ मन के मुग्धमीत कविता का भावार्थ लिखें। |
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Answer» 1) मैं तमस्तों में भीत-भीत-झट आओ मेरे किरणमीत। कवि कहते हैं- अंधकार में डूबकर भयभीत हो गया हूँ। तू आ, मेरे किरण रूपी मीत। मुझे आत्मा के टिमटिमाते हुए सूर्य व चन्द्र के प्रकाश में ले जा। मेरे मधुर मीत! मेरे पाप को पुण्य . में बदल दो। 2) जन्मों के जीवन मृत्यु मीत! मेरी हारों की मधुर जीत! कवि कहते हैं- मेरे जन्म-मरण के पराजयों को जय में बदल दो। मैं तुम्हारा स्वागत शीश झुकाकर करता हूँ। तुम मेरे जीवन में कल्याण राग की तरह आओ जिससे मेरा अतीत भी ..आनंदमय हो उठे। कंटको के समान जीवन में, जलते हृदय में कोमल गीत गुनगुना उठे। 3) कितने दिन कितनी संध्याएँ कितने युग यों ही गए बीत कवि कहते हैं- कितने दिनों से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ? मैं भयग्रस्त हो गया हूँ। इस स्वार्थी संसार में केवल तुम्ही एक मेरे निस्वार्थी मित्र हो। 4) दुख दैन्य अश्रु दारिद्र्य धार-कर गए मुझे ही मनो-नीत कवि कहते हैं- हे मीत! दुःख, दरिद्रता और दीनता से ग्रसित इस संसार में, मैं आँधी और तूफान के थपेड़ों को सहन करते हुए जी रहा हूँ। हे मीत (मित्र) तुम शुद्ध पवित्र बन आओ जिससे मेरे पाप भी धुल जाएँगे। 5) तुम नहीं सोच सकते कंपित-गुंफित है कितनी करुण प्रीत। कवि कहते हैं- इससे मुझे छुटकारा दिला दे मेरे मित्र! मुझमें करुणा भर दे, व्याकुलता मिटा दे, जीवन में प्रीति भर दे। |
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