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उन दिनों छुट्टियाँ थी। आश्रम के अधिकांश लोग बाहर चले गए थे। एक दिन हमने सपरिवार उनके ‘दर्शन’ की ठानी। दर्शन को मैं जो यहाँ विशेष रूप से दर्शनीय बनाकर लिख रहा हूँ, उसका कारण यह है कि गुरुदेव के पास जब कभी मैं जाता था तो. प्रायः वे यह कहकर मुस्करा देते थे कि ‘दर्शनार्थी हैं क्या ?’ शुरू-शुरू में मैं उनसे ऐसी बांग्ला में बात करता था, जो वस्तुतः हिन्दी-मुहावरों का अनुवाद हुआ करती थी।किसी बाहर के अतिथि को जब मैं उनके पास ले जाता था तो कहा करता था, ‘एक भद्न लोक आपनार दर्शनेर जन्य ऐसे छेन।’ यह बात हिन्दी में जितनी प्रचलित है, उतनी बॉम्ला में नहीं। इसलिए गुरुदेय जरा मुस्करा देते थे। बाद में मुझे मालूम हुआ कि मेरी यह भाषा बहुत अधिक पुस्तकीय है।1. दर्शन को दर्शनीय बनाकर लिखने का क्या कारण है ?2. लेखक गुरुदेव से किस भाषा में बात करते थे ? उस भाषा की क्या विशेषता है ?3. ‘दर्शनीय’ और ‘पुस्तकीय’ में कौन-सा प्रत्यय लगा है ?

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1. दर्शन को दर्शनीय बनाकर लिखने का यह कारण है कि जब लेखक गुरुदेव के पास कभी-कभी जाते थे तो प्रायः वे यह कहकर मुस्करा देते थे कि दर्शनार्थी हैं क्या ?

2. लेखक गुरुदेव से बांग्ला भाषा में बात करते थे। उन्हें बांग्ला बहुत अच्छी तरह से नहीं आती थी, यह वस्तुतः हिन्दी मुहावरों का अनुवाद हुआ करती थी। उनकी यह भाषा पुस्तकीय भाषा थी।

3. ‘ईय’ प्रत्यय। दोनों शब्दों में ईय प्रत्यय लगा है।



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