1.

उन दो संस्कृतियों की तुलना करें जिनसे आप परिचित हों। क्या अनृजातीयता (नृजातीय नहीं बनना) कठिन नहीं है?

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व्यक्ति अपनी पहचान अपनी संस्कृति से करता है। समानं भाषा, क्षेत्र, धर्म, प्रजाति, अंतर्विवाह, रीति-रिवाज और धार्मिक विश्वासों के आधार पर बने सांस्कृतिक समूहों को नृजातीय समूह भी कहा जाता है। प्रत्येक नृजातीय समूह की अपनी नृजातीय अस्मिता होती है जिसका अर्थ समानता और अनन्यता से है। एक ओर, नृजातीय अस्मिता इस बात की ओर संकेत करती है कि । नृजातीय समूहों के सदस्यों में कौन-सी विशेषताएँ समान हैं तथा दूसरी ओर, इससे उन विशेषताओं का भी पता चलता है जो उन्हें दूसरे नृजातीय समूह से अलग करती है। जब हम दो संस्कृतियों की तुलना करते हैं तो हम दो नृजातीय समूहों में भेद करने का प्रयास करते हैं। उदाहरणार्थ-जब हम हिंदु संस्कृति की तुलना मुस्लिम संस्कृति से करने का प्रयास करते हैं तो दोनों में नृजातीय समानता एवं असमानता का पता लगाने का प्रयास करते हैं। चूँकि नृजातीय अस्मिता ही संस्कृति की पहचान होती है। इसलिए अनुजातीयता अर्थात् नृजातीय नहीं बनना बहुत कठिन होता है। वस्तुतः राष्ट्रीयता, भाषा, धर्म, क्षेत्र, प्रजाति, जाति, अहम् आदि की भावनाएँ नृजातीयता से जुड़ी होती हैं। इन्हें छोड़कर दो नृजातीय समूह या दो संस्कृतियों के लोग एक हों जाएँ, ऐसा असंभव तो नहीं है परंतु अत्यधिक कठिन है। जनजातियों में विभिन्न संस्कृतियों में आमनप्रदान से जनजातीय अस्मिता कम हुई है तथा सात्मीकरण की प्रक्रिया द्वारा अनेक जनजातियाँ अपनी संस्कृति खोकर हिंदू संस्कृति में आत्मसात् कर दी गई हैं।



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