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“उन्हें बहुत ग्लानि हो गयी है, ऐसा न हो, कहीं चल दें।”

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प्रसंग : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ की कहानी ‘बड़े घर की बेटी’ । से लिया गया है जिसके कहानीकार मुंशी प्रेमचन्द जी हैं।
संदर्भ : आनंदी के अपमान पर श्रीकंठ सिंह का गुस्सा और प्रण देखकर लालबिहारी को अपने किए पर ग्लानि हो आती है।
स्पष्टीकरण : श्रीकंठ सिंह अपने छोटे भाई द्वारा अपनी पत्नी के अपमान की बातें सुनकर गुस्सा हो जाते हैं। वे निर्णय लेते हैं कि इस घर में या तो लालबिहारी रहेगा या वे स्वयं। वे अपने पिता से कहते हैं कि अब वे लालबिहारी का मुँह तक देखना नहीं चाहते।
लालबिहारी अपने भाई के इस प्रण को सुनकर द्रवित हो जाता है और स्वयं घर छोड़ने का फैसला करता है। वह अपनी भाभी से क्षमा माँगता हैं। तब आनंदी दौड़कर अपने पति के पास आती है। वह कहती हैं- ‘उन्हें बहुत ग्लानि हो गयी है, ऐसा न हो, कहीं चल दें।’



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