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उसने कहा था’ कहानी के नायक लहनासिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए।

Answer»

लहनासिंह कहानी का नायक है। उसके चरित्र की कतिपय विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

प्रत्युत्पन्नमति मान – खन्दक में जर्मन अधिकारी को पहचान लेने के बाद लहनासिंह ने निर्णय लेने में तनिक भी देर नहीं लगाई। वजीरासिंह को जगाकर सूबेदार को लौटा लाने के लिए तुरन्त भेज दिया। तनिक-सी देरी सारी खन्दक को उड़ा देती और सबके प्राण ले लेती। उसने मूर्छित जर्मन अफसर की जेबों की तलाशी लेकर सारे कागज भी निकाल लिए।

कर्तव्यनिष्ठ – लहनासिंह की कर्तव्यनिष्ठा की प्रशंसा की जानी चाहिए। खन्दक में खड़े होकर जहाँ एक ओर वह एक सिपाही के कर्तव्य का निर्वहन कर रहा था वहीं दूसरी ओर बीमार साथी के प्रति भी अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा था। दो-दो घाव लगने के बाद भी वह अपने कर्तव्य को नहीं भूला । प्रेम के क्षेत्र में भी उसने अपने कर्तव्य का निर्वाह किया। सूबेदारनी को उसने जो वचन दिया था उसे भी उसने पूरी तरह निभाया।

निश्छल-प्रेमी – वह प्रेम के सच्चे अर्थ को समझता था। बचपन में आठ वर्ष की लड़की से दो-तीन बार मिलने पर उसके हृदय में जो प्रेम प्रस्फुटित हुआ था, वह सच्चा प्रेम था। तभी तो सम्भावना के विरुद्ध उत्तर सुनकर उस पर जो प्रभाव पड़ा वह उसके सच्चे प्रेम का उदाहरण है। उसने बचपन के प्रेम को अन्तिम समय तक निभाया। यह सूबेदारनी से किये हुए प्रेम का ही परिणाम था कि उसने बोधासिंह का ध्यान रखा ।।

त्यागी – लहनासिंह के त्याग़ का बहुत अच्छा उदाहरण है-बोधासिंह की रक्षा । खन्दक में ठण्ड होने पर अपना कम्बल, ओवरकोट और जरसी तक बोधासिंह को दे दिया। स्वयं एक कुरते में ही खड़ा रहा। दूसरी ओर उसने अपने प्रेम के लिए अपना जीवन दाँव पर लगा दिया। सूबेदारनी ने जो चाहा था लहनासिंह ने वही किया।

साहसी – वह बहुत साहसी था। जर्मन अफसर ने धोखे से सूबेदार को खन्दक से दूर भेज दिया। खन्दक में केवल आठ-दसे सिपाही रह गये। जर्मन सिपाहियों के आक्रमण करने पर उसने अपना साहस नहीं खोया । यद्यपि उसे दो घाव लग गये थे फिर भी वह खड़ा होकर एक-एक जर्मन को मार रहा था। वह सत्तर जर्मन सिपाहियों का साहस के साथ सामना करता रहा। उसके साहस का एक उदाहरण बचपन में भी मिलता है जब एक लड़की को घोड़े की टाँगों के बीच से निकालकर दूर खड़ा कर दिया था और स्वयं उसमें फँस गया था।



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