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उसने कहा था’ कहानी की भाषा-शैली की दृष्टि से समीक्षा कीजिए।

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भाषा भावों की संवाहक होती है। भाव और कथानक कितना भी अच्छा हो किन्तु भाषा शिथिल हो तो कहानी का कैथानक उभर नहीं पाता । इस कहानी की भाषा सीधी और सरल, किन्तु हृदयस्पर्शी है। भाषा पात्रानुकूल है। जैसा पात्र वैसी ही भाषा । बम्बृकार्ट वालों की भाषा कैसी होती है, उनकी जीभ कैसी चलती है? इसे कहानी के प्रारम्भ में ही देख सकते हैं। उनकी भाषा मरहम लगाती है। जिसमें तीक्ष्णता नहीं कोमलता है। हट जा जीणे जोगिए, करमाँ वालिए आदि। भाषा पात्रानुकूल और समय के अनुसार हैं। वाक्य रचना भी छोटी है। इसी प्रकार लड़के-लड़की की भाषा भी पात्रानुकूल है। लड़के का पूछना ‘तेरी कुड़माई हो गई?’ और लड़की को सहज रूप में ‘धत्’ कहकर भाग जाना में स्वाभाविकता है। ‘धत्’ शब्द उसकी लज्जा व्यक्त करता है। कथोपकथन बड़े छोटे हैं और परिस्थितिजन्य हैं।

कहानी के मध्य की भाषा बिलकुल पात्रानुकूल है। सिपाही शुद्ध शब्द का प्रयोग नहीं कर पाते। इस कारण लेफ्टीनेन्ट को लपटन कहते हैं। उर्दू के शब्दों का प्रयोग करते हैं; जैसे-हुक्म। कभी-कभी अंग्रेजी के शब्द जैसे ‘रिलीफ’ भी बोल देते हैं। हँसी-मजाक में आँचलिक शब्दों का प्रयोग भी कर देते हैं; जैसे–माँदे, पाधा आदि। भाषा में मुहावरों के प्रयोग से बड़ी सरसता आ गई है। मुहावरों का प्रयोग सहज ही हुआ है उन्हें जबरन लाया नहीं गया है। मुहावरे भी पात्रानुकूल और समय के अनुसार हैं। दाँत बज रहे हैं, खेत रहे, पलक न कँपी, आँख मारते-मारते जैसे मुहावरे सहज ही आ गए हैं। इनसे भाषा में सौन्दर्य आ गया है।

कथोपकथनात्मक शैली है। कथोपकथन छोटे हैं और पात्रों के अनुकूल हैं। हमउम्र के बच्चे किस प्रकार की बातें करते हैं। यह लड़के और लड़की की बात से स्पष्ट होता है। ‘तेरी कुड़माई हो गई?’ और ‘धत्’ शब्दों में बड़ी मिठास है। कहीं-कहीं कथोपकथन में। व्यंग्य का पुट भी है। लहनासिंह हजारासिंह से कहता है-“लाड़ी होरां वो भी यहाँ बुला लोगे? या वह दूध पिलाने वाली मेम….।” कैसा व्यंग्य है किन्तु हास्ययुक्त है। कहानी के अन्त में प्रत्येक कथन दर्द से भरा है। वहाँ भी छोटे ही कथोपकथन हैं। इस प्रकार भाषा शैलो की दृष्टि से भी कहानी श्रेष्ठ है।



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