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उसने कहा था’ कहानी की कथानक निश्छल प्रेम, त्याग और कर्त्तव्यनिष्ठा को केन्द्र में रखकर बुना गया है और मृत्यु शैय्या पर उसका अन्त होता है-इस कथन की युक्तियुक्त विवेचना कीजिए। |
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Answer» कहानी का आरम्भ निश्छल प्रेम से होता है। भीड़ भरे बाजार में बारह वर्ष का लड़का और आठ वर्ष की लड़की एक दुकान पर मिलते हैं। दुकानदार व्यस्त है इसलिए दोनों को बात करने का अवसर मिल जाता है। रास्ते में लड़के ने सहज रूप में कुड़माई के बारे में पूछ लिया। एक दिन लड़की ने सम्भावना के विरुद्ध उत्तर देकर लड़के के प्रेम को झटका दे दिया। जिसका लड़के पर गहरा प्रभाव पड़ा। कहानी बड़े सहज रूप से आरम्भ होती है। लड़के-लड़की के मिलन में कोई बनावट नहीं है। इसमें मनोवैज्ञानिकता है। हमउम्र और विपरीत लिंग में ऐसे प्रश्न स्वाभाविक हैं। कहानी का दूसरा मुख्य बिन्दु त्याग है। कहानी के नायक लहनासिंह के त्याग को कई उदाहरणों से स्पष्ट किया गया है। लहनासिंह ने सूबेदार के पुत्र बोधासिंह के लिए बहुत त्याग किया। बोधासिंह अस्वस्थ है। साथी होने के कारण उसका ध्यान रखना उसका कर्तव्य है। वह सूबेदार का पुत्र है और सूबेदारनी ने उसकी रक्षा की जिम्मेदारी लहनासिंह को दी है। लहनासिंह ने बोधासिंह को सूखे डिब्बों पर सुलाया, अपना कम्बल दिया, ओवरकोट उढ़ाया, जरसी पहनाई और आप एक कुर्ते में ही ठण्ड में खड़ा रहा। यह त्याग कम नहीं है। वह बोधासिंह की रक्षा के लिए खन्दक में ही रुका रहा। घावों को सहते हुए भी उसने बोधा और हजारा को ही भेज दिया परन्तु स्वयं नहीं गया। इससे बढ़कर त्याग का उदाहरण और क्या होगा। कर्तव्य के क्षेत्र में उसने दो कर्तव्यों का निर्वाह किया। एक प्रेम के क्षेत्र में और दूसरा सैन्य क्षेत्र में । बोधासिंह और हजारासिंह को सुरक्षित वापिस भेज दिया और अपने प्राणों की बाजी लगा दी, यह प्रेम के लिए कर्तव्य का निर्वाह ही तो है। सिपाही के रूप में भी उसने अपने कर्तव्य का निर्वाह किया। जर्मन लपटन से बदला लेना और उसे मौत के घाट उतारना, घायल होकर भी जर्मन सेना का सामना करना लेकिन पीछे न हटना उसकी कर्तव्यनिष्ठा का प्रमाण है। कहानी का अन्त दुखान्त है। इतना त्याग करने के बाद भी उसे क्या मिला? दो सहानुभूति के शब्द भी किसी ने नहीं कहे। एक सूचना मात्र प्रकाशित होकर रह गई। कहानी का कथानक लहनासिंह के इन तीनों गुणों के कारण मार्मिक बन गया है। |
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