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उसने रस्सी का फंदा घडे में डाला। दाएँ-बाएँ चौकन्निदृष्टि से देखा जैसे कोई सिपाही रात को शत्र के किले में सुराख कर रहा हो। अगर इस समय वह पकड़ ली गई, तो फिर उसके लिए माफी या रियायत की रात्री भर उम्मीद नहीं।गंगी के चरित्र पर टिप्पणी लिखें। |
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Answer» गंगी गंगी प्रेमचंद की कहानी ‘ठाकूर का कुआँ’ का प्रमुख पात्र हैं। वह जाति – प्रथा से त्रस्त समाज की प्रतिनिधि हैं। कहानी के आंरभ में वह पति को पीने का पानी देती हैं। लेकिन पानी पीने का योग्य नहीं था, उस में सख् बदबू थी। दूर के कुएँ से वह रोज़ शाम को पानी भर लाती थी। कल वह पानी लाई थी तो उस में बदबुन थी। पति ज़ोखू बीमार था वह प्यास रोक न सकने पर खराब पानी पीने को तैयार हो गया। लेकिन गंगी न पानी देती। वह जानती थी कि खराब पानी पीने से पति का बीमार पढ़ जाएगा। जाति-प्रथा ज़ोरों में था। निम्न जाति होने के कारण ठाकुर या साहूकार के कुएँ से वह पानी न भर सकती। जाति प्रथा के बारे में सोचते समय हम गंगी में एक विद्रोही का मन देखते हैं। उसकी शंका यह थी कि वह क्यों नीच हैं? और ये लोग क्यों ऊँचे हैं? कहते है जाति से ऊँच पर निम्न बातें करते हैं। ऐसे सोचकर बडी सावधानी से कुएँ की और चली। देवताओं को याद करके उसने घड़ा कुएँ में डाला। घड़े को पकड़कर जगत पर रखने वह झुकी कि एकाएक ठाकुर का दरवाज़ा खुल गया। गंगी का धैर्य टूट गया और उसके हाथ से रस्सी टूट गयी। रस्सी के साथ घडा पानी में गिर गया। कौन है कौन है पुकारते ठाकुर कुएँ की ओर आने लगे। इसी समय गंगी जगत से कूदकर भागी। इस प्रकार पति के स्वास्थ्य के बारे में सोचनेवाली धीर और जाति-प्रथा को घृणा करनेवानी नारी है – गंगी। |
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