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Answer» शैक्षिक निर्देशन की विधि (Method of Educational Guidance) प्राथमिक एवं जूनियर हाईस्कूल की सीमाओं को लाँघकर माध्यमिक स्तर की दहलीज पर आकर सभी विद्यार्थियों को सचमुच ही यह ज्ञात नहीं होता कि उनके जीवन की भावी दिशा एवं व्यूह-नीति क्या होगी। न केवल इतना ही, अपितु उनके अभिभावकगण भी उनके भावी जीवन के विषय में अधिक स्पष्ट नहीं होते। देश के असंख्य बालकों की एक विशाल भीड़ को उचित मार्ग-दर्शन एवं परामर्श की तलाश होती है जिसे निर्धारित एवं कम समय में प्रदान करना होता है। इस सन्दर्भ में ‘निर्देशन’ (Guidance) एक सर्वोत्तम विधि एवं कला है। शैक्षिक निर्देशन की दो विधियाँ प्रचलित हैं – (I) वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन तथा (II) सामूहिक शैक्षिक निर्देशन। (i) वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन(Personal Educational Guidance) वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन के अन्तर्गत परामर्शदाता या निर्देशक बालक से व्यक्तिगत स्तर पर सम्पर्क स्थापित करके उसकी विभिन्न समस्याओं को अध्ययन करता है। ये समस्याएँ व्यक्तिगत, सामाजिक या संवेगात्मक इत्यादि हो सकती हैं। वह बालक के बौद्धिक स्तर, शैक्षिक उपलब्धियों, मानसिक योग्यताओं, रुचियों, अभिरुचियों, पारिवारिक तथा शारीरिक दशाओं से परिचय प्राप्त करने का भरपूर प्रयास करता है। इसके लिए निम्नलिखित प्रमुख विधियों का प्रयोग किया जाता है – (1) भेंट या साक्षात्कार – निर्देशक या परामर्शदाता बालक से भेंट करके या साक्षात्कार द्वारा उसके सम्बन्ध में आवश्यक सूचनाएँ एकत्र करता है तथा निर्देशन की प्रक्रिया में सहायक विभिन्न तथ्यों की जानकारी उपलब्ध कराता है। (2) प्रश्नावली – बालक के सम्बन्ध में तथ्यों का पता लगाने अथवा उसके व्यक्तिगत विचारों से परिचित होने के उद्देश्य से एक प्रश्नावली निर्मित की जाती है जिसके उत्तर स्वयं बालक को देने होते हैं। प्रश्नावली के माध्यम से बालक की आदतों, पारिवारिक वातावरण, अवकाशकालीन क्रियाओं, शिक्षा और व्यवसाय सम्बन्धी योजनाओं के विषय में ज्ञान प्राप्त हो जाता है। (3) व्यक्तिगत इतिहास –व्यक्तिगत इतिहास के माध्यम से बालक की व्यक्तिगत, सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी प्राप्त की जाती है। इसके अतिरिक्त बालक के अभिभावक, मित्र, परिवार के सदस्य एवं आस-पड़ोस के लोग भी उसके विषय में बताते हैं, जिससे उसकी समस्याओं का निदान एवं समाधान किया जाता है। (4) संचित अभिलेख – विद्यालय में प्रत्येक विद्यार्थी से सम्बन्धित एक ‘संचित अभिलेख’ होता है। इस अभिलेख में विद्यार्थी की प्रगति, योग्यता, बौद्धिक स्तर, रुचि, पारिवारिक दशा तथा शारीरिक स्वास्थ्य सम्बन्धी सूचनाएँ संगृहीत रहती हैं। इन अभिलेखों का अध्ययन करके परामर्शदाता, निर्देशन की दिशा निर्धारित करता है। (5) बुद्धि एवं ज्ञानार्जन परीक्षण – इन परीक्षणों के माध्यम से निर्देशक इस बात की जाँच करता है कि विद्यार्थी ने विभिन्न पाठ्य-विषयों में कितना ज्ञानार्जन किया है, उसका बौद्धिक स्तर कितना है, शिक्षक ने उसे कितनी प्रभावशालता के साथ पढ़ाया है तथा उसकी योग्यताएँ व दुर्बलताएँ। क्या हैं? इन सभी बातों का ज्ञान विद्यार्थी की भावी प्रगति के सन्दर्भ में अनुमान लगाने में निर्देशक की सहायता करता है। (6) परामर्श – निर्देशक विद्यार्थियों की समस्या का ज्ञान प्राप्त करके तथा उनके विषय में समस्त तथ्यों का संकलन करके उन्हें शिक्षा सम्बन्धी परामर्श प्रदान करता है। यह परामर्श उनकी समस्याओं का उचित समाधान करने में सहायक होता है। (7) अनुगामी कार्यक्रम – निर्देशन प्रदान करने के उपरान्त अनुगामी कार्य द्वारा यह जाँच की। जाती है कि निर्देशन के बाद विद्यार्थी की प्रगति सन्तोषजनक रही है अथवा नहीं। असन्तोषजनक प्रगति इस बात की द्योतक है कि विद्यार्थी के विषय में निर्देशक के अनुमान गलत थे तथा निर्देशन ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर पाया। इसलिए उसमें संशोधन करके पुनः निर्देशन प्रदान किया जाना चाहिए। वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन की विधि के उपर्युक्त सोपान किसी विद्यार्थी की शैक्षिक समस्याओं के सम्बन्ध में समुचित परामर्श एवं समाधान प्रस्तुत करने में सहायक सिद्ध होते हैं। लेकिन इस विधि की कुछ परिसीमाएँ भी हैं; यथा – एक ही विद्यार्थी के लिए विशेषज्ञ या मनोवैज्ञानिक की आवश्यकता होती है तथा इसमें अधिक समय और धन का व्यय भी होता है। सामूहिक शैक्षिक निर्देशन से इन कमियों को पूरा करने का प्रयास किया गया है। (ii) सामूहिक शैक्षिक निर्देशन (Group Educational Guidance) सामूहिक शैक्षिक निर्देशन की विधि के विभिन्न सोपानों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है (1) अनुस्थापन वार्ताएँ – सामूहिक निर्देशन के अन्तर्गत सर्वप्रथम, मनोवैज्ञानिक विद्यालय में जाकर बालकों को वार्ता के माध्यम से निर्देशन का महत्त्व समझाता है। ये वार्ताएँ विद्यार्थियों को स्वयं अपनी आवश्यकताओं, क्षमताओं, शैक्षिक उद्देश्यों एवं रुचियों इत्यादि के सम्बन्ध में सोचने-समझने हेतु प्रेरित व उत्साहित करती हैं। (2) मनोवैज्ञानिक परीक्षण – विद्यार्थियों को उचित दिशा में निर्देशित करने के उद्देश्य से मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है। इन परीक्षणों की सहायता से विद्यार्थियों की सामान्य एवं विशिष्ट बुद्धि, मानसिक योग्यता, रुचि, अभिरुचि, भाषा एवं व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं का ज्ञान हाता है। इससे निर्देशक का कार्य सुगम हो जाता है। (3) साक्षात्कार – व्यक्तिगत निर्देशन के समान ही साक्षात्कार का प्रयोग सामूहिक निर्देशन में भी किया जाता है। इसके लिए निर्देशक समिति एवं बालकों से भेंट करके विभिन्न पाठ्य-विषयों के प्रति उनकी रुचि, भावी शिक्षा और व्यवसाय-योजना आदि के सम्बन्ध में सूचनाएँ एकत्र करते हैं। इसके लिए स्वयं-परिसूची’ (Self-Inventory) का भी प्रयोग किया जाता है। (4) विद्यालय से तथ्य संकलन – मनोवैज्ञानिक, बालकों की विभिन्न पाठ्य-विषयों की ‘शैक्षिक सम्प्राप्ति की जानकारी के लिए, पूर्व परीक्षाओं के प्राप्तांकों पर विचार करता है। इस सम्बन्ध में ‘संचित-लेखा’ (Cumulative Record) के साथ-साथ अध्यापकों की राय लेना भी जरूरी एवं महत्त्वपूर्ण है। (5) सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का अध्ययन – शिक्षा से सम्बन्धित समुचित निर्देशन प्रदान करने की दृष्टि से विद्यार्थियों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का अध्ययन आवश्यक है। निर्देशक को समाज, आस-पड़ोस, घर-गृहस्थी, मित्र-मण्डली, परिचितों तथा अभिभावकों से उनके विषय में पूरी-पूरी सामाजिक-आर्थिक जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। (6) परिवार से सम्पर्क – माता-पिता ने बालकों को जन्म दिया है, पालन-पोषण किया है, उन्हें शनैः-शनैः विकसित होते हुए देखा है तथा उसकी भावी उन्नति व व्यवसाय आदि का स्वप्न देखा है; अतः मनोवैज्ञानिक को बालकों के माता-पिता के विचारों को अवश्य समझना चाहिए। इसके लिए पत्र-व्यवहार द्वारा या माता-पिता से व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित करके तथ्यों का संकलन किया जा सकता है। (7) पाश्र्व-चित्र – अनेकानेक स्रोतों से एकत्रित की गयी सूचनाओं व तथ्यों को एक पार्श्व-चित्र (Profile) में व्यक्त किया जाता है। इस प्रयास में उनकी विभिन्न योग्यताओं, क्षमताओं तथा भिन्न-भिन्न परीक्षण स्तर के चित्र अंकित किये जाते हैं। पाश्र्व-चित्र को देखकर बालकों के सम्बन्ध में एक साथ ही ढेर सारी महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ ज्ञात हो जाती हैं। इन सूचनाओं के आधार पर विद्यार्थियों को पाठ्य-विषय के चुनाव के सम्बन्ध में निर्देशन दिया जाता है जो प्रायः लिखित रूप में होता है। (8) अनुगामी कार्य – अनुगामी कार्य का एक नाम अनुवर्ती अध्ययन (Follow-up study) भी है। निर्देशन से सम्बन्धित यह अन्तिम सोपान या कार्य है। निर्देशन पाने के बाद जब बालक किसी विषय का चयन करके उसका अध्ययन शुरू कर देता है तो मनोवैज्ञानिक या निर्देशक को यह जाँच करनी होती है कि बालक उस विषय को सफलता से अध्ययन कर रहा है अथवा नहीं। बालक की ठीक प्रगति का अभिप्राय है कि निर्देशन सन्तोषजनक रहा, अन्यथा उसे फिर से निर्देशन प्रदान किया जाता है।
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