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वे जानवरों के साथ-साथ कीड़ाजड़ी, करण और च्यूर जौसी दुर्लभ हिमालयी जड़ी व औषधियाँ भी बेचते हैं। इन गांवों से इनका सादियों का रिश्ता हैं, इसलिए उसी वक्त पूरी कीमत चुकाना ज़रूरी नहीं होता। बर्फीले मौसम में निचले इलाकों की ओर जाते वक्त पुरानी वसूली की जाती है। मज़े की बात हैं कि नकत-उधार के आंकड़े कहीं दर्ज नहीं होते।नकद-उधार के आँकड़े कहीं दर्ज नहीं होते’ आपसी विश्वास के आधार पर सादियों से चली आ रही इस सिलसिले पर एक रपट तैयार करें।

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यहाँ नकद – उधार के आँकड़े कहीं दर्ज नहीं होता। उत्तराखड़ मकर संक्रांति से सूरज तपने के कारण गंगा में पानी की धारा तेज़ हो जाती हैं। उस समय यहाँ के हिमालय अंचल में ठंड के मौसम में बर्फीले इलाकों से निचले इलाकों में उतरे पशुचारक वापस घरों को लौटने लगते हैं। रास्ते में आनेवाले गाँवों से उनका लेन-देन भी होता हैं। गाँवों से इनका सादियों का रिश्ता है, इसलिए उसी वक्त पूरी कीमत चुकाना ज़रूरी ही। बर्फीले मौसम में निचले इलाकों की ओर जाते वक्त पुरानी वसूली की जाती है। मज़े की बात है कि नकद-उधार के आंकडे कहीं दर्ज नहीं होते। आपसी विश्वास के दम पर वर्षों से यहाँ ये लेन-देन चल रहा है।



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