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विदेश-नीति का क्या अर्थ है ? भास्तीय विदेश-नीति के निर्धारक तत्त्वों का वर्णन कीजिए।याभारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? पंचशील के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।याभारत की विदेश नीति की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।याभारत की विदेश-नीति की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।याकिसी विदेशी पत्रिका में भारत को एक साम्राज्यवादी देश बताया गया है। इसका खण्डन करने के लिए उस पत्रिका के सम्पादक को क्या लिखेंगे ?याभारतीय विदेश नीति के विशिष्ट लक्षणों की व्याख्या कीजिए।याभारतीय विदेश नीति के किन्हीं तीन सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।यापंचशील तथा भारत की विदेश नीति पर एक लेख लिखिए।याभारतीय विदेश नीति के आधारभूत सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।याभारत की विदेश नीति के मुख्य सिद्धान्त क्या हैं? उनमें से किन्हीं तीन का उल्लेख कीजिए।याभारत की विदेश नीति की किन्हीं चार विशेषताओं की विवेचना कीजिए। |
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Answer» विदेश-नीति से तात्पर्य उस नीति से है जो कोई देश अन्य देशों के प्रति अपनाता है। भारत की विदेश-नीति की विशेषताएँ/लक्षण/व/सिद्धान्त भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ/लक्षण/तत्त्व/सिद्धान्त निम्नलिखित हैं– 1. गुट-निरपेक्षता– द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सम्पूर्ण विश्व दो सैन्य मुटों में बँट गया था। प्रथम गुट 2. पंचशील के सिद्धान्त में आस्था- भारत बौद्ध धर्म के पाँच व्रतों पर आधारित ‘पंचशील’ के सिद्धान्त ·सभी देशों की परस्पर प्रादेशिक अखण्डता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना ·दूसरे देशों पर आक्रमण न करना ·दूसरे देशों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना ·सभी देशों को बराबर समझना तथा ·शान्ति और सौहार्दपूर्वक सह-अस्तित्व की नीति का पालन करना। 3. समस्त राष्ट्रों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध– भारत की विदेश नीति के निर्धारणकर्ता पं० जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि “भारत की विदेश नीति का मूल उद्देश्य विश्व के समस्त राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना है। भारत इस नीति का निरन्तर पालन करता रहा है। वह अपने पड़ोसी देशों से ही नहीं, अपितु सभी राष्ट्रों से राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा व्यापारिक मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखना चाहता है। 4. शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व- शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व भारत की विदेश नीति का प्रमुख अंग है। यह भी पंचशील के सिद्धान्तों पर आधारित है। इसकी तीन प्रमुख शर्ते हैं- · प्रत्येक राष्ट्र के स्वतन्त्र अस्तित्व को पूर्ण मान्यता · प्रत्येक राष्ट्र को अपने भाग्य का निर्माण करने के अधिकार की मान्यता तथा · पिछड़े हुए राष्ट्रों का विकास एक निष्पक्ष अन्तर्राष्ट्रीय अभिकरण द्वारा किया जाना। इस सिद्धान्त के पीछे यह चिन्तन है कि यदि महाशक्तियाँ कमजोर देशों के भाग्य का निर्धारण करेंगी तो कोई भी देश आर्थिक विकास नहीं कर सकेगा। इसलिए सभी राष्ट्रों को अपने ढंग से आर्थिक विकास करने का अवसर मिलना चाहिए। इस सिद्धान्त का अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों पर अच्छा प्रभाव पड़ा है। 5. रंग-भेद नीति का विरोध- भारत रंग-भेद नीति अथवा नस्लवाद का कट्टर विरोधी है। इसलिए | उसने दक्षिण अफ्रीका में 1994 ई० तक स्थापित अल्प मत वाली गोरी सरकार द्वारा अपनायी गयी रंग-भेद’ की नीति का सदैव विरोध किया। वास्तव में रंग-भेद नीति मानवता का घोर अपमान है। 6. विश्व-शान्ति तथा संयुक्त राष्ट्र संघ में सहयोग– भारत अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का शान्तिपूर्ण ढंग से निपटारा करने का समर्थक है। इसलिए वह संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ। सहयोग का पक्षधर है। विश्व शान्ति कायम करने के लिए भारत निरस्त्रीकरण पर भी बल देता है। 7. साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध- साम्राज्यवादी शोषण से त्रस्त भारत ने अपनी विदेश-नीति में साम्राज्यवाद के प्रत्येक रूप का कटु विरोध किया है। भारत इस प्रकार की प्रवृत्तियों को विश्व-शान्ति एवं विश्व-व्यवस्था के लिए घातक एवं कलंकमय मानता है। के० एम० पणिक्कर के अनुसार, “भारत की नीति हमेशा से यही रही है कि यह पराधीन लोगों की स्वतन्त्रता के प्रति आवाज उठाता रहा है; क्योंकि भारत का दृढ़ विश्वास है कि साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद हमेशा से आधुनिक युद्धों का कारण रहा है। भारत की विदेश नीति के ऊपर उल्लिखित बिन्दुओं के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि भारत एक साम्राज्यवादी देश नहीं है। यदि किसी विदेशी पत्रिका में ऐसा लिखा गया है कि भारत एक साम्राज्यवादी देश है तो यह पूर्णतया असत्य एवं भ्रामक है। इसके लिए सम्बन्धित पत्रिका के सम्पादक के प्रति भारत को कड़ा विरोध जताना चाहिए। |
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