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विकासशील देशों की प्रमुख समस्याओं का उल्लेख करते हुए उनके समाधान के उपाय लिखिए।याविकासशील देशों की किन्हीं दो समस्याओं का वर्णन कीजिए।याविकासशील देशों की प्रमुख तीन समस्याओं का उल्लेख कीजिए।याविकासशील देशों में तीव्र विकास हेतु कोई दो सुझाव लिखिए।याविकासशील देशों की किन्हीं दो आर्थिक समस्याओं का वर्णन कीजिए।याविकासशील देशों के आर्थिक विकास की छः समस्याओं का वर्णन कीजिए। |
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Answer» विकासशील देशों की प्रमुख समस्याएँ विकासशील देशों की समस्याएँ अनगिनत होती हैं, जिनके कारण इन देशों के विकास-मार्ग में अनेक बाधाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन समस्याओं के उचित समाधान के बिना इनका आर्थिक विकास सम्भव नहीं है। विकासशील देशों की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं| 1. पूँजी की कमी – विकास-कार्यक्रमों को कार्यान्वित तथा पूर्ण करने के लिए अधिक मात्रा में पूँजी की आवश्यकता पड़ती है। किन्तु विकासशील देशों में राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय के कम होने के कारण यथेष्ट मात्रा में बचत नहीं हो पाती, फलत: पूँजी-निर्माण नहीं हो पाता। इन देशों में कम आय, कम बचत तथा कम पूँजी का विषैला चक्र चलता रहता है। घरेलू पूँजी के अभाव में इन्हें विकसित देशों से पूँजी उधार लेनी पड़ती है। जो न तो सदैव उपलब्ध होती है और न ही उसकी ऋण शर्ते राष्ट्रहित में होती हैं। 2. जनसंख्या की समस्या – अधिकांश विकासशील देशों की एक प्रमुख समस्या जनसंख्या की समस्या है। परिणामतः कई देशों में ‘जनसंख्या विस्फोट’ की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण विकासशील देशों में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं
अतः राष्ट्र की पहली आवश्यकता जनसंख्या की आधारभूत एवं निर्वाह-मूल की आवश्यकताओं की पूर्ति बन जाती है। इससे विकास-कार्यक्रम गौण हो जाते हैं। 3. अल्प-विकसित यातायात तथा संचार-व्यवस्था – विकासशील देशों में, उनके क्षेत्रफल एवं जनसंख्या की आवश्यकता को देखते हुए, परिवहन के साधनों की कमी है। इन देशों में यातायात के साधनों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया है। इन देशों के अनेक क्षेत्रों में सड़कें तथा रेलमार्ग ही नहीं हैं। लोग पैदल तथा पशुओं की सहायता से एक स्थान से दूसरे स्थान पर आते-जाते हैं; उदाहरणार्थ-चीन, मनीला, फिलीपाइन्स आदि देशों में आज भी अनेक पहाड़ी तथा जंगली क्षेत्र यातायात-साधनों से अछूते हैं। परिणामतः इन देशों में श्रम की गतिशीलता कम है तथा कृषि, उद्योग-धन्धों तथा व्यापार का विकास सीमित मात्रा में हो पाया है। आधुनिक वैज्ञानिक तथा तकनीकी – ज्ञान की कमी के कारण विकासशील देशों में कुशल संचार-व्यवस्था का भी अभाव है। 4. अविकसित उद्योग – विकासशील देशों में उद्योग-धन्धों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया है। इन देशों में आधारभूत तथा आधुनिक विशाल-स्तरीय उद्योगों का अभाव है। इनमें मुख्यतया कुटीर तथा लघु उद्योग पाये जाते हैं, जिनमें श्रम-शक्ति के अधिक प्रयोग किये जाने के कारण उत्पादन अपेक्षाकृत कम मात्रा में हो पाता है। अधिकांश उद्योगों में उपभोक्ता-वस्तुओं तथा कृषि सम्बन्धी वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है। परिणामत: विश्व की 67% जनसंख्या वाले विकासशील देश विश्व के कुल औद्योगिक उत्पादन में केवल 20% का ही योगदान कर पाते हैं। 5. नारी की दशा – विकासशील देशों में नारी की दशा शोचनीय है। रूढ़िवादी प्रवृत्तियों से ग्रस्त समाज में पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को कम महत्त्व दिया जाता है, वरन् अधिकांश विकासशील देशों में पर्दा-प्रथा, निरक्षरता, बाल-विवाह, बहु-विवाह, दहेज-प्रथा आदि सामाजिक कुरीतियों ने स्त्रियों के जीवन को अत्यन्त दयनीय बना दिया है। यद्यपि इन देशों में स्त्री-पुरुष अनुपात लगभग बराबर है। तथापि कार्यशील जनसंख्या के रूप में नारी का प्रतिशत अपेक्षाकृत बहुत कम है। 6. पिछड़ा हुआ औद्योगिक ढाँचा – अधिकांश विकासशील देशों में आधुनिक तथा विशालस्तरीय उद्योगों का अभाव है, जिस कारण इन देशों में औद्योगिक उत्पादन बहुत कम हो पाता है। राष्ट्रीय आय में उद्योगों का योगदान बहुत कम है। उद्योगों की कमी के कारण इन देशों में मशीनों तथा अन्य पूँजीगत माल.को बहुत कम उत्पादन हो पाता है। आवश्यक मशीनों की प्राप्ति के लिए इन्हें विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है। 7. निम्नकोटि का परिवहन – विकासशील देशों में उनके क्षेत्रफल एवं जनसंख्या की आवश्यकता को देखते हुए, परिवहन के साधनों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया है। द्रुतगामी परिवहन-साधनों के अभाव में उत्पादन के साधनों (कच्चा माल, मशीनरी,श्रमिक आदि) को उत्पादन-क्षेत्रों तक पहुँचाने में समय एवं पूँजी का अपव्यय होता है। इसका विकास-प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 8. अल्प-साक्षरता तथा तकनीकी शिक्षा की कमी – अधिकांश विकासशील देश अनेक वर्षों तक विकसित देशों के उपनिवेश रहे हैं। इस कारण इन देशों में शिक्षा का विकास धीमी गति से हुआ है और तकनीकी शिक्षा का तो नितान्त अभाव रहा है। इसके परिणामस्वरूप इन देशों में कुशल एवं प्रशिक्षित श्रमिकों, प्रबन्धकों तथा विशेषज्ञों की कमी रही है। 9. प्राकृतिक संसाधनों का कम उपयोग – अधिकांश विकासशील देशों में पर्याप्त प्राकृतिक संसाधन पाये जाते हैं, किन्तु पूँजी व तकनीकी ज्ञान की कमी, कुशल एवं प्रशिक्षित श्रमिकों की कमी, विशेषज्ञों के अभाव, परिवहन-साधनों की कमी आदि के कारण ये अपने प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग नहीं कर पाये हैं। 10. सामाजिक पिछड़ापन – अनेक विकासशील देशों में सामाजिक रूढ़ियाँ तथा अन्धविश्वास लोगों को इस प्रकार जकड़े हुए हैं कि वे नवीन परिस्थितियों, तकनीकी ज्ञान तथा आधुनिक उत्पादन- प्रणालियों को ग्रहण नहीं कर पाते। निरक्षरता तथा निर्धनता के कारण उत्पादन-कार्य प्राचीन विधियों से ही किया जा रहा है। सामाजिक पिछड़ेपन के कारण इन देशों में श्रम की गतिशीलता की कमी है। 11. कृषि का पिछड़ापन – यद्यपि अधिकांश विकासशील राष्ट्रों का प्रमुख व्यवसाय कृषि है तथापि यहाँ, कृषि अत्यन्त पिछड़ी हुई अवस्था में है। भूमि पर जनसंख्या का दबाव, कृषि-जोतों का उपविभाजन तथा विखण्डन, खेती की प्राचीन विधियों का प्रचलन, साख-सुविधाओं की कमी, किसानों की रूढ़िवादिता व अन्धविश्वास, विपणन सुविधाओं का अभाव आदि ऐसी समस्याएँ हैं, जो कृषि को पिछड़ी अवस्था में रखे हुए हैं। 12. अन्य समस्याएँ–
समस्याओं के समाधान के लिए उपाय (सुझाव) विकासशील देश अपनी समस्याओं के समाधान के लिए निम्नलिखित उपाय कर सकते हैं
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