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यदि सुभद्रा कुमारी चौहान के घर बेटी के बजाय बेटे ने जन्म लिया होता, तो भी क्या उन्हें उतना ही आनंद अनुभव होता? अपना मत लिखिए।

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वैसे तो एक माँ को बेटी या बेटे में को भेद नहीं मानना चाहिए, किन्तु सच यह भी है कि बेटी के प्रति माँ के हृदय में एक विशिष्ट स्थान रहा करता है। बेटी हो बेटा, बच्चों की बाल-सुलभ अठखेलियाँ तो हर माँ को वात्सल्य भाव में भिगो देती हैं। किन्तु इस प्रसंग में थोड़ा-सा अंतर अवश्य है। क्योंकि सुभद्रा जी ने एक बेटी के रूप में ही बचपन बिताया था अत: बचपन को बेटी के रूप देखना उनके लिए अधिक स्वाभाविक था। बेटे के रूप में अपने बचपन को स्वीकार कर पाना शायद उनके लिए कुछ कठिन प्रतीत होता।



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